
भागलपुर। भागलपुर की लाइफलाइन कहे जाने वाले विक्रमशिला महासेतु की सेहत की पड़ताल अब तकनीकी रूप से अंतिम चरण में पहुँच गई है। सेतु के एक स्लैब के अचानक गिर जाने के बाद मचे हड़कंप के बीच, शुक्रवार को आईआईटी पटना की तीन सदस्यीय विशेषज्ञ टीम ने सेतु का विस्तृत ‘सेफ्टी ऑडिट’ शुरू कर दिया है। क्रेन पर सवार होकर गंगा की लहरों के बीच पिलरों और स्लैबों की बारीकी से जांच कर रहे इंजीनियरों ने पहले ही दिन कुछ ऐसी खामियां पकड़ी हैं, जो भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी हैं। जांच दल ने पाया कि पुल के एक्सपेंशन गैप (विस्तार जोड़) अपनी निर्धारित सीमा से कहीं अधिक चौड़े हो चुके हैं, जो सेतु की स्थिरता के लिए घातक साबित हो सकते हैं। सबसे चौंकाने वाला खुलासा ट्रैफिक लोड को लेकर हुआ है, जहाँ विशेषज्ञों ने माना कि पुल पर लगने वाला लंबा जाम ही इसकी बर्बादी की मुख्य वजह है। जाम की स्थिति में खड़ी गाड़ियों का भार चलते हुए वाहनों की तुलना में पांच गुना तक अधिक बढ़ जाता है, जिसे सहने की क्षमता अब यह जर्जर सेतु खोता जा रहा है।
एक्सपेंशन गैप की बढ़ती दूरी: ‘वल्नरेबल’ स्लैबों पर लगा ‘क्रॉस’ का निशान
आईआईटी पटना की टीम ने शुक्रवार को बरारी साइड से पुल की जांच प्रक्रिया शुरू की। विशेषज्ञों ने क्रेन की मदद से पुल के नीचे के हिस्सों और स्लैबों के जुड़ाव स्थल का सूक्ष्म निरीक्षण किया। इस दौरान टीम ने पाया कि पुल के विभिन्न स्लैबों के बीच जो एक्सपेंशन गैप होना चाहिए, वह कई जगहों पर मानक से बहुत अधिक चौड़ा हो गया है। इन दरारों की चौड़ाई बढ़ने का सीधा मतलब है कि स्लैब अपने मूल स्थान से खिसक रहे हैं या उनके नीचे के बियरिंग जवाब दे रहे हैं।
विशेषज्ञों ने उन जगहों को तुरंत चिह्नित किया है जहाँ दरारें अधिक हैं और वहां ‘X’ (क्रॉस) का चिह्न लगाया गया है। तकनीकी दल ने इन हिस्सों को ‘वल्नरेबल’ (अत्यधिक संवेदनशील) घोषित करने की सिफारिश की है। इन निशानों का उद्देश्य भविष्य में मरम्मत के दौरान उन विशेष स्लैबों पर ध्यान केंद्रित करना और उन्हें अधिक भार से बचाना है। यह जांच आने वाले 7 से 10 दिनों तक जारी रहेगी, जिसके बाद एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी ताकि पुल के पुनर्निर्माण या बड़े मेंटेनेंस पर फैसला लिया जा सके।
खड़ी गाड़ियां बनाम चलती गाड़ियां: क्षमता से 5 गुना अधिक भार का गणित
सेफ्टी ऑडिट में लगे इंजीनियरों ने विक्रमशिला सेतु की वर्तमान दुर्दशा के पीछे का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण ‘स्टैटिक लोड’ (स्थिर भार) को बताया है। आईआईटी के इंजीनियरों ने स्पष्ट किया कि यदि गाड़ियां मूवमेंट (गति) में हैं, तो पुल पर पड़ने वाला दबाव एक समान रूप से वितरित होता रहता है और संरचना पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन, विक्रमशिला सेतु पर होने वाली दुर्घटनाओं या वाहनों की खराबी के कारण जब घंटों जाम लगता है, तो स्थिति विस्फोटक हो जाती है।
- खतरनाक दबाव: विशेषज्ञों के अनुसार, जब सैकड़ों ट्रक, हाईवा और बसें पुल पर एक साथ खड़ी हो जाती हैं, तो पुल पर इसकी क्षमता का पांच गुना (5x) तक भार आ जाता है।
- निरंतरता: एनएच (National Highway) के अभियंताओं ने स्वीकार किया कि पुल पर केवल दिन में ही नहीं, बल्कि रातभर भारी वाहनों का दबाव बना रहता था।
- कंपन और तनाव: खड़ी गाड़ियों का निरंतर भार पुल के स्लैब और बीम के भीतर आंतरिक तनाव (Internal Stress) पैदा करता है, जिससे कंक्रीट और लोहे के जुड़ाव कमजोर होने लगते हैं।
2017 का मेंटेनेंस और बियरिंग का रहस्य
जांच के दौरान आईआईटी की टीम ने एनएच के सहायक अभियंता और उन तकनीकी अधिकारियों से भी लंबी चर्चा की, जिन्होंने वर्ष 2017 में इस पुल का मेंटेनेंस करवाया था। उस वक्त मुंबई की कार्य एजेंसी रोहरा रिबिल्ड एसोसिएट्स ने पुल की मरम्मत का जिम्मा संभाला था। सहायक अभियंता ने बताया कि 2017 में जब बियरिंग बदले गए थे, तब किसी भी तरह की गंभीर अंदरूनी गड़बड़ी की बात सामने नहीं आई थी।
पुल की सुरक्षा के लिए उस समय अपनाई गई तकनीक पर भी चर्चा हुई:
- मास्टिक रोड का निर्माण: पुल के गैप से बारिश के पानी को बियरिंग तक पहुँचने से रोकने के लिए मास्टिक रोड बनाई गई थी।
- नमी से बचाव: इसका मुख्य उद्देश्य फर्श की नमी को स्लैब की परत तक जाने से रोकना था, ताकि लोहे के सरियों में जंग न लगे। हालांकि, अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या वह मेंटेनेंस केवल ऊपरी स्तर पर था या उसने पुल की मुख्य संरचनात्मक समस्याओं को अनदेखा कर दिया था? आईआईटी की टीम अब 2017 के उन तमाम तकनीकी दस्तावेजों को खंगाल रही है ताकि गड़बड़ी की जड़ तक पहुँचा जा सके।
ऑडिट का अगला चरण और भविष्य की रणनीति
अगले एक सप्ताह तक चलने वाले इस सेफ्टी ऑडिट में सेतु के प्रत्येक पिलर और बीम की ‘अल्ट्रासोनिक’ और ‘स्ट्रक्चरल’ जांच की जाएगी। एनएच के अभियंताओं को निर्देश दिया गया है कि वे ट्रैफिक डेटा और पिछले 10 वर्षों के मेंटेनेंस लॉग उपलब्ध कराएं। आईआईटी पटना की यह टीम यह भी देखेगी कि क्या गंगा के बढ़ते जलस्तर और बहाव के कारण पिलरों की नींव (Foundation) पर कोई असर पड़ा है।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए, भागलपुर और नवगछिया के बीच आवागमन करने वाले लोगों के लिए यह खबर चिंताजनक है। यदि ऑडिट रिपोर्ट में अधिक स्लैब वल्नरेबल पाए गए, तो पुल पर भारी वाहनों का प्रवेश स्थायी रूप से बंद किया जा सकता है या इसे केवल वन-वे ट्रैफिक के लिए ही सीमित रखा जा सकता है। फिलहाल, जिला प्रशासन आईआईटी की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है ताकि विक्रमशिला सेतु को ‘मौत का पुल’ बनने से रोका जा सके। इंजीनियरों ने साफ कर दिया है कि बिना वैज्ञानिक सुधार के, इस पुराने पड़ चुके ढांचे पर पुराने तरीके से ट्रैफिक चलाना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा होगा।


