सहरसा में मिड-डे मील का ‘जहर’: राजकीय मध्य विद्यालय बलुआहा में खाना खाते ही तड़पने लगे सैकड़ों बच्चे; अस्पताल में मची चीख-पुकार, जांच के घेरे में स्कूल प्रशासन

सहरसा। बिहार के सहरसा जिले से इस वक्त एक ऐसी हृदयविदारक खबर सामने आ रही है जिसने न केवल शिक्षा विभाग बल्कि पूरे प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा दी है। जिले के महिषी प्रखंड अंतर्गत राजकीय मध्य विद्यालय बलुआहा में गुरुवार, 07 मई 2026 को मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) करने के कुछ ही मिनटों के भीतर सैकड़ों बच्चे अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। स्कूल की खुशनुमा फिजा कुछ ही पलों में चीख-पुकार और दहशत में तब्दील हो गई। देखते ही देखते दर्जनों बच्चे जमीन पर गिरकर तड़पने लगे, जिससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा और स्कूल परिसर एक युद्ध क्षेत्र जैसा नजर आने लगा। प्राथमिक रिपोर्ट के अनुसार, भोजन में किसी प्रकार के जहरीले पदार्थ या गुणवत्ता की भारी कमी के कारण यह ‘फूड पॉइजनिंग’ का मामला प्रतीत हो रहा है। प्रशासन ने आनन-फानन में स्कूल पहुँचकर जांच शुरू कर दी है, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर बिहार के सरकारी स्कूलों में परोसे जाने वाले भोजन की शुद्धता और सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है।

खाने की थाली से अस्पताल के बेड तक: मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष

​महिषी प्रखंड के बलुआहा स्थित इस स्कूल में गुरुवार का दिन अन्य दिनों की तरह ही सामान्य शुरू हुआ था। दोपहर के समय जैसे ही मिड-डे मील की घंटी बजी, बच्चे कतारबद्ध होकर अपने भोजन का इंतजार करने लगे। रसोइयों द्वारा भोजन परोसा गया और बच्चों ने इसे खाना शुरू किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भोजन ग्रहण करने के मात्र 10 से 15 मिनट के भीतर ही कई बच्चों ने पेट दर्द और जी मिचलाने की शिकायत की।

​शुरुआत में शिक्षकों ने इसे सामान्य बात समझी, लेकिन जब एक-एक कर दर्जनों बच्चे उल्टी करने लगे और कई बच्चों को चक्कर आने लगे, तो स्कूल प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। स्थिति तब और भयावह हो गई जब कुछ बच्चे बेहोश होकर डेस्क और जमीन पर गिर पड़े। पूरा स्कूल परिसर बच्चों की करुण पुकार से गूंज उठा। स्थानीय ग्रामीण जो स्कूल के पास मौजूद थे, वे तुरंत अंदर भागे और बच्चों को संभालने की कोशिश की। कुछ ही समय में स्कूल के बाहर एंबुलेंस की लंबी कतार लग गई और हर तरफ सिर्फ अफरा-तफरी का माहौल था।

अस्पताल में आपातकाल: डॉक्टरों ने कहा ‘फूड पॉइजनिंग’

​बीमार बच्चों को तत्काल नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर गंभीर हालत को देखते हुए जिला अस्पताल भेजा गया। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में बेड कम पड़ गए, जिसके बाद एक-एक बेड पर दो-दो बच्चों का इलाज शुरू करना पड़ा। डॉक्टरों की एक विशेष टीम को तुरंत अलर्ट मोड पर रखा गया है।

​अस्पताल में तैनात वरिष्ठ चिकित्सकों ने प्राथमिक जांच के बाद बताया कि अधिकांश बच्चों में ‘एक्यूट फूड पॉइजनिंग’ के लक्षण पाए गए हैं। बच्चों का शरीर पीला पड़ रहा था और उन्हें लगातार डिहाइड्रेशन की समस्या हो रही थी। डॉक्टरों के अनुसार, भोजन में किसी जहरीले जीव के गिरने या सड़े-गले अनाज के इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, राहत की बात यह है कि समय पर मेडिकल सहायता मिलने के कारण अधिकांश बच्चों की स्थिति अब स्थिर बताई जा रही है, लेकिन कुछ बच्चों को अभी भी गहन निगरानी (Observation) में रखा गया है। अस्पताल के गलियारे बच्चों के माता-पिता की सिसकियों और आक्रोश से भरे हुए हैं।

अभिभावकों का आक्रोश: “पोषण के नाम पर परोसा जा रहा मौत का सामान”

​इस घटना की खबर जैसे ही गांव में फैली, सैकड़ों की संख्या में अभिभावक स्कूल और फिर अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। अस्पताल के बाहर जुटे परिजनों ने स्कूल प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और कड़ी कार्रवाई की मांग की। कई अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल में अक्सर घटिया किस्म का चावल और मिलावटी तेल का उपयोग किया जाता है।

​गुस्साए ग्रामीणों ने बताया कि पूर्व में भी भोजन की गुणवत्ता को लेकर प्रधानाध्यापक और रसोइयों को चेतावनी दी गई थी, लेकिन प्रशासनिक मिलीभगत के कारण कभी कोई सुधार नहीं हुआ। एक पीड़ित पिता ने रुंधे गले से कहा, “हम अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं ताकि उनका भविष्य संवर सके, लेकिन यहाँ तो उन्हें पोषण के नाम पर जहर परोसा जा रहा है। अगर समय पर डॉक्टर नहीं मिलते, तो आज कई घरों के चिराग बुझ जाते।” अभिभावकों का स्पष्ट कहना है कि जब तक दोषियों को निलंबित कर जेल नहीं भेजा जाता, वे अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त नहीं करेंगे।

प्रशासनिक जांच और ‘सेंपल’ का खेल: क्या दोषियों पर होगी कार्रवाई?

​घटना की गंभीरता को देखते हुए सहरसा जिला प्रशासन ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। महिषी प्रखंड के अधिकारी और शिक्षा विभाग के वरीय पदाधिकारी दल-बल के साथ राजकीय मध्य विद्यालय बलुआहा पहुँचे। अधिकारियों ने रसोई घर का निरीक्षण किया जहाँ भोजन बनाया गया था। जांच टीम ने मौके से बचे हुए भोजन और उपयोग किए गए कच्चे माल (अनाज, तेल और मसाले) के सैंपल (नमूने) जब्त कर लिए हैं।

​इन नमूनों को जांच के लिए तत्काल लैब भेजा गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि भोजन में असल में क्या मिला था। जिला प्रशासन ने स्कूल के प्रधानाध्यापक और मिड-डे मील के प्रभारी से स्पष्टीकरण मांगा है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि यह एक गंभीर लापरवाही का मामला है और इसमें जो भी दोषी पाया जाएगा, चाहे वह शिक्षक हो या एनजीओ/सप्लायर, उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन ने पीड़ित बच्चों के इलाज का पूरा खर्च उठाने और उनके परिवारों को हर संभव सहायता देने का भरोसा दिलाया है।

मिड-डे मील योजना पर फिर उठे सवाल: क्या सबक लेगी सरकार?

​सहरसा की यह घटना बिहार में मिड-डे मील योजना के क्रियान्वयन की पोल खोलती है। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर बच्चों को कुपोषण से बचाने का दावा करती है, लेकिन धरातल पर निगरानी तंत्र (Monitoring System) पूरी तरह ध्वस्त नजर आता है।

  1. गुणवत्ता की जांच: क्या भोजन परोसने से पहले प्रधानाध्यापक या किसी वरिष्ठ शिक्षक द्वारा इसे चखा गया था? नियमानुसार यह अनिवार्य है, लेकिन अक्सर कागजों पर ही यह खानापूर्ति कर ली जाती है।
  2. सफाई का अभाव: स्कूलों के रसोई घर अक्सर गंदगी का केंद्र होते हैं, जहाँ कीड़े-मकोड़े और चूहों का बसेरा रहता है।
  3. भ्रष्टाचार की जड़ें: अनाज की आपूर्ति से लेकर रसोइयों के चयन तक में व्याप्त भ्रष्टाचार बच्चों की थाली तक पहुँचते-पहुँचते जहर बन जाता है।

​यह कोई पहली घटना नहीं है जब बिहार के किसी स्कूल में मिड-डे मील खाने से बच्चे बीमार हुए हों। इससे पहले भी कई जिलों से ऐसी खबरें आती रही हैं, लेकिन हर बार जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाती है। सहरसा के बलुआहा की यह घटना एक चेतावनी है कि अगर अब भी निगरानी तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो भविष्य में कोई बड़ी अनहोनी हो सकती है। फिलहाल, पूरे महिषी प्रखंड में तनाव और चिंता का माहौल है और सभी की नजरें उन बच्चों के स्वास्थ्य और आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं

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