रसोई गैस संकट से टूटी रोजी-रोटी, सूरत से ऑटो में 1800 किलोमीटर सफर कर गांव लौटा परिवार

ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब आम लोगों की जिंदगी और रोजगार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय हालात का प्रभाव भारत के कई हिस्सों में रसोई गैस की आपूर्ति पर पड़ा है, जिसका असर छोटे कारोबारियों और मजदूर परिवारों पर सबसे ज्यादा देखने को मिल रहा है। इसी संकट के कारण जहानाबाद जिले के काको प्रखंड अंतर्गत भदसारा गांव निवासी शैलेश शर्मा को अपना रोजगार छोड़कर सूरत से बिहार लौटना पड़ा। स्थिति इतनी खराब हो गई कि ट्रेन का टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने आठ अन्य लोगों के साथ ऑटो रिक्शा से करीब 1800 किलोमीटर की लंबी यात्रा तय कर गांव पहुंचने का फैसला किया।

शैलेश शर्मा ने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से गुजरात के सूरत शहर में रहकर पेपर प्लेट बनाने का छोटा कारोबार करते थे। इसी काम से उनका परिवार चलता था और धीरे-धीरे जीवन पटरी पर आ रहा था। लेकिन पिछले डेढ़ महीने से वहां रसोई गैस की भारी किल्लत शुरू हो गई। शुरुआत में लोगों को लगा कि यह कुछ दिनों की समस्या है, लेकिन धीरे-धीरे हालात बिगड़ते चले गए। गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें लगने लगीं और सिलेंडर मिलना मुश्किल हो गया।

उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में जो सिलेंडर 900 से 1100 रुपये में मिल जाता था, उसकी कीमत ब्लैक मार्केट में 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच गई। छोटे कारोबार करने वाले लोगों के लिए इतनी महंगी गैस खरीदना संभव नहीं था। कई परिवारों के सामने खाना बनाने तक का संकट खड़ा हो गया। शैलेश ने कहा कि कई दिनों तक वे और उनके साथी चूड़ा-दही, बिस्कुट और सूखे खाद्य पदार्थ खाकर गुजारा करते रहे। कभी-कभी बाहर से सस्ता भोजन खरीदना पड़ता था, लेकिन लगातार ऐसा करना भी महंगा पड़ने लगा।

उन्होंने बताया कि गैस की कमी के कारण उनका पेपर प्लेट का कारोबार भी प्रभावित होने लगा। उत्पादन घट गया और खर्च बढ़ता चला गया। मजदूरों और छोटे कारोबारियों के बीच डर और अनिश्चितता का माहौल बन गया। ऐसे में उन्होंने अपने गांव लौटने का फैसला किया, लेकिन तब एक और बड़ी समस्या सामने आ गई। रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ थी और कई दिनों तक टिकट नहीं मिल रहा था। तत्काल टिकट की कोशिश भी नाकाम रही।

स्थिति से परेशान होकर शैलेश शर्मा और उनके आसपास रहने वाले आठ अन्य लोगों ने मिलकर ऑटो रिक्शा से बिहार लौटने का निर्णय लिया। उन्होंने बताया कि यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं बचा था। सभी लोगों ने मिलकर एक ऑटो की व्यवस्था की और लंबी यात्रा पर निकल पड़े। सूरत से बिहार तक का यह सफर करीब पांच दिनों में पूरा हुआ।

शैलेश ने बताया कि रास्ते में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। गर्मी, धूल, थकान और खराब सड़कों ने सफर को और कठिन बना दिया। कई बार रास्ते में रुककर आराम करना पड़ा। रात में सड़क किनारे ढाबों या पेट्रोल पंपों के पास रुककर समय बिताना पड़ा। खाने-पीने और डीजल पर ही करीब 10 हजार रुपये से अधिक खर्च हो गए। इसके बावजूद सभी लोग किसी तरह सुरक्षित अपने गांव पहुंच सके।

गांव लौटने के बाद शैलेश शर्मा ने कहा कि अब सबसे बड़ी चिंता रोजगार की है। सूरत में काम बंद हो चुका है और गांव में फिलहाल रोजगार का कोई स्थायी साधन नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर हालात सामान्य होते हैं तो वे दोबारा काम पर लौटने की कोशिश करेंगे, लेकिन अभी भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट का असर अब सीधे आम आदमी पर दिखाई देने लगा है। महंगाई, ईंधन संकट और गैस की कमी ने गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खासकर दूसरे राज्यों में रहकर छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है।

ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि बाहर से लौट रहे मजदूरों और छोटे कारोबारियों के लिए विशेष सहायता योजना चलाई जाए ताकि उन्हें गांव में ही रोजगार मिल सके। लोगों का कहना है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर और छोटे व्यापारी अपने घर लौटने को मजबूर हो सकते हैं।

फिलहाल शैलेश शर्मा और उनके साथी गांव लौटकर राहत जरूर महसूस कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने रोजी-रोटी का संकट अब भी बरकरार है। यह घटना इस बात का उदाहरण बन गई है कि वैश्विक संकट का असर किस तरह देश के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंच रहा है और आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।

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