अवैध मेडिकल सेंटरों पर पटना हाईकोर्ट सख्त, बिना लाइसेंस ‘झोलाछाप’ क्लीनिकों पर कार्रवाई के निर्देश

बिहार में बिना पंजीकरण और बिना अनुमति के संचालित हो रहे अवैध मेडिकल सेंटरों और नर्सिंग होम के खिलाफ अब सख्त कार्रवाई का दौर शुरू हो गया है। पटना हाईकोर्ट ने इस गंभीर मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ऐसे सभी ‘झोलाछाप’ केंद्रों पर तत्काल प्रभाव से नियंत्रण लगाया जाए और नए रेगुलेटरी दिशा-निर्देश जल्द से जल्द लागू किए जाएं। अदालत ने साफ कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है और हर मरीज की जान की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

यह मामला उस समय सामने आया जब वैशाली जिले में बिना पंजीकरण के संचालित एक क्लीनिक को सील करने के मामले की सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जस्टिस राजीव राय की पीठ ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे मेडिकल संस्थान चल रहे हैं, जहां न तो उचित लाइसेंस है और न ही योग्य डॉक्टर उपलब्ध हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर आम लोगों की जान के साथ खिलवाड़ के समान है।

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने भोजपुर जिले का एक चर्चित मामला भी रखा गया, जिसमें एक निजी क्लीनिक में मरीज की मौत के बाद जांच में खुलासा हुआ था कि जिले में दर्जनों नर्सिंग होम बिना किसी नियमन के संचालित हो रहे थे। इस पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि स्वास्थ्य विभाग को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में लापरवाही या अनियमितता को किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत प्रताप ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार इस दिशा में गंभीरता से काम कर रही है। उन्होंने जानकारी दी कि छोटे अस्पतालों और क्लीनिकों को विनियमित करने के लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। खासतौर पर 1 से 40 बेड वाले अस्पतालों के लिए अलग से व्यावहारिक दिशा-निर्देश बनाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें एक स्पष्ट और नियंत्रित ढांचे में लाया जा सके।

बताया गया कि बिहार क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट रूल्स, 2013 में संशोधन करते हुए पहले इन छोटे अस्पतालों को कुछ समय के लिए छूट दी गई थी, लेकिन अब नए नियमों के तहत इन्हें सख्ती से नियंत्रित किया जाएगा। इस उद्देश्य से एक विशेष समिति का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता निदेशक-प्रमुख (नर्सिंग) डॉ. रेखा झा कर रही थीं। समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है और नियमों का मसौदा भी तैयार हो चुका है।

सरकार ने अदालत को बताया कि इस मसौदे को विधि विभाग से मंजूरी मिल चुकी है और अब यह वित्त विभाग के पास विचाराधीन है। जैसे ही अंतिम स्वीकृति मिल जाएगी, नए नियमों को अधिसूचित कर दिया जाएगा। इन नियमों के लागू होने के बाद छोटे क्लीनिकों और नर्सिंग होम के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार आएगा।

इस बीच वैशाली जिले में प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए एक अवैध क्लीनिक पर जुर्माना भी लगाया है। जानकारी के अनुसार, राजापाकर थाना क्षेत्र के लखनी गांव में संचालित एक तथाकथित ‘लकवा पोलियो सेंटर’ बिना पंजीकरण के चल रहा था। जांच में पाया गया कि वहां कोई योग्य डॉक्टर नहीं था और चिकित्सा पद्धति पूरी तरह अवैध तरीके से संचालित की जा रही थी। इसके बाद प्रशासन ने संस्थान पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया और संबंधित संचालक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जिले में व्यापक जांच अभियान चलाया जा रहा है। कई अन्य क्लीनिकों और नर्सिंग होम की भी जांच की जा रही है, जहां नियमों के उल्लंघन की आशंका है। प्रशासन का कहना है कि ऐसे सभी संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया है कि वह तेजी से कार्रवाई करते हुए अगली सुनवाई तक विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करे। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी मेडिकल संस्थान बिना लाइसेंस और मानकों के संचालन न कर सके।

इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्य केवल अवैध संस्थानों पर रोक लगाना ही नहीं, बल्कि आम जनता को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, पटना हाईकोर्ट की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब स्वास्थ्य क्षेत्र में लापरवाही और अवैध गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है। आने वाले समय में राज्य में संचालित सभी मेडिकल संस्थानों को नियमों के दायरे में लाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे, जिससे मरीजों की सुरक्षा और विश्वास दोनों को मजबूती मिलेगी।

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