
नवगछिया/मधेपुरा। भक्ति और उल्लास का माहौल कब चीख-पुकार और मातम में बदल जाए, इसकी कल्पना भी रूह कंपा देने वाली होती है। नवगछिया के रंगरा प्रखंड अंतर्गत तिनटंगा दियारा स्थित झल्लूदास टोला गंगा घाट पर शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 की दोपहर एक ऐसी ही हृदयविदारक घटना घटी, जिसने दो जिलों—मधेपुरा और नवगछिया—को शोक की लहर में डुबो दिया। एक 10 वर्षीय मासूम के मुंडन संस्कार की खुशियां मनाने गंगा के पावन तट पर पहुँचा परिवार उस समय पूरी तरह उजड़ गया, जब एक-दूसरे को बचाने की जद्दोजहद में परिवार के तीन चिराग गंगा की लहरों में हमेशा के लिए विलीन हो गए। मृतकों में मुंडन कराने आया मासूम बालक, उसकी सगी बड़ी बहन और उसकी सगी फुआ शामिल हैं। कई घंटों तक चले सघन तलाशी अभियान के बाद एसडीआरएफ (SDRF) की टीम ने शाम को तीनों के शव बरामद किए। इस हादसे ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली लापरवाही के प्रति भी सचेत किया है।
मुंडन संस्कार की खुशियाँ और अचानक आया काल
घटनाक्रम की शुरुआत मधेपुरा जिले के चौसा प्रखंड स्थित भटगामा गांव से हुई। भटगामा निवासी कुमोद यादव के 10 वर्षीय पुत्र गौरव कुमार का मुंडन संस्कार संपन्न होना था। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, बच्चों के मुंडन के लिए गंगा स्नान और पूजन का विशेष महत्व होता है। इसी आस्था के साथ कुमोद यादव अपने पूरे परिवार, सगे-संबंधियों और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ शुक्रवार की सुबह नवगछिया के रंगरा स्थित तिनटंगा दियारा के झल्लूदास टोला गंगा घाट पहुँचे थे।
दोपहर करीब एक बजे का समय था। घाट पर पूजन की तैयारियां चल रही थीं और परिवार के सदस्य गंगा के शीतल जल में स्नान कर रहे थे। इसी दौरान गौरव कुमार स्नान करते समय गहराई का अंदाजा न मिलने के कारण पानी में डूबने लगा। मासूम गौरव को लहरों से संघर्ष करते देख घाट पर मौजूद उसकी बड़ी बहन साक्षी कुमारी (16 वर्ष) और उसकी सगी फुआ मोनी कुमारी (18 वर्ष) ने आव देखा न ताव और अपने भाई व भतीजे को बचाने के लिए गंगा की तेज धारा में छलांग लगा दी।
बचाने की कोशिश में डूबे तीन जिंदगियां: चश्मदीदों की दास्तां
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, साक्षी और मोनी ने बहादुरी दिखाते हुए गौरव तक पहुँचने की कोशिश की, लेकिन दियारा क्षेत्र में गंगा की धारा काफी अनिश्चित और गहरी होती है। पानी के नीचे मौजूद भंवर और तेज बहाव ने इन दोनों युवतियों को भी अपनी चपेट में ले लिया। कुछ पलों तक तीनों ने पानी की सतह पर बचने के लिए संघर्ष किया, लेकिन देखते ही देखते वे लहरों के नीचे ओझल हो गए।
घाट पर मौजूद परिजनों के लिए यह दृश्य किसी भयावह दुस्वप्न जैसा था। कुमोद यादव और अन्य रिश्तेदारों ने शोर मचाया, लेकिन वहां मौजूद गोताखोर या स्थानीय लोग जब तक कुछ कर पाते, तीनों गंगा की गोद में समा चुके थे। जिस घाट पर कुछ मिनट पहले मुंडन के गीत गाए जा रहे थे, वहां अब केवल सिसकियां और करुण क्रंदन गूंज रहा था।
एसडीआरएफ का सर्च ऑपरेशन और शाम की खौफनाक बरामदगी
हादसे की सूचना तुरंत रंगरा पुलिस और जिला प्रशासन को दी गई। मौके पर रंगरा थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर विश्वबंधु दलबल के साथ पहुँचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भागलपुर से एसडीआरएफ (SDRF) की टीम को बुलाया गया। दोपहर से ही गंगा की लहरों को खंगालने का काम शुरू हुआ। दियारा क्षेत्र होने के कारण पानी का बहाव और गहराई बचाव कार्य में बड़ी बाधा बन रही थी।
परिजनों की उम्मीदें अब केवल चमत्कार पर टिकी थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वह उम्मीद भी दम तोड़ने लगी। शाम करीब 5 से 6 बजे के बीच, कड़ी मशक्कत के बाद एसडीआरएफ की टीम ने एक-एक कर तीनों शवों को पानी से बाहर निकाला। सबसे पहले गौरव का शव मिला, और उसके बाद कुछ ही दूरी पर साक्षी और मोनी के शव भी बरामद कर लिए गए। जैसे ही शवों को किनारे लाया गया, परिजनों की चीखें आसमान चीरने लगीं। कुमोद यादव अपने बच्चों के निर्जीव शरीरों को देख सुध-बुध खो बैठे।
मृतकों का विवरण और पारिवारिक पृष्ठभूमि
इस हादसे ने कुमोद यादव के परिवार को कभी न भरने वाला जख्म दिया है। मृतकों की पहचान इस प्रकार है:
- गौरव कुमार (10 वर्ष): कुमोद यादव का पुत्र, जिसका मुंडन संस्कार होना था।
- साक्षी कुमारी (16 वर्ष): कुमोद यादव की पुत्री और गौरव की बड़ी बहन, जिसने भाई को बचाने के लिए जान दे दी।
- मोनी कुमारी (18 वर्ष): कुमोद यादव की सगी छोटी बहन (गौरव की फुआ), जिसने अपने भतीजे के लिए बलिदान दे दिया।
भटगामा गांव में जैसे ही यह खबर पहुँची, पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। गांव वालों के अनुसार, कुमोद यादव का परिवार बेहद सरल और धार्मिक प्रवृत्ति का है। गौरव के मुंडन को लेकर पूरे गांव में चर्चा थी, लेकिन नियति ने कुछ और ही लिख रखा था। साक्षी और मोनी की बहादुरी और उनके बलिदान की चर्चा अब हर जुबान पर है, लेकिन उनकी कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई: इंस्पेक्टर विश्वबंधु का बयान
रंगरा थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर विश्वबंधु ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि सूचना मिलते ही पुलिस और 112 की टीम मौके पर पहुँच गई थी। उन्होंने कहा, “यह एक अत्यंत दुखद और हृदयविदारक घटना है। एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत गंगा में डूबने से हुई है। पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए शवों को कब्जे में ले लिया है और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए अनुमंडलीय अस्पताल नवगछिया भेजने की तैयारी की जा रही है।”
पुलिस ने अंचल प्रशासन (CO) को भी सूचित किया है ताकि आपदा राहत कोष के तहत पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा मिल सके। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि गंगा घाटों पर, विशेषकर दियारा क्षेत्रों में, गहराई का अंदाजा लगाए बिना पानी में न उतरें।
दियारा के घाटों पर सुरक्षा का अभाव: एक बड़ा सवाल
यह हादसा एक बार फिर बिहार के गंगा घाटों पर सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलता है। मुंडन जैसे आयोजनों के लिए तिनटंगा दियारा के इस घाट पर अक्सर भीड़ रहती है, लेकिन वहां न तो बैरिकेडिंग की व्यवस्था है और न ही प्रशिक्षित गोताखोरों की तैनाती। दियारा क्षेत्र की मिट्टी काफी ढीली होती है और पानी का कटाव अंदर ही अंदर गड्ढे बना देता है, जो बाहरी व्यक्ति के लिए जानलेवा साबित होते हैं।
अगर घाट पर सुरक्षा घेरा होता या गहराई को लेकर कोई चेतावनी बोर्ड लगा होता, तो शायद साक्षी और मोनी को अपनी जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ती। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को ऐसे प्रसिद्ध घाटों पर कम से कम त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान स्थायी सुरक्षा बल की व्यवस्था करनी चाहिए।
खुशियों के आंगन में मौत की आहट
अंततः, 24 अप्रैल 2026 की यह दोपहर भटगामा गांव और यादव परिवार के लिए काली तारीख बन गई है। मुंडन का वह पवित्र धागा जो गौरव के गले में बंधना था, वह गंगा की लहरों में कहीं खो गया। साक्षी और मोनी ने जो साहस दिखाया, वह उनकी ममता और भाई के प्रति प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है, लेकिन इस प्रेम की कीमत उन्हें अपनी सांसों से चुकानी पड़ी। नवगछिया के गंगा घाट पर पड़ी वे तीन अर्थियां सुशासन के सुरक्षा दावों और हमारी धार्मिक व्यवस्था की लापरवाही पर एक मूक प्रश्नचिह्न हैं।
वॉयस ऑफ बिहार (VOB) न्यूज़ डेस्क इस दुखद घड़ी में पीड़ित परिवार के साथ खड़ा है और उनके प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता है। हम जिला प्रशासन से यह मांग करते हैं कि पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द मुआवजा प्रदान किया जाए और घाटों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित किए जाएं ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार का ‘गौरव’ इस तरह असमय काल के गाल में न समाए।


