
पटना। बिहार की मिट्टी में गन्ने की मिठास को अब तकनीक की धार देने की तैयारी शुरू हो चुकी है। राज्य के गन्ना उद्योग को पारंपरिक ढर्रे से निकालकर आधुनिक यंत्रीकरण की पटरी पर लाने के लिए सरकार ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को राजधानी पटना में गन्ना उद्योग विभाग के अपर मुख्य सचिव के. सेंथिल कुमार ने एक मैराथन समीक्षा बैठक की। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित इस उच्चस्तरीय मंथन में विभाग के तमाम बड़े अधिकारी और राज्य की चीनी मिलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु ‘गन्ना यंत्रीकरण योजना’ और ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ (CHCs) की मौजूदा स्थिति की पड़ताल करना था। अपर मुख्य सचिव ने विभाग की सुस्त रफ्तार पर न केवल असंतोष जताया, बल्कि स्पष्ट कर दिया कि बिहार के गन्ना किसानों की आय बढ़ाने के लिए मशीनीकरण ही एकमात्र विकल्प है और इसमें किसी भी स्तर पर होने वाली देरी अक्षम्य होगी।
तीन मिलों का ‘एकाधिकार’ और बाकी की सुस्ती: यंत्रीकरण का कड़वा सच
समीक्षा के दौरान जो आंकड़े सामने आए, वे विभाग की तैयारियों पर सवाल खड़े करते हैं। राज्य में चीनी मिलों की संख्या के अनुपात में अब तक केवल 3 चीनी मिलों ने ही कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि निजी मिलें और सरकारी तंत्र यंत्रीकरण के प्रति कितने उदासीन हैं। कस्टम हायरिंग सेंटर का उद्देश्य उन छोटे किसानों को आधुनिक मशीनें किराए पर उपलब्ध कराना है, जो महंगे कृषि यंत्र खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
के. सेंथिल कुमार ने बैठक में इस बात को रेखांकित किया कि कृषि विभाग और ‘जीविका’ द्वारा संचालित केंद्रों में भी गन्ने की फसल के लिए विशेष यंत्रों का भारी अभाव है। सामान्य ट्रैक्टर और हल से गन्ने की खेती के आधुनिक मानकों को पूरा नहीं किया जा सकता। गन्ने की बुवाई से लेकर कटाई तक के लिए विशेष मशीनों की आवश्यकता होती है, जो फिलहाल बिहार के अधिकांश क्षेत्रों में नदारद हैं। इसी को देखते हुए, सभी संबंधित अधिकारियों और चीनी मिलों को 48 घंटे यानी 2 दिनों का अल्टीमेटम दिया गया है कि वे अपने क्षेत्र में आवश्यक यंत्रों की सूची गन्ना आयुक्त को उपलब्ध कराएं।
25 नई मिलें और बंद मिलों का पुनरुद्धार: एक वृहद खाका
बिहार सरकार का लक्ष्य केवल मौजूदा ढांचे को सुधारना नहीं है, बल्कि एक बड़े विस्तार की योजना है। राज्य में 25 नई चीनी मिलों की स्थापना और बंद पड़ी मिलों को दोबारा शुरू करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। लेकिन यह विस्तार तभी सफल होगा जब गन्ना उत्पादन का रकबा बढ़े और उत्पादन लागत घटे।
यंत्रीकरण इसी समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब तक किसानों को ट्रैक्टर माउंटेड ट्रेंच प्लान्टर, लेजर लैंड लेवलर और पावर वीडर जैसी मशीनें नहीं मिलेंगी, तब तक गन्ने की खेती मुनाफे का सौदा नहीं बन पाएगी। अपर मुख्य सचिव ने निर्देश दिया कि मशीनीकरण को केवल फाइलों तक सीमित न रखकर इसे ‘ठोस नीति’ के रूप में धरातल पर उतारा जाए। विभाग अब एक ऐसी समेकित रिपोर्ट तैयार कर रहा है जो राज्य में गन्ना खेती के लिए ‘टेक्नोलॉजी ब्लूप्रिंट’ का काम करेगी।
मजदूरों की कमी और बढ़ती लागत: मशीनीकरण क्यों है अनिवार्य?
बिहार के गन्ना क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से खेती के समय मजदूरों की भारी कमी देखी जा रही है। विशेषकर गन्ने की छिलाई और ढुलाई के समय किसानों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। इससे न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि समय पर मिल तक गन्ना न पहुँचने से उसकी रिकवरी (चीनी की मात्रा) पर भी बुरा असर पड़ता है।
बैठक में यह बात निकलकर आई कि कस्टम हायरिंग सेंटर्स के माध्यम से अगर मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, तो:
- बुवाई में सटीकता: आधुनिक मशीनों से बुवाई करने पर बीजों की बचत होती है और फसल का जमाव बेहतर होता है।
- निराई-गुड़ाई में आसानी: पावर वीडर के इस्तेमाल से खरपतवार नियंत्रण सस्ता और प्रभावी हो जाता है।
- समय की बचत: मशीनी कटाई से लेबर की निर्भरता खत्म होगी और किसान सीधे मिलों से बेहतर समन्वय कर पाएंगे।
गन्ना उद्योग विभाग का विश्वास है कि यंत्रीकरण से किसानों की लागत में कम से कम 20 से 30 प्रतिशत की कमी आएगी, जो सीधे तौर पर उनकी शुद्ध आय में वृद्धि करेगा।
चीनी मिलों की जवाबदेही और जीविका का समन्वय
अपर मुख्य सचिव ने चीनी मिलों के प्रमुखों को स्पष्ट संदेश दिया कि वे केवल कच्चा माल (गन्ना) प्राप्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने ‘कमांड एरिया’ के किसानों को तकनीक से जोड़ने की जिम्मेदारी भी उठाएं। मिलों को अपने स्वयं के कस्टम हायरिंग सेंटर खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि मिल प्रबंधन और किसान के बीच एक सीधा ‘सप्लाई चेन’ तंत्र विकसित हो सके।
साथ ही, जीविका दीदियों के माध्यम से संचालित केंद्रों को भी अपग्रेड करने की योजना है। इसमें गन्ना फसल से संबंधित विशेष यंत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी। ईखायुक्त और सहायक निदेशक ईख विकास को इन सभी प्रयासों की निगरानी करने और दो दिनों के भीतर प्राप्त होने वाली रिपोर्ट के आधार पर कार्ययोजना बनाने का जिम्मा सौंपा गया है।
निष्कर्ष: सुशासन और समृद्धि की नई जुगलबंदी
अंततः, 24 अप्रैल 2026 की यह समीक्षा बैठक बिहार के गन्ना उद्योग के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ की तरह है। के. सेंथिल कुमार का कड़ा रुख और समय सीमा का निर्धारण यह संकेत देता है कि अब विभाग ‘वेट एंड वॉच’ की नीति को छोड़कर ‘एक्शन मोड’ में आ चुका है। बिहार की चीनी मिलें कभी राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करती थीं; उस गौरव को वापस पाने के लिए पुरानी सोच को छोड़कर मशीनों का हाथ थामना ही होगा।
वॉयस ऑफ बिहार (VOB) इस प्रशासनिक मुस्तैदी का स्वागत करता है। अगर यह 2 दिनों की रिपोर्ट वास्तव में एक प्रभावी नीति में तब्दील होती है, तो चंपारण से लेकर पूर्णिया तक के गन्ना किसानों के लिए यह एक नए युग की शुरुआत होगी। गन्ना अब केवल मिठास का प्रतीक नहीं, बल्कि आधुनिक खेती से होने वाली ‘समृद्धि’ का आधार बनेगा। अब देखना यह है कि विभाग द्वारा मांगी गई यह रिपोर्ट कितनी जल्दी बिहार की सड़कों पर दौड़ते गन्ना हार्वेस्टरों के रूप में नजर आती है।


