
पटना। बिहार की राजधानी पटना में कानून के रखवालों और जमीन के लुटेरों के बीच पनप रहे अवैध रिश्तों पर पुलिस प्रशासन ने एक बार फिर कड़ा प्रहार किया है। वर्दी की आड़ में भू-माफियाओं को संरक्षण देने और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के बदले ‘वसूली’ का काला खेल खेलने वाले दीघा के तत्कालीन थानेदार इंस्पेक्टर संजीव कुमार समेत तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को जारी इस आदेश ने पटना पुलिस महकमे के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार के सिंडिकेट में हड़कंप मचा दिया है। निलंबित होने वालों में इंस्पेक्टर संजीव कुमार के अलावा हवलदार चालक मनोज सिंह और राजदेव यादव शामिल हैं। यह कार्रवाई उस विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई है, जिसमें यह प्रमाणित हुआ कि ये पुलिसकर्मी जनता की सुरक्षा के बजाय सरकारी संपत्ति को दीमक की तरह चाटने वाले भू-माफियाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। पटना के एसएसपी कार्तिकेय के शर्मा की अनुशंसा पर हुई इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि सुशासन की सरकार में ‘खाकी’ पर लगा दाग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भ्रष्टाचार की जड़ें: राज्य आवास बोर्ड की जमीन और ‘वसूली’ का खेल
राजधानी पटना के दीघा, राजीव नगर और पाटलिपुत्र थाना क्षेत्रों में बिहार राज्य आवास बोर्ड (Bihar Rajya Awas Board) की सैकड़ों एकड़ जमीन दशकों से विवाद और माफियाओं की नजर का केंद्र रही है। सरकारी नियमों के अनुसार, इन क्षेत्रों में आवास बोर्ड द्वारा अधिग्रहीत की गई भूमि पर किसी भी प्रकार का निजी निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है। हालांकि, धरातल पर सच्चाई इसके विपरीत रही है। भू-माफिया इन विवादित जमीनों पर अवैध रूप से निर्माण कराते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में पुलिस की ‘चुप्पी’ और ‘सहयोग’ सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
जांच में यह सामने आया कि दीघा के पूर्व थानेदार संजीव कुमार और उनके सहयोगी मनोज सिंह व राजदेव यादव ने भू-माफियाओं के साथ एक गुप्त ‘सिंडिकेट’ बना रखा था। जहाँ भी आवास बोर्ड की जमीन पर अवैध निर्माण शुरू होता था, ये पुलिसकर्मी वहां कानून का डंडा चलाने के बजाय ‘वसूली’ के लिए पहुँच जाते थे। माफियाओं को यह भरोसा दिया जाता था कि पुलिस की ओर से कोई अड़चन नहीं आएगी, और बदले में मोटी रकम इन पुलिसकर्मियों की जेबों तक पहुँचती थी। यह न केवल सरकारी संपत्ति की लूट थी, बल्कि उस पद और गोपनीयता की शपथ का भी अपमान था जो इन कर्मियों ने वर्दी पहनते समय ली थी।
लाइन हाजिर से निलंबन तक: जांच की परतें और साक्ष्य
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत 12 मार्च 2026 को हुई थी, जब पहली बार संजीव कुमार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे थे। प्राथमिक सूचनाओं और स्थानीय लोगों की शिकायतों के बाद, एसएसपी कार्तिकेय के शर्मा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए संजीव कुमार को थानेदार के पद से हटाकर ‘लाइन हाजिर’ कर दिया था। उस समय प्रशासन ने इसे एक प्रशासनिक फेरबदल बताया था, लेकिन परदे के पीछे वरीय पुलिस अधिकारियों की एक टीम इस मामले की गहराई से जांच कर रही थी।
जांच के दौरान वरीय अधिकारियों ने दीघा और आसपास के क्षेत्रों में हो रहे अवैध निर्माणों का भौतिक सत्यापन किया और यह जानने की कोशिश की कि आखिर पुलिस की नाक के नीचे ये बहुमंजिला इमारतें कैसे खड़ी हो गईं। इस दौरान कई तकनीकी साक्ष्य, कॉल डिटेल्स और चश्मदीदों के बयान सामने आए जो संजीव कुमार और उनके सहयोगियों की संलिप्तता की पुष्टि कर रहे थे। जांच में यह भी पाया गया कि हवलदार चालक मनोज सिंह और राजदेव यादव केवल मोहरे नहीं थे, बल्कि वे थानेदार और भू-माफियाओं के बीच ‘सेतु’ का काम करते थे। वसूली की रकम के लेनदेन और निर्माण स्थलों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने का जिम्मा इन्हीं के कंधों पर था। जब जांच रिपोर्ट में इन तीनों की संलिप्तता के ठोस प्रमाण मिले, तब एसएसपी की अनुशंसा पर निलंबन की मुहर लगाई गई।
दीघा-राजीव नगर क्षेत्र: भू-माफियाओं का ‘चारागाह’
पटना का दीघा और राजीव नगर इलाका भू-माफियाओं के लिए लंबे समय से ‘चारागाह’ बना हुआ है। आवास बोर्ड की जमीन को लेकर यहाँ अक्सर तनाव और हिंसक झड़पें होती रहती हैं। सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के बाद उसे भोले-भले लोगों को बेच देना और फिर वहां पुलिस के संरक्षण में निर्माण कराना यहाँ का एक पुराना ढर्रा बन चुका है। संजीव कुमार जैसे अधिकारियों ने इस ढर्रे को खत्म करने के बजाय इसे और अधिक मजबूत बनाया।
अधिग्रहीत जमीन पर हो रहे अवैध निर्माण न केवल शहरी नियोजन (Urban Planning) के लिए खतरा हैं, बल्कि भविष्य में वहां रहने वाले लोगों के लिए भी कानूनी संकट पैदा करते हैं। वरीय पुलिस अधिकारियों की जांच में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया कि थानेदार के स्तर पर ही फाइलों को दबाया जा रहा था और आवास बोर्ड के अधिकारियों को भी गुमराह किया जा रहा था। जब बोर्ड के कर्मी अपनी जमीन की पैमाइश या अवैध निर्माण को रोकने पहुँचते थे, तो उन्हें स्थानीय पुलिस की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता था, जिससे माफियाओं के हौसले बुलंद हो जाते थे।
एसएसपी कार्तिकेय के शर्मा का कड़ा रुख: सुशासन का संदेश
पटना के एसएसपी कार्तिकेय के शर्मा ने इस कार्रवाई के जरिए पूरे महकमे को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। उनका संदेश साफ है—चाहे कोई इंस्पेक्टर हो या हवलदार, अगर वह भू-माफियाओं या किसी भी अपराधी के साथ साठगांठ करेगा, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। एसएसपी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि संजीव कुमार, मनोज सिंह और राजदेव यादव की भूमिका संदिग्ध ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई पाई गई है।
निलंबन के बाद अब इन तीनों कर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) और भी गहनता से चलेगी। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस अवैध वसूली की रकम का कोई हिस्सा और भी ऊपर तक जाता था। यह भी देखा जा रहा है कि संजीव कुमार के कार्यकाल के दौरान कितनी ऐसी संपत्तियां हैं जिन्हें अवैध रूप से रजिस्ट्री या निर्माण की अनुमति दी गई। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में कुछ अन्य पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी गाज गिर सकती है जो इस सिंडिकेट का हिस्सा रहे हैं।
बिहार पुलिस की छवि और भ्रष्टाचार का दीमक
एक तरफ जहाँ बिहार पुलिस अपराधियों को पकड़ने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी जान जोखिम में डालती है, वहीं संजीव कुमार जैसे अधिकारियों की करतूतें पूरे संगठन की छवि को धूमिल करती हैं। समाज में पुलिस के प्रति अविश्वास पैदा करने में ऐसी ‘साठगांठ’ सबसे बड़ी वजह होती है। जब एक पीड़ित व्यक्ति थाने में न्याय की उम्मीद लेकर जाता है और उसे पता चलता है कि उसका थानेदार खुद उसके हक की जमीन हड़पने वाले माफिया के साथ बैठा है, तो लोकतंत्र की बुनियाद हिल जाती है।
बिहार सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत पिछले कुछ महीनों में कई भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है। दीघा कांड उसी कड़ी का एक हिस्सा है। पटना पुलिस अब यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि संवेदनशील क्षेत्रों जैसे दीघा और राजीव नगर में ईमानदार अधिकारियों की तैनाती की जाए, ताकि आवास बोर्ड की जमीन को माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराया जा सके और अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाया जा सके।


