
पटना। बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव की सबसे बड़ी वाहक बनकर उभरी ‘जीविका दीदियां’ अब आर्थिक स्वावलंबन के एक नए और ऊंचे पायदान पर पहुँचने वाली हैं। राज्य सरकार ने ग्रामीण महिलाओं के इन स्वयं सहायता समूहों (SHG) को और अधिक सशक्त बनाने के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इस नए वित्तीय वर्ष में राज्य के 50 हजार जीविका समूहों को बैंकों के माध्यम से 10-10 लाख रुपये का बड़ा लोन प्रदान किया जाएगा। यह निर्णय उन समूहों के पूर्व के उत्कृष्ट प्रदर्शन, अनुशासन और समय पर कर्ज अदायगी के रिकॉर्ड को देखते हुए लिया गया है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को जीविका विभाग द्वारा जारी विवरण के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य दीदियों के छोटे व्यवसायों को मध्यम स्तर के उद्यमों में तब्दील करना है। इसके साथ ही, चालू वित्तीय वर्ष के लिए राज्य के सभी जीविका समूहों को कुल 16 हजार करोड़ रुपये का लोन उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो बिहार के ग्रामीण विकास के इतिहास में एक नया कीर्तिमान होगा।
99 प्रतिशत रिकवरी रेट: बैंकों के भरोसे की असली बुनियाद
जीविका समूहों को मिलने वाले इस भारी-भरकम लोन के पीछे सबसे बड़ी ताकत इन महिलाओं की ईमानदारी और वित्तीय अनुशासन है। जीविका के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन समूहों द्वारा लिए गए लोन की रिकवरी रेट (वापसी की दर) लगभग 99 प्रतिशत है। यह आंकड़ा किसी भी कॉर्पोरेट सेक्टर या बड़े व्यापारिक घरानों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। यही मुख्य कारण है कि बैंक अब इन ग्रामीण महिलाओं को बड़ी राशि का कर्ज देने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं।
पिछले वित्तीय वर्ष 2025-26 में इन समूहों ने लगभग 14 हजार करोड़ रुपये का ऋण लिया था और उसका सदुपयोग ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने में किया। इसी सफलता को देखते हुए सरकार ने इस वर्ष लक्ष्य में 2 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी करते हुए इसे 16 हजार करोड़ कर दिया है। 10 लाख रुपये के स्लैब वाले लोन उन समूहों को मिलेंगे जिन्होंने पहले लिए गए छोटे ऋणों का सफल प्रबंधन किया है और अब अपने कारोबार को विस्तार देने की क्षमता रखती हैं।
प्रति सदस्य 1 लाख का निवेश: समूह से उद्यम की ओर बढ़ते कदम
बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान में लगभग 11 लाख जीविका समूह सक्रिय हैं। सांख्यिकीय नजरिए से देखें तो हर एक समूह में औसतन 12 सदस्य (दीदियां) शामिल होती हैं। इस लिहाज से, जिन 50 हजार समूहों को इस वर्ष 10-10 लाख रुपये का लोन दिया जा रहा है, उसके हर एक सदस्य के हिस्से में औसतन एक लाख रुपये की पूंजी आएगी। एक ग्रामीण महिला के लिए एक लाख रुपये की यह राशि उसके जीवन और रोजगार को पूरी तरह बदलने की ताकत रखती है।
जीविका के पदाधिकारियों का कहना है कि यह लोन व्यवस्था एक क्रमिक प्रक्रिया (Graded Process) के तहत काम करती है। समूहों के विकास और उनकी साख के आधार पर लोन के चार मुख्य चरण तय किए गए हैं:
- डेढ़ लाख रुपये: शुरुआती स्तर के समूहों के लिए।
- तीन लाख रुपये: पहले चरण की सफलता के बाद।
- छह लाख रुपये: मध्यम स्तर के विस्तार के लिए।
- दस लाख रुपये: उच्च प्रदर्शन करने वाले और व्यावसायिक रूप से परिपक्व समूहों के लिए।
अगले दो से तीन वर्षों के भीतर, सरकार का लक्ष्य है कि राज्य के कम से कम 5 लाख समूहों को 10-10 लाख रुपये वाले ऋण स्लैब तक विकसित किया जाए, ताकि ग्रामीण बिहार में छोटे कारखानों और संगठित व्यापार की एक नई लहर पैदा हो सके।
किराने से लेकर ब्यूटी पार्लर तक: विविधतापूर्ण होते ग्रामीण रोजगार
जीविका दीदियों द्वारा लिए जाने वाले इस लोन का उपयोग अब केवल पारंपरिक खेती-बाड़ी तक सीमित नहीं रहा है। बिहार के गांवों में महिलाएं अब लीक से हटकर नए व्यवसायों में हाथ आजमा रही हैं। ऋण की राशि का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जा रहा है:
- कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र: उन्नत खेती, मछली पालन और पशुपालन (डेयरी) में निवेश।
- रिटेल सेक्टर: छोटे किराना स्टोर, चाय और नाश्ते की दुकान, तथा कपड़ों का व्यापार।
- सेवा क्षेत्र: गांवों में ब्यूटी पार्लर खोलना, सिलाई-कढ़ाई केंद्र चलाना और टेंट हाउस की सेवाएं।
- सूक्ष्म उद्योग: अगरबत्ती बनाना, मशरूम उत्पादन, शहद प्रसंस्करण और हस्तशिल्प।
इसके अतिरिक्त, महिलाएं अपनी छोटी-मोटी घरेलू जरूरतों, बच्चों की शिक्षा या स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों के लिए भी समूह से कम ब्याज पर ऋण प्राप्त करती हैं, जिससे वे साहूकारों के शोषणकारी जाल से मुक्त हो गई हैं। जीविका के पदाधिकारी इन दीदियों को न केवल बैंक से लोन दिलाने में मदद करते हैं, बल्कि उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव (Market Linkage) भी उपलब्ध कराते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ‘पावरहाउस’: सामाजिक और आर्थिक बदलाव
10 लाख रुपये का लोन मिलना केवल एक वित्तीय लेनदेन नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक स्थिति में आए बड़े बदलाव का प्रतीक है। जब एक समूह के पास 10 लाख रुपये की पूंजी होती है, तो उनकी निर्णय लेने की क्षमता और समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। जीविका समूहों की इस सफलता ने ग्रामीण बिहार में गरीबी उन्मूलन के दावों को धरातल पर सच कर दिखाया है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 का यह लक्ष्य यह भी दर्शाता है कि बिहार सरकार ‘महिला केंद्रित विकास’ को अपनी प्राथमिकता मान रही है। 16 हजार करोड़ रुपये का कुल लोन लक्ष्य राज्य की जीडीपी में ग्रामीण योगदान को बढ़ाने वाला साबित होगा। इससे न केवल गांवों में रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि शहरों की ओर होने वाले पलायन में भी कमी आने की उम्मीद है। जब महिलाओं के हाथ में पैसा पहुँचता है, तो उसका सीधा लाभ परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई और घर के जीवन स्तर पर पड़ता है।
भविष्य की चुनौतियां और अवसर
हालांकि, रिकवरी रेट 99 प्रतिशत है, लेकिन इतनी बड़ी राशि के प्रबंधन के लिए समूहों के भीतर तकनीकी और प्रबंधन कौशल (Management Skills) को और निखारने की आवश्यकता है। विभाग अब डिजिटल लेनदेन और बैंकिंग साक्षरता पर भी जोर दे रहा है ताकि दीदियां अपने खातों का प्रबंधन और भी बेहतर तरीके से कर सकें। सरकार की योजना है कि इन समूहों को अब ‘फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन’ (FPO) की तर्ज पर और बड़े प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए।
बैंकों के लिए भी जीविका समूह अब ‘प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग’ का सबसे पसंदीदा हिस्सा बन गए हैं। जहां बड़े कॉर्पोरेट लोन कई बार एनपीए (NPA) में बदल जाते हैं, वहीं इन दीदियों की ईमानदारी ने बैंकों को एक सुरक्षित निवेश का रास्ता दिखाया है। यही कारण है कि बिहार के ग्रामीण बैंक और राष्ट्रीयकृत बैंक इस 16 हजार करोड़ के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सक्रियता दिखा रहे हैं।


