​नाथनगर एमओ हटाए गए: भ्रष्टाचार कांड के बाद गायब रहने पर एसडीओ की बड़ी कार्रवाई

भागलपुर/नाथनगर। बिहार के प्रशासनिक महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया जब भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने वाले एक अधिकारी पर ही गाज गिर गई। भागलपुर जिले के नाथनगर प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (एमओ) अभिजीत कुमार को उनके पद के प्रभार से मुक्त कर दिया गया है। सदर एसडीओ (अनुमंडल पदाधिकारी) ने इस संबंध में एक कड़ा रुख अख्तियार करते हुए न केवल उन्हें पद से हटाया है, बल्कि उनके खिलाफ ‘शोकॉज’ (कारण बताओ नोटिस) भी जारी किया है। यह पूरी घटना किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहाँ एक अधिकारी ने अपने ही विभाग के भ्रष्टाचार को उजागर किया और उसके बाद खुद प्रशासनिक रडार पर आ गया। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, नाथनगर और गोराडीह प्रखंड की आपूर्ति व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए नए अधिकारियों को प्रभार सौंप दिया गया है। इस कार्रवाई ने जिले के प्रशासनिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना भारी पड़ गया या फिर ड्यूटी से गायब रहना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘ट्रैप’ और उसके बाद का सन्नाटा

​इस पूरी कहानी की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई थी, जब नाथनगर एमओ अभिजीत कुमार ने एक साहसिक कदम उठाते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने सदर एसडीओ कार्यालय में कार्यरत दो किरानियों—प्रेम कुमार और मयंक कश्यप—को निगरानी विभाग के जरिए घूस लेते रंगे हाथ पकड़वाया था। निगरानी विभाग की इस कार्रवाई से पूरे कलेक्ट्रेट परिसर में सनसनी फैल गई थी। एक अधिकारी द्वारा अपने ही सिस्टम के कर्मचारियों को निगरानी के शिकंजे में कसवाना एक बड़ी मिसाल माना जा रहा था।

​लेकिन, इस ‘ट्रैप’ कांड के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं। जिस अधिकारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का नायक माना जाना चाहिए था, वह अचानक से कार्यालय से नदारद रहने लगा। बताया जा रहा है कि निगरानी की छापेमारी के बाद से ही अभिजीत कुमार लगातार अपने कार्यस्थल से अनुपस्थित चल रहे थे। इस अनुपस्थिति ने नाथनगर और गोराडीह जैसे महत्वपूर्ण प्रखंडों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और राशन कार्ड से जुड़ी सेवाओं को ठप कर दिया। जब महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर होने बंद हो गए और आपूर्ति व्यवस्था चरमराने लगी, तब जिला प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।

एसडीओ की कार्रवाई: प्रभार छीना और मांगा स्पष्टीकरण

​अभिजीत कुमार की लंबी अनुपस्थिति और सरकारी कार्यों में उत्पन्न हो रहे व्यवधान को देखते हुए सदर एसडीओ ने कड़ा फैसला लिया है। एसडीओ कार्यालय से निर्गत पत्र के अनुसार, अभिजीत कुमार से इस लापरवाही पर स्पष्टीकरण मांगा गया है। उन्हें यह बताना होगा कि बिना किसी पूर्व सूचना या अवकाश स्वीकृति के वे इतने दिनों तक कार्यस्थल से क्यों गायब रहे।

प्रभार का नया बंटवारा:

  1. नाथनगर प्रखंड: यहाँ का प्रभार अब सुल्तानगंज के एमओ को सौंपा गया है।
  2. गोराडीह प्रखंड: अभिजीत कुमार के पास गोराडीह का अतिरिक्त प्रभार भी था, जिसे अब जगदीशपुर के एमओ को स्थानांतरित कर दिया गया है।

​प्रशासन का तर्क है कि आम जनता की सेवाओं को किसी एक व्यक्ति की सनक या व्यक्तिगत कारणों से बाधित नहीं होने दिया जा सकता। राशन वितरण एक आवश्यक सेवा है और एमओ की अनुपस्थिति का सीधा असर हजारों गरीब परिवारों के चूल्हे पर पड़ रहा था। पत्र में साफ तौर पर निर्देश दिया गया है कि नए प्रभार वाले अधिकारी तत्काल प्रभाव से कार्यों का निष्पादन शुरू करेंगे ताकि पेंडिंग फाइलों का निपटारा हो सके।

निगरानी कांड का साया: क्या दबाव में थे अधिकारी?

​प्रशासनिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि अभिजीत कुमार आखिर गायब क्यों हुए? क्या विभाग के किरानियों को पकड़वाने के बाद उन्हें किसी प्रकार का आंतरिक दबाव झेलना पड़ रहा था? या फिर इस कार्रवाई के बाद वे खुद असुरक्षित महसूस कर रहे थे? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार के मामलों में गवाह या शिकायतकर्ता बनने वाले अधिकारियों को अक्सर विभागीय राजनीति का शिकार होना पड़ता है।

​हालांकि, सदर एसडीओ कार्यालय का कहना है कि प्रशासन पूरी तरह से भ्रष्टाचार के विरुद्ध है, लेकिन ड्यूटी से गायब रहना अनुशासनहीनता है। यदि अभिजीत कुमार को किसी प्रकार का खतरा था या कोई समस्या थी, तो उन्हें विधिवत रूप से वरीय अधिकारियों को सूचित करना चाहिए था। बिना सूचना के कार्यालय छोड़ना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि जनसेवा के संकल्प के साथ भी विश्वासघात है। अब ‘शोकॉज’ के जवाब के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि उनकी चुप्पी के पीछे के वास्तविक कारण क्या थे।

नाथनगर और गोराडीह में आपूर्ति व्यवस्था पर असर

​नाथनगर और गोराडीह दोनों ही प्रखंडों में राशन कार्ड निर्माण, सुधार और पीडीएस दुकानों की निगरानी का जिम्मा एमओ के कंधों पर होता है। अभिजीत कुमार के गायब रहने से पिछले कुछ हफ्तों से कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं थमी हुई थीं।

  • राशन कार्ड पेंडेंसी: नए राशन कार्डों के सत्यापन का काम रुक गया था।
  • डीलर शिकायतें: पीडीएस दुकानदारों के खिलाफ आने वाली शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हो पा रही थी।
  • अनाज उठाव: गोदामों से अनाज के उठाव और वितरण की मॉनिटरिंग प्रभावित हो रही थी।

​अब सुल्तानगंज और जगदीशपुर के एमओ के पास अतिरिक्त प्रभार आने से इन दोनों प्रखंडों की फाइलों को फिर से रफ़्तार मिलने की उम्मीद है। हालांकि, अतिरिक्त प्रभार वाले अधिकारियों के लिए यह चुनौती होगी कि वे अपने मूल प्रखंड के साथ-साथ इन नए प्रखंडों की बड़ी आबादी की जरूरतों को कैसे संभालते हैं।

भ्रष्टाचार और जवाबदेही: एक बड़ा सवाल

​यह मामला बिहार की प्रशासनिक कार्यशैली पर कई सवाल खड़े करता है। एक तरफ राज्य सरकार ‘भ्रष्टाचार मुक्त बिहार’ का नारा देती है, वहीं दूसरी तरफ जब कोई अधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होता है, तो पूरा सिस्टम उसके इर्द-गिर्द असहज हो जाता है। किरानियों की गिरफ्तारी ने यह साबित किया था कि घूसखोरी की जड़ें कितनी गहरी हैं। लेकिन उस कार्रवाई के बाद मुख्य शिकायतकर्ता का ही सीन से गायब हो जाना और फिर उसका पद से हटाया जाना एक नकारात्मक संदेश भी दे सकता है।

​प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण मिले, लेकिन साथ ही यह भी अनिवार्य है कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह न मोड़ें। अभिजीत कुमार के मामले में, यदि वे ‘नायक’ बनकर उभरे थे, तो उन्हें अपनी कुर्सी पर टिके रहकर व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए था। गायब होकर उन्होंने खुद पर कार्रवाई का मौका दे दिया।

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