​बंगाल में लोकतंत्र की ‘महा-गर्जना’: पहले चरण में टूटा आजादी के बाद का हर रिकॉर्ड; 92% से ज्यादा वोटिंग; हिंसा के बीच जनता का प्रचंड प्रहार

कोलकाता/नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 की तारीख सुनहरे और ऐतिहासिक अक्षरों में दर्ज हो गई है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में राज्य की जनता ने वो कर दिखाया है, जिसकी कल्पना आधुनिक चुनावी इतिहास में बिरले ही की जाती है। भीषण गर्मी, उमस और राज्य के विभिन्न हिस्सों से आई खूनी झड़पों की खबरों के बावजूद, बंगाल के मतदाताओं ने पोलिंग बूथों पर ऐसा ‘सैलाब’ उमड़ाया कि पिछले सात दशकों के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। चुनाव आयोग (ECI) के आधिकारिक आंकड़ों और शुरुआती रुझानों के अनुसार, पहले चरण की 152 सीटों पर मतदान का प्रतिशत 92% के जादुई आंकड़े को पार कर गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस अभूतपूर्व भागीदारी को ‘आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक उत्सव’ करार देते हुए बंगाल की जनता को सलाम किया है। जहाँ एक तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी सत्ता बचाने की जद्दोजहद में है, वहीं बीजेपी और वाम-कांग्रेस गठबंधन इस ‘बम्पर वोटिंग’ को सत्ता परिवर्तन की लहर मान रहे हैं।

आंकड़ों की बाजीगरी: जिलों में मतदान का ‘सुनामी’ अवतार

​बंगाल के 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर सुबह 7 बजे जैसे ही ईवीएम का बटन दबाना शुरू हुआ, कतारें छोटी होने का नाम नहीं ले रही थीं। उत्तर बंगाल के चाय बागानों से लेकर दक्षिण के जलगंलमहल और मुर्शिदाबाद के संवेदनशील इलाकों तक, हर जगह एक ही नजारा था—वोट की चोट।

जिला

मतदान प्रतिशत (अनुमानित)

प्रमुख विशेषता

दक्षिण दिनाजपुर

95.22% – 96%

राज्य में सबसे अधिक मतदान का रिकॉर्ड।

कूचबिहार

95.17%

हिंसा की आशंका के बावजूद रिकॉर्ड भागीदारी।

बीरभूम

94.19%

राजनैतिक रूप से सबसे सक्रिय और संवेदनशील।

मुर्शिदाबाद

92.6%

सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील बेल्ट में भारी वोटिंग।

कलिम्पोंग

82.8%

राज्य में सबसे कम मतदान वाला जिला।

चुनाव आयोग के अनुसार, मतदान की रफ़्तार सुबह 9 बजे (18.76%) से जो चढ़नी शुरू हुई, वह दोपहर 1 बजे तक 62.18% और शाम 5 बजे तक 90% के करीब पहुँच गई थी। रात 9:30 बजे तक मिली जानकारी के अनुसार, अंतिम आंकड़ा 92.35% से 92.59% के बीच रहने का अनुमान है।

आधी आबादी का दबदबा: महिलाओं ने रचा इतिहास

​इस चुनाव की सबसे बड़ी हाईलाइट महिलाओं की भागीदारी रही। चुनाव आयोग के पीआईबी (PIB) बुलेटिन के अनुसार, बंगाल में पुरुषों (90.92%) की तुलना में महिलाओं ने 92.69% मतदान कर यह साबित कर दिया कि वे राज्य की तकदीर लिखने में सबसे आगे हैं। चाहे वह ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं का असर हो या महिला सुरक्षा का मुद्दा, बंगाल की नारी शक्ति ने लंबी कतारों में खड़े होकर व्यवस्था को अपना संदेश दे दिया है। इसके अलावा, लगभग 3.60 करोड़ मतदाताओं में पहली बार वोट देने वाले युवाओं की संख्या भी काफी अधिक रही, जो राज्य के भविष्य के लिए एक नई उम्मीद जगाती है।

हिंसा और झड़पें: लोकतंत्र के पर्व पर दाग

​जहाँ एक तरफ रिकॉर्ड वोटिंग की खुशी थी, वहीं दूसरी तरफ बंगाल की ‘चुनावी हिंसा’ की परंपरा भी बदस्तूर जारी रही। राज्य के कई जिलों से छिटपुट नहीं, बल्कि गंभीर हिंसा की खबरें आईं।

  • बीरभूम में हमला: लबपुर इलाके में बीजेपी के चुनावी एजेंट बिश्वजीत मंडल पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी गाड़ी में भी जमकर तोड़फोड़ की गई।
  • आसनसोल में पत्थरबाजी: आसनसोल दक्षिण में बीजेपी उम्मीदवार के वाहन पर रहमत नगर इलाके में पत्थरबाजी की गई, जिसमें वे बाल-बाल बचे।
  • मुर्शिदाबाद और दक्षिण दिनाजपुर: मुर्शिदाबाद में पोलिंग एजेंटों को डराने-धमकाने और दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में बीजेपी उम्मीदवार का पीछा कर मारपीट करने की घटनाएं सामने आईं।
  • EVM में गड़बड़ी: कई बूथों पर ईवीएम में खराबी और कैमरों के साथ छेड़छाड़ की शिकायतें मिलीं, जिन्हें बाद में चुनाव आयोग ने दुरुस्त करने का दावा किया।

​इन घटनाओं के बावजूद, केंद्रीय बलों की तैनाती और शत-प्रतिशत वेबकास्टिंग के कारण मतदान की प्रक्रिया रुकी नहीं। आयोग ने दावा किया है कि 100% बूथों पर लाइव वेबकास्टिंग के जरिए दिल्ली से निगरानी रखी जा रही थी।

दिग्गजों की साख दांव पर: 1,478 उम्मीदवारों का भविष्य कैद

​पहले चरण की यह वोटिंग बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा की आधी से अधिक सीटों का भाग्य तय कर चुकी है। इस चरण में 152 सीटों पर कुल 1,478 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 167 महिलाएं शामिल हैं।

कुछ प्रमुख चेहरे और सीटें:

  • अधीर रंजन चौधरी (बहरामपुर): कांग्रेस के कद्दावर नेता की साख इस गढ़ में दांव पर है।
  • सुकुमार रॉय (कूचबिहार उत्तर): बीजेपी के इस सीट पर अपने किले को बचाने की चुनौती है।
  • मौसम नूर (मालदा): टीएमसी की ओर से इस महत्वपूर्ण सीट पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला।
  • सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी: हालांकि इनके चुनाव अगले चरण या अन्य क्षेत्रों में हैं, लेकिन आज की वोटिंग उनकी राजनैतिक जमीन को मजबूती देने या दरकाने का काम करेगी।

राजनैतिक मायने: किसे फायदा, किसे नुकसान?

​राजनैतिक विश्लेषक इस ‘बम्पर वोटिंग’ के अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। आम तौर पर माना जाता है कि भारी मतदान सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का संकेत होता है। लेकिन बंगाल में 2011 और 2021 में भी भारी वोटिंग हुई थी, जहाँ ममता बनर्जी ने बड़ी जीत दर्ज की थी।

  1. बीजेपी का दावा: प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने भारी मतदान को ‘भय’ की हार और ‘परिवर्तन’ की शुरुआत बताया है।
  2. टीएमसी का तर्क: ममता बनर्जी की पार्टी का मानना है कि उनकी जन-कल्याणकारी योजनाओं ने लोगों को घरों से बाहर निकाला है और यह ‘मैंडेट’ उनके पक्ष में है।
  3. वाम-कांग्रेस गठबंधन: त्रिकोणीय मुकाबले में भारी वोटिंग से साइलेंट वोटर्स का प्रभाव बढ़ सकता है, जो खेल बिगाड़ भी सकते हैं और बना भी सकते हैं।

4 मई का इंतजार

​पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का पहला अध्याय समाप्त हो चुका है। अब नजरें 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे और अंतिम चरण के मतदान पर हैं, जहाँ शेष 142 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। आज की रिकॉर्ड वोटिंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की जनता अब किसी भी कीमत पर अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं है। बम, बारूद और धमकियों के साये में भी 92% मतदान होना विश्व के किसी भी लोकतंत्र के लिए एक मिसाल है।

​अब सबकी निगाहें 4 मई 2026 पर टिकी हैं, जब मतगणना के साथ यह साफ होगा कि बंगाल की जनता ने ‘माँ, माटी, मानुष’ को चुना है या ‘सोनार बांग्ला’ के नारे पर मुहर लगाई है। फिलहाल, बैलेट बॉक्स में बंद 1,478 उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।

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