
मोतिहारी। कानून की रक्षा के लिए पहनी जाने वाली खाकी जब अपराध का ढाल बन जाए, तो समाज और व्यवस्था दोनों के लिए यह एक डरावनी स्थिति होती है। बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ कुछ शातिर अपराधियों ने पुलिस की वर्दी का सहारा लेकर लूट, ठगी और जालसाजी का एक पूरा साम्राज्य खड़ा कर लिया था। मुफ़स्सिल थाना पुलिस ने साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए एक ऐसे ‘वर्दीधारी’ गैंग का पर्दाफाश किया है, जिसके तार सीधे पुलिस महकमे के पूर्व और बर्खास्त कर्मियों से जुड़े हुए हैं। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को सदर-2 एसडीपीओ जितेश पाण्डेय ने इस पूरे मामले का आधिकारिक खुलासा किया, जिसने न केवल पुलिस प्रशासन की चौकसी पर मुहर लगाई है, बल्कि वर्दी की विश्वसनीयता को ठेस पहुँचाने वाले अपनों के ही चेहरों को बेनकाब कर दिया है। गिरफ्तार किए गए अपराधियों में एक बर्खास्त पुलिसकर्मी और दो सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) होमगार्ड जवान शामिल हैं, जो पुलिसिया कार्यशैली की बारीकियों को जानते थे और इसी का फायदा उठाकर मासूम नागरिकों को अपना शिकार बना रहे थे।
एक मामूली गिरफ्तारी और खुल गया जुर्म का काला पन्ना
किसी भी बड़े गिरोह के पतन की शुरुआत अक्सर एक छोटी सी चूक से होती है। इस पूरे गिरोह का राज तब खुला जब मुफ़स्सिल थाना पुलिस ने हाल ही में हुए एक मारपीट के मामले में सफदर इमाम नाम के युवक को हिरासत में लिया। पुलिस को अंदेशा नहीं था कि एक सामान्य मारपीट के आरोपी के पास इतने बड़े राज दबे होंगे। जब पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ शुरू की, तो सफदर इमाम टूट गया और उसने न केवल अपनी संलिप्तता स्वीकार की, बल्कि मोतिहारी और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय एक ऐसे संगठित गिरोह का नाम उगल दिया, जो ‘नकली पुलिस’ बनकर समानांतर सत्ता चला रहा था। सफदर के बयान के आधार पर पुलिस ने तत्काल छापेमारी के लिए विशेष टीमें बनाईं और रात के अंधेरे में उन ठिकानों पर दबिश दी, जहाँ से खाकी की आड़ में काले कारनामों को अंजाम दिया जा रहा था।
गैंग का ढांचा: रक्षक ही निकले सबसे बड़े भक्षक
पुलिस की जांच में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया, वह इस गिरोह की संरचना थी। किसी भी गिरोह में आम तौर पर अपराधी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, लेकिन यहाँ कानून की बारीकियों को जानने वाले लोग ही मास्टरमाइंड निकले।
- लाल बहादुर राम: यह इस गिरोह का सबसे खतरनाक मोहरा था, जो बिहार पुलिस का बर्खास्त सिपाही है। सेवा से निकाले जाने के बाद उसने अपनी जानकारी का उपयोग अपराध के लिए करना शुरू कर दिया। उसे पुलिस की नाकेबंदी, चेकिंग के तरीके और वायरलेस कोड्स की अच्छी जानकारी थी।
- राजेंद्र राय और प्रभु लाल शाह: ये दोनों रिटायर्ड होमगार्ड जवान हैं। सेवानिवृत्ति के बाद समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के बजाय, इन्होंने अपनी पेंशन और अनुभव का इस्तेमाल ठगी के धंधे में निवेश करने के लिए किया। इनकी उपस्थिति से गिरोह को असली पुलिस जैसा दिखने में मदद मिलती थी।
- मोहम्मद आरिफ और सफदर इमाम: ये गिरोह के वे सदस्य थे जो रेकी करने और शिकार को फंसाने का काम करते थे।
यह संगम इसलिए भी खतरनाक था क्योंकि जब कोई रिटायर्ड या बर्खास्त कर्मी वर्दी पहनकर सड़क पर खड़ा होता है, तो आम नागरिक के लिए यह पहचानना नामुमकिन हो जाता है कि वह कानून का रक्षक है या लुटेरा।
वारदात का तरीका: ‘एसटीएफ’ का रौब और नोट डबलिंग का झांसा
इस गिरोह ने ठगी और लूट के लिए कई तरह के हथकंडे अपना रखे थे। इनका सबसे प्रमुख तरीका था ‘नकली पुलिस’ बनकर सड़कों पर नाकेबंदी करना। ये लोग रात के समय उन वाहनों को निशाना बनाते थे जो कैश या कीमती सामान लेकर गुजर रहे होते थे। खुद को एसटीएफ (Special Task Force) या मुख्यालय की विशेष टीम बताकर ये लोग वाहनों की तलाशी लेते और डरा-धमकाकर नकदी और कीमती सामान लूट लेते थे।
इसके अलावा, गिरोह के सदस्य भोले-भले लोगों को “नोट डबलिंग” (पैसे दोगुने करने) के जाल में भी फंसाते थे। वे नकली नोटों के बंडल या केमिकल के जरिए असली नोट को दोगुना करने का नाटक करते थे और जब पीड़ित अपनी बड़ी रकम उन्हें सौंपता, तो ये वर्दी का रौब दिखाकर उसे वहां से भगा देते थे या खुद चंपत हो जाते थे। वर्दी की धौंस के कारण पीड़ित पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता था, क्योंकि उसे लगता था कि वह असली पुलिस के हत्थे चढ़ गया है।
जब्ती की फेहरिस्त: लग्जरी गाड़ियां और खाकी का जखीरा
सदर-2 एसडीपीओ जितेश पाण्डेय ने बताया कि छापेमारी के दौरान जो बरामदगी हुई है, वह किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। पुलिस ने अपराधियों के ठिकानों से वह सारा सामान बरामद कर लिया है जिसका उपयोग वे ‘नकली पुलिस’ का नाटक रचने के लिए करते थे।
- वर्दी और सामान: पुलिस ने चार पूरे सेट खाकी वर्दी, पुलिस की टोपी, बेल्ट, डंडे और फर्जी आईडी कार्ड जब्त किए हैं।
- पहचान के उपकरण: गाड़ियों पर लगाने वाले ‘पुलिस बोर्ड’ भी बरामद हुए हैं, जिन्हें अपराधी अपनी निजी लग्जरी गाड़ियों पर लगाकर चलते थे ताकि टोल प्लाजा या अन्य पुलिस नाकों पर उन्हें कोई रोक न सके।
- नकद और वाहन: अपराधियों के पास से 1 लाख 81 हजार 200 रुपये नकद और तीन लग्जरी गाड़ियां बरामद हुई हैं। ये गाड़ियां लूट की कमाई से खरीदी गई थीं या किसी वारदात में इस्तेमाल की गई थीं, इसकी जांच की जा रही है।
व्यवस्था पर सुलगते सवाल और पुलिस की उपलब्धि
मोतिहारी पुलिस की इस कार्रवाई से एक बड़े खतरे को तो टाल दिया गया है, लेकिन यह मामला कई गंभीर सवाल भी छोड़ गया है। बर्खास्त और रिटायर्ड सुरक्षाकर्मियों का इस तरह संगठित अपराध में शामिल होना पुलिस विभाग के लिए एक आत्ममंथन का विषय है। क्या विभाग से निकाले जाने के बाद ऐसे लोगों की गतिविधियों पर कोई निगरानी तंत्र मौजूद है? वर्दी की साख को बट्टा लगाने वाले इन तत्वों ने अब तक कितने परिवारों को अपना शिकार बनाया होगा, इसका आकलन अभी बाकी है।
एसडीपीओ जितेश पाण्डेय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि पुलिस अब इस गिरोह के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने में जुटी है। गिरफ्तार पाँचों अभियुक्तों—सफदर इमाम, लाल बहादुर राम, मोहम्मद आरिफ, राजेंद्र राय और प्रभु लाल शाह—को न्यायिक हिरासत में भेजा जा रहा है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि क्या विभाग के भीतर का कोई वर्तमान कर्मी भी इनके संपर्क में था या इन्हें गुप्त सूचनाएं प्रदान कर रहा था।


