​बिहार में ग्रामीण सड़कों का ‘क्वालिटी टेस्ट’: विभाग का सख्त अल्टीमेटम, 28 अप्रैल तक चलेगा समीक्षा का महामंथन; लापरवाही पर गिरेगी गाज

पटना। बिहार के सुदूर ग्रामीण अंचलों में आवागमन की सुगमता और बुनियादी ढांचे को मजबूती देने के लिए राज्य सरकार अब पूरी तरह से ‘एक्शन मोड’ में नजर आ रही है। राजधानी पटना के विश्वेश्वरैया भवन में इन दिनों ग्रामीण कार्य विभाग के गलियारों में काफी गहमागहमी है। वजह है— ग्रामीण सड़कों और पुलों के निर्माण में आ रही सुस्ती और गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों पर विभाग का कड़ा रुख। विभाग के अभियंता प्रमुख-सह-अपर आयुक्त-सह-विशेष सचिव निर्मल कुमार के नेतृत्व में प्रमंडलवार समीक्षा बैठकों का एक सघन सिलसिला शुरू किया गया है, जो आगामी 28 अप्रैल 2026 तक जारी रहेगा। इस हाई-लेवल मीटिंग का सीधा संदेश है कि अब कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर काम दिखना चाहिए। विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि समय-सीमा (डेडलाइन) का उल्लंघन और गुणवत्ता में किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

विश्वेश्वरैया भवन में ‘सर्जिकल’ समीक्षा: क्यों जरूरी हुआ यह कदम?

​ग्रामीण कार्य विभाग बिहार के ग्रामीण विकास की रीढ़ माना जाता है। पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा था कि कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं प्रशासनिक स्वीकृतियों और निविदा प्रक्रियाओं के जाल में उलझी हुई थीं। कई जगहों पर काम आवंटित होने के बावजूद धरातल पर प्रगति शून्य थी। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए निर्मल कुमार ने स्वयं कमान संभाली है।

​समीक्षा बैठकों का मुख्य एजेंडा मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (MIS) पर योजनाओं की अद्यतन स्थिति की पड़ताल करना है। अक्सर यह देखा जाता है कि जमीनी हकीकत और पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों में अंतर होता है। विभाग अब हर एक किलोमीटर सड़क और हर छोटे पुल की फाइल को खंगाल रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि बाधा कहाँ है— भूमि विवाद में, फंड की कमी में या फिर संवेदक (कॉन्ट्रैक्टर) की लापरवाही में।

प्रमंडलवार कैलेंडर: किस जिले की कब है बारी?

​विभाग ने इस समीक्षा अभियान को काफी व्यवस्थित तरीके से चरणों में विभाजित किया है। बैठकों का यह सिलसिला 20 अप्रैल से शुरू हुआ था और अब अपने निर्णायक मोड़ पर है:

  • 20 अप्रैल: मुजफ्फरपुर, मोतिहारी और छपरा प्रमंडल के कार्यों की समीक्षा की गई। यहाँ मुख्य रूप से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत और लंबित पुल निर्माणों पर चर्चा हुई।
  • 21-22 अप्रैल (वर्तमान): सीवान, मुंगेर और भागलपुर प्रमंडल की परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा जारी है। भागलपुर प्रमंडल में खासकर गंगा के तटीय इलाकों और अंग जनपद की ग्रामीण संपर्कता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • 27 अप्रैल: गया और औरंगाबाद प्रमंडल की बारी होगी। यहाँ की भौगोलिक चुनौतियों और उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में चल रही योजनाओं की सुरक्षा और गति पर मंथन होगा।
  • 28 अप्रैल: बेतिया और बेगूसराय प्रमंडल के कार्यों की गहन समीक्षा के साथ इस अभियान का समापन होगा।

सहायक अभियंताओं के लिए ‘8 अनिवार्य दस्तावेज’: तैयारी या कार्रवाई?

​इस बार की समीक्षा बैठक केवल औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं है। विभाग ने सभी संबंधित सहायक अभियंताओं (Assistant Engineers) को सख्त निर्देश दिया है कि वे पटना मुख्यालय आते समय अपने साथ आठ अनिवार्य दस्तावेजों की फाइल साथ लाएं। यह दस्तावेज किसी भी परियोजना की कुंडली होते हैं:

  1. प्रशासनिक स्वीकृति (Administrative Approval): योजना को मिली आधिकारिक मंजूरी के कागज।
  2. निविदा आमंत्रण (Tender Invitation): निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता की जांच।
  3. कार्य आवंटन आदेश (Work Allotment Order): किसे और कब काम सौंपा गया।
  4. लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस (LOA): संवेदक की ओर से कार्य स्वीकारने का पत्र।
  5. एकरारनामा (Agreement): विभाग और संवेदक के बीच की शर्तों का दस्तावेज।
  6. योजनावार MIS प्रगति प्रतिवेदन: डिजिटल पोर्टल पर दर्ज अब तक का कार्य।
  7. स्ट्रिप चार्ट (Strip Chart): भूमि विवाद और भौतिक बाधाओं की स्थिति दर्शाने वाला नक्शा।
  8. पर्ट चार्ट (PERT Chart): समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने का तकनीकी ब्लूप्रिंट।

​इन दस्तावेजों की मांग यह दर्शाती है कि विभाग अब बहानेबाजी की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता। यदि किसी इंजीनियर के पास ‘पर्ट चार्ट’ के अनुसार काम की प्रगति नहीं होगी, तो उन पर अनुशासनिक कार्रवाई की तलवार लटक सकती है।

तकनीक का संगम: कनीय अभियंताओं की ‘डिजिटल’ हाजिरी

​प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए विभाग ने तकनीक का भी सहारा लिया है। जहाँ सहायक अभियंताओं को भौतिक रूप से पटना बुलाया गया है, वहीं सभी कनीय अभियंताओं (Junior Engineers) और तकनीकी पर्यवेक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने कार्यस्थल (साइट) से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से जुड़ें।

​इसका दोहरा लाभ है— पहला, कनीय अभियंता अपने कार्यस्थल को नहीं छोड़ेंगे जिससे निर्माण कार्य प्रभावित नहीं होगा। दूसरा, समीक्षा के दौरान यदि किसी विशिष्ट साइट की स्थिति जाननी हो, तो कनीय अभियंता तत्काल कैमरे के माध्यम से स्थिति स्पष्ट कर सकेंगे। यह ‘रियल-टाइम’ मॉनिटरिंग सिस्टम बिहार के ग्रामीण कार्य विभाग में जवाबदेही तय करने का एक बड़ा जरिया बन रहा है।

जमीनी बाधाएं और विभाग का ‘क्विक रिलीफ’ विजन

​समीक्षा के दौरान जो सबसे बड़ी समस्या उभर कर सामने आ रही है, वह है भूमि विवाद। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर सड़कों का एलाइनमेंट निजी जमीनों या विवादित भूखंडों के कारण रुक जाता है। निर्मल कुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि केवल पत्राचार न करें, बल्कि स्थानीय जिला प्रशासन और अंचल अधिकारियों के साथ समन्वय बिठाकर ‘ऑन-द-स्पॉट’ समाधान निकालें। स्ट्रिप चार्ट के माध्यम से अब एक-एक विवादित बिंदु को चिह्नित किया जा रहा है ताकि सड़कों का निर्माण बीच में न अटके।

  • ये भी पढ़े..

    बिहार की तीन पारंपरिक कलाओं को मिला GI टैग, सांस्कृतिक विरासत को मिली वैश्विक पहचान

    Share Add as a preferred…

    गया के खिजरसराय में बनेगा अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी सेंटर, दक्षिण बिहार के MSME सेक्टर को मिलेगी नई दिशा

    Share Add as a preferred…