सबौर में गंगा की लहरों का तांडव: ममलखा में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे ग्रामीण; जमीन और मकान लील रही नदी, प्रशासन की ‘बोरियों’ वाली राजनीति पर भड़के लोग

भागलपुर/सबौर। बिहार के भागलपुर जिले को ‘सिल्क सिटी’ के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसी शहर के मुहाने पर बसे सबौर प्रखंड के ग्रामीणों के लिए गंगा की लहरें अब वरदान नहीं, बल्कि उनके वजूद को मिटाने वाला अभिशाप बन गई हैं। सबौर प्रखंड के ममलखा पंचायत क्षेत्र में गंगा नदी का भीषण कटाव अब एक भयावह रूप ले चुका है। मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को स्थानीय ग्रामीणों ने एक प्रेस वार्ता आयोजित कर अपनी अंतहीन वेदना और प्रशासनिक उपेक्षा की कहानी साझा की। चिलचिलाती धूप और बढ़ते जलस्तर के बीच ममलखा के ग्रामीण आज उस दोराहे पर खड़े हैं, जहाँ एक तरफ गंगा की गहरी खाई है और दूसरी तरफ सरकार की चुप्पी। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ममलखा केवल इतिहास के पन्नों में ही जीवित बचेगा। प्रेस वार्ता के दौरान ग्रामीणों का आक्रोश स्पष्ट था, जो वर्षों से केवल कागजी आश्वासनों और अस्थायी राहत के नाम पर छले जा रहे हैं।

ममलखा का भूगोल और मिटता हुआ अस्तित्व

​ममलखा पंचायत के भौगोलिक मानचित्र पर नजर डालें, तो गंगा की मुख्य धारा अब गांव के बेहद करीब आ चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में गंगा ने अपनी दिशा में जो परिवर्तन किया है, उसने उपजाऊ खेतों को लीलना शुरू कर दिया है। जहाँ कभी सोने जैसी फसलें लहलहाती थीं, आज वहां केवल गंगा का मटमैला पानी और मिट्टी के ढहते हुए टीले नजर आते हैं।

​प्रेस वार्ता में मौजूद बुजुर्गों ने रुंधे गले से बताया कि उनकी अपनी आँखों के सामने उनकी पुश्तैनी जमीनें गंगा की लहरों में समा गईं। किसानों की आजीविका का एकमात्र साधन कृषि ही था, लेकिन कटाव ने उन्हें भूमिहीन और मजदूर बना दिया है। यह समस्या केवल वर्तमान मानसून या बढ़ते जलस्तर की नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी निरंतर चलने वाली आपदा बन गई है जो हर दिन किसी न किसी के घर या खेत को अपना ग्रास बना रही है। खेती योग्य जमीन के गायब होने से गाँव में बेरोजगारी और गरीबी का संकट गहरा गया है, जिससे मजबूरन युवा वर्ग अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहा है।

अस्थायी उपाय: बालू की बोरियों का ‘छलावा’

​ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप जल संसाधन विभाग और जिला प्रशासन की कार्यशैली पर है। प्रेस वार्ता में ग्रामीणों ने तीखे लहजे में कहा कि जब भी कटाव की स्थिति भयावह होती है, तो प्रशासन की ओर से ‘फ्लड फाइटिंग’ के नाम पर कुछ अस्थायी कदम उठाए जाते हैं। बालू की बोरियां डालना, जियो बैग्स का इस्तेमाल करना या कच्चा तटबंध बनाना केवल चंद घंटों की राहत देता है।

​ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब प्रशासन को पता है कि गंगा की धार का दबाव ममलखा की ओर बढ़ रहा है, तो स्थायी ‘स्टड’ (Stone Boulders) या पक्का बांध क्यों नहीं बनाया जा रहा है? अस्थायी उपायों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, जो गंगा की एक ही तेज लहर में बह जाते हैं। ग्रामीणों ने इसे ‘पैसे का बंदरबांट’ करार दिया है। उनका कहना है कि बालू की बोरियां डालना केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। जब तक पत्थर की बोल्डर पिचिंग या कोई ठोस इंजीनियरिंग समाधान नहीं होगा, तब तक ममलखा को डूबने से कोई नहीं बचा सकता।

प्रशासनिक उदासीनता: आवेदनों का अंबार और समाधान शून्य

​प्रेस वार्ता में ग्रामीणों ने उन तमाम आवेदनों और पत्रों की प्रतियां दिखाईं, जो पिछले कई वर्षों में जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय तक भेजे गए हैं। स्थानीय मुखिया और प्रतिनिधियों का कहना है कि वे दर्जनों बार जल संसाधन विभाग के कार्यालय के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल ‘फाइल प्रक्रिया में है’ का जवाब मिलता है।

​ग्रामीणों का आरोप है कि जिला पदाधिकारी और संबंधित विभाग के इंजीनियर केवल उस समय आते हैं जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। ठंड और गर्मी के मौसम में, जब स्थायी काम किया जा सकता है, तब प्रशासन सोया रहता है। जैसे ही बरसात का मौसम आता है और गंगा का जलस्तर बढ़ता है, तब हड़बड़ी में कुछ काम शुरू किए जाते हैं, जो तकनीकी रूप से कभी सफल नहीं होते। इस प्रशासनिक सुस्ती के कारण ग्रामीणों का भरोसा अब सरकारी तंत्र से पूरी तरह उठ चुका है। उन्हें लगता है कि शायद प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है।

भविष्य पर संकट: शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां

​गंगा कटाव का असर केवल जमीन और मकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने नई पीढ़ी के भविष्य पर भी ग्रहण लगा दिया है। ग्रामीणों ने बताया कि कटाव के कारण कई संपर्क मार्ग और सड़कें टूट चुकी हैं, जिससे बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल हो गया है। कई प्राथमिक विद्यालय अब गंगा के मुहाने पर खड़े हैं, जिन्हें कभी भी खाली करना पड़ सकता है।

​सड़कों के कटाव के कारण स्वास्थ्य सुविधाएं भी ग्रामीणों की पहुँच से दूर हो गई हैं। अगर रात के समय किसी की तबीयत बिगड़ती है, तो उसे मुख्य सड़क तक पहुँचाने के लिए कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा है। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति किसी काल से कम नहीं है। आर्थिक तंगी और बेघर होने का डर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को प्रभावित कर रहा है। कई परिवार ऐसे हैं जो अपने बच्चों को रिश्तेदारों के यहाँ भेजने को मजबूर हैं, ताकि वे सुरक्षित रह सकें और अपनी शिक्षा जारी रख सकें।

स्थायी समाधान की मांग: ग्रामीणों का अल्टीमेटम

​प्रेस वार्ता के अंत में ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से सरकार को चेतावनी दी कि अब वे और अधिक धैर्य नहीं रखेंगे। उनकी मांगें स्पष्ट और सीधी हैं:

  • पक्का कटाव निरोधक कार्य: ममलखा से लेकर प्रभावित अन्य गांवों तक गंगा के किनारे पत्थर के बोल्डर से स्थायी बांध बनाया जाए।
  • मुआवजा और पुनर्वास: जिन परिवारों के घर और खेत गंगा में समा चुके हैं, उन्हें तत्काल आर्थिक सहायता दी जाए और उनके पुनर्वास के लिए सुरक्षित स्थान पर जमीन आवंटित की जाए।
  • तकनीकी टीम की नियुक्ति: एक विशेषज्ञ तकनीकी टीम भेजी जाए जो कटाव के पैटर्न का अध्ययन करे और भविष्य के खतरों को कम करने के लिए वैज्ञानिक उपाय सुझाए।

​ग्रामीणों ने कहा कि यदि आगामी कुछ दिनों में धरातल पर काम शुरू नहीं होता है, तो वे उग्र आंदोलन और जल-सत्याग्रह करने को विवश होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन और अस्तित्व को मिटने नहीं देंगे।

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