​नारी शक्ति वंदन अधिनियम: राजनैतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ा आधी आबादी का हक; श्लोक ठाकुर की कलम से एक विशेष विश्लेषण

पटना। भारतीय सभ्यता के हजारों सालों के गौरवशाली इतिहास और लोकतंत्र की जननी के रूप में भारत की पहचान को एक नया आयाम देने का अवसर उस समय धूमिल हो गया, जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को राजनैतिक स्वार्थों की वेदी पर चढ़ा दिया गया। यह अधिनियम केवल एक कानून नहीं था, बल्कि देश की आधी आबादी को नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाने का एक पवित्र महायज्ञ था। सरकार ने बार-बार सभी सांसदों से यह आग्रह किया कि वे इस ऐतिहासिक मौके को हाथ से न जाने दें, क्योंकि यह देश को एक नई दिशा और महिलाओं को उनके वास्तविक अधिकार देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। लेकिन, जिस राजनैतिक परिपक्वता की उम्मीद देश कर रहा था, वह स्वार्थी विपक्ष की संकीर्ण सोच के कारण धराशायी हो गई। श्लोक ठाकुर की कलम से निकली यह रिपोर्ट उस राजनैतिक छल की परतों को खोलती है, जिसने पिछले 30 सालों से महिलाओं के राजनैतिक सशक्तिकरण को बंधक बना रखा है।

विपक्ष की 30 वर्षों की देरी और ‘इंडी अलायंस’ का दोहरा चेहरा

​विपक्ष, जिसने पिछले तीन दशकों तक महिलाओं को उनकी वाजिब भागीदारी देने में केवल देरी और बहानेबाजी की, उसने एक बार फिर देश की आधी आबादी को गहरे अंधेरे में धकेल दिया है। अपनी खिसकती राजनैतिक जमीन को बचाने की बेचैनी में ‘इंडी अलायंस’ (INDI Alliance) का असली चेहरा एक बार फिर जनता के सामने उजागर हो गया है। यह विडंबना ही है कि जिस क्षण का इंतजार हमारी दादियों ने किया, जिसकी उम्मीद हमारी माताओं ने की और जिसके लिए हमारी बहन-बेटियों ने दशकों तक संघर्ष किया, उसे कांग्रेस और उसके साथियों ने महज अपनी सत्ता की भूख के लिए और 30 साल आगे बढ़ा दिया। यह संघर्ष केवल संसद की कुर्सियों या सीटों के बारे में नहीं है; यह उस भारतीय घर की ‘इज्जत’ और स्वाभिमान के बारे में है, जो अब लोकतंत्र के मंदिर तक पहुँचने की राह देख रही है। श्लोक ठाकुर की कलम से यह स्पष्ट होता है कि विपक्ष ने न केवल एक बिल को रोका है, बल्कि उन्होंने सबसे ऊंचे स्तर पर भारतीय महिलाओं के राजनैतिक प्रतिनिधित्व को जानबूझकर कमजोर करने का प्रयास किया है।

नफरत और तिरस्कार की राजनीति का इतिहास

​विपक्ष का यह कृत्य केवल एक राजनैतिक विषय नहीं है, बल्कि यह देश के शीर्ष नेतृत्व में महिलाओं की काबिलियत पर शक करने वाली उनकी घृणास्पद सोच का प्रदर्शन है। कांग्रेस पार्टी ने पारंपरिक रूप से एक साफ महिला-विरोधी रुख बनाए रखा है, जो अक्सर उनके कट्टरपंथी साथियों और पुराने ढर्रे के मौलवियों से प्रेरित रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो याद आता है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किस तरह मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा था, जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस प्रगतिशील आदेश को पलट दिया जिसमें मुस्लिम पुरुषों को अपनी पत्नियों को गुजारा भत्ता देना अनिवार्य किया गया था। कट्टरपंथियों के हंगामे के आगे राजीव गांधी ने घुटने टेक दिए और शाह बानो मामले के उस बड़े अन्याय को सुधारने के बजाय और बढ़ा दिया। इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का साहस नरेंद्र मोदी की सरकार ने दिखाया, जब ‘ट्रिपल तलाक’ पर प्रतिबंध लगाकर मुस्लिम महिलाओं को एक नई आजादी दी गई। आज वही कांग्रेस और उसके पिछड़े नजरिये वाले नेता महिलाओं की बराबरी के मुद्दे को एक और बड़ा झटका देने का काम कर रहे हैं।

पंचायत आरक्षण का छलावा और तकनीकी बहानों की आड़

​विपक्ष अक्सर पंचायतों में महिलाओं को मिले आरक्षण का झूठा क्रेडिट लेकर अपनी संकीर्ण राजनैतिक सोच को छिपाने की कोशिश करता है। लेकिन यहाँ एक कड़वा सच यह है कि वे पंचायतों में आरक्षण के लिए इसलिए आसानी से मान गए क्योंकि उससे उनके शीर्ष राजनैतिक पदों को कोई खतरा नहीं था। लेकिन जैसे ही बात लोकतंत्र के सबसे ऊंचे पायदान—लोकसभा और विधानसभाओं की आई, उनकी नीयत डगमगा गई। विपक्ष हमेशा इस बिल के समर्थन में होने का दिखावा करता रहा है, लेकिन उनके हर ‘समर्थन’ के पीछे एक “लेकिन/परंतु” छिपा होता है। श्लोक ठाकुर की कलम से यह विश्लेषण सामने आता है कि इस बिल का विरोध करने के लिए विपक्ष ने हमेशा कोई न कोई ‘तकनीकी बात’ उठाई है। इस बार उन्होंने एक एकजुट भारतीय परिवार में फूट, मनमुटाव और शक पैदा करने के अपने एजेंडे के पीछे छिपने की कोशिश की। उन्होंने भारत को उत्तर और दक्षिण के आधार पर बांटने की साजिश रची, ताकि अपने महिला-विरोधी चरित्र को छिपा सकें।

विपक्ष का काला इतिहास: 1996 से 2014 तक का विश्वासघात

​महिला आरक्षण बिल का सफर राजनैतिक विश्वासघात की एक लंबी श्रृंखला रहा है। पहली बार 1996 में एचडी देवेगौड़ा सरकार के समय इसे पेश किया गया था, लेकिन वह केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह गया। इसके बाद 1998 और 2003 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इसे पास कराने की चार अलग-अलग गंभीर कोशिशें कीं। हर बार इसे भाजपा ने नहीं, बल्कि उन्हीं सहयोगियों ने रोका जो आज कांग्रेस के साथ खड़े हैं। 1998 में राजद सांसद सुरेंद्र प्रकाश यादव ने संसद में बिल का डॉक्यूमेंट छीनकर फाड़ दिया था। यह विरोध नहीं, बल्कि देश की नारी शक्ति का सरेआम अपमान था। 2004 से 2014 तक यूपीए के शासनकाल में सोनिया गांधी खुद को महिलाओं के अधिकारों की चैंपियन बताती रहीं। 2010 में राज्यसभा ने तो बिल पास कर दिया, लेकिन लोकसभा में इसे चार साल तक कभी पेश ही नहीं होने दिया गया। यह विपक्ष की वही सोचना थी जहाँ उनके प्रमुख पार्टनर मुलायम सिंह यादव ने पार्लियामेंट में खड़े होकर महिला सांसदों के खिलाफ अपशब्द कहे थे।

2014 के बाद का बदलाव और नारी शक्ति का संकल्प

​2014 में जब नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आए, तो भारतीय महिलाओं की स्थिति अत्यंत सोचनीय थी। करोड़ों महिलाएं खुले में शौच के लिए मजबूर थीं, उनके पास न गैस सिलेंडर था और न ही स्वच्छ पानी की सप्लाई। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में महिलाएं न तो सुरक्षित थीं और न ही स्वावलंबी। पिछले दस-बारह वर्षों में मोदी सरकार ने शौचालय निर्माण, उज्ज्वला योजना और जन धन खातों के जरिए महिलाओं को एक मजबूत आधार दिया। लेकिन जैसे ही सरकार ने यह पक्का करने की कोशिश की कि जमीन से उठने वाली महिलाओं को संसद में उनकी सही जगह मिले, विपक्ष ने फिर इसे पटरी से उतार दिया। वे इसे तकनीकी शब्दावली से ढंकने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन देश की महिलाएं यह जान चुकी हैं कि उनके सपनों को किसने कुचला है।

श्लोक ठाकुर की कलम से यह बात पूरी तरह साफ है कि यह लड़ाई कभी राजनैतिक क्रेडिट लेने की नहीं थी। सरकार ने विपक्ष को पूरा क्रेडिट लेने का प्रस्ताव दिया था क्योंकि लक्ष्य असल सशक्तिकरण था। लेकिन सत्ता की भूख और महिलाओं के प्रति तिरस्कार ने विपक्ष को एक बार फिर खलनायक बना दिया है। महिला विरोधी ताकतें भले ही आज बाधा डालने में सफल रही हों, लेकिन करोड़ों महिलाओं का आशीर्वाद इस सफर को जारी रखेगा। यह सिद्धांतों वाला नजरिया है, जो भारत माता और नारी शक्ति की सेवा में समर्पित है। जो लोग आज अवरोध बने हैं, उन्हें आने वाला कल और देश की जागरूक नारी शक्ति कभी माफ नहीं करेगी।

वॉइस ऑफ बिहार (VOB) न्यूज़ डेस्क की विशेष राजनैतिक रिपोर्ट।

आलेख: श्लोक ठाकुर की कलम से

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