गुरु-शिष्य परंपरा का ‘अपमान’: बगहा के सुरवाबारी स्कूल में शिक्षा की जगह ‘सेवा’ की पाठशाला, मोबाइल पर मगन मैडम और हाथ में पंखा झलतीं मासूम छात्राएं

बगहा (पश्चिम चंपारण)। बिहार सरकार एक ओर जहाँ ‘मिशन दक्ष’ और ‘निपुण भारत’ जैसे अभियानों के जरिए सरकारी स्कूलों की सूरत बदलने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों के चेहरे पर कालिख पोतने वाली खबरें पेश कर रही है। पश्चिम चंपारण जिले के बगहा दो प्रखंड से रविवार, 19 अप्रैल 2026 को एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने शिक्षा के मंदिर को ‘निजी दरबार’ में तब्दील कर दिया है। राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सुरवाबारी की प्रधानाध्यापक कुमारी मालती का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर बिजली की गति से प्रसारित हो रहा है, जिसमें वे अध्यापन जैसे पवित्र कार्य को छोड़कर ‘शाही सुख’ भोगती नजर आ रही हैं। वीडियो में जिस तरह से मासूम छात्राओं को शिक्षिका की ‘सेवा’ में लगाया गया है, वह न केवल बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन है, बल्कि उन अभिभावकों के भरोसे के साथ भी बड़ा विश्वासघात है जो अपने बच्चों को कलेक्टर और डॉक्टर बनाने का सपना लेकर स्कूल भेजते हैं। इस घटना ने एक बार फिर बिहार के ग्रामीण अंचलों में शिक्षकों की जवाबदेही और नैतिक पतन पर एक गंभीर विमर्श छेड़ दिया है।

शिक्षा के समय ‘निजी गपशप’: जब ब्लैकबोर्ड रहा वीरान

​प्रसारित वीडियो के दृश्य किसी को भी विचलित करने के लिए काफी हैं। कक्षा के भीतर, जहाँ शिक्षक को हाथ में चौक या पेन लेकर बच्चों को भविष्य का पाठ पढ़ाना चाहिए, वहां प्रधानाध्यापक कुमारी मालती कुर्सी पर बड़े आराम से बैठी हुई हैं। उनके एक हाथ में मोबाइल फोन है और वे किसी से लंबी बातचीत में मशगूल नजर आ रही हैं।

​सबसे ज्यादा पीड़ादायक दृश्य वह है जहाँ दो छोटी छात्राएं अपनी पढ़ाई छोड़कर शिक्षिका के बगल में खड़ी हैं। चिलचिलाती गर्मी के बीच, बिजली या पंखे की पर्याप्त व्यवस्था न होने का फायदा उठाते हुए, शिक्षिका ने उन मासूम बच्चियों को ‘हाथ का पंखा’ झलने के काम में लगा दिया है। वे बच्चियां बिना किसी विरोध के, यंत्रवत तरीके से अपनी गुरुमाता को हवा दे रही हैं, जबकि गुरुमाता का पूरा ध्यान मोबाइल पर चल रही बातचीत में है। यह दृश्य मध्यकालीन सामंती व्यवस्था की याद दिलाता है, जहाँ मातहतों से सेवा कराना अधिकार समझा जाता था। एक सरकारी स्कूल में, जहाँ समानता और अधिकारों की शिक्षा दी जानी चाहिए, वहां बचपन को इस तरह ‘बेगारी’ में झोंकना कानूनन और नैतिक रूप से अक्षम्य अपराध है।

बस्ते की जगह कुदाल: ड्रेस में ‘मजदूरी’ करता मासूम

​सुरवाबारी विद्यालय से जुड़ा यह अकेला विवाद नहीं है। एक अन्य वीडियो में स्थिति और भी भयावह नजर आती है। इसमें उसी विद्यालय का एक छात्र, जो स्कूल ड्रेस में है, हाथ में भारी कुदाल लेकर जमीन खोदते या सफाई करते हुए दिखाई दे रहा है। स्कूल के समय में छात्र के हाथ में किताब की जगह कुदाल होना यह दर्शाता है कि विद्यालय प्रशासन छात्रों को विद्यार्थी नहीं, बल्कि ‘घरेलू नौकर’ या ‘मजदूर’ समझ बैठा है।

​शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के तहत किसी भी बच्चे से विद्यालय परिसर में इस तरह के शारीरिक श्रम कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है। छात्र द्वारा कुदाल चलाना यह संकेत देता है कि स्कूल परिसर के रख-रखाव या अन्य कार्यों के लिए भी छात्रों की श्रमशक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह बच्चों के मानसिक विकास पर अत्यंत नकारात्मक प्रभाव डालता है और उनके भीतर शिक्षा के प्रति अरुचि पैदा करता है। बगहा के इस स्कूल में ‘बाल श्रम’ का यह रूप शिक्षा विभाग की निगरानी प्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

बीईओ का कड़ा रुख: स्पष्टीकरण के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तैयारी

​इस शर्मनाक वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद बगहा दो प्रखंड के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) फूदन राम ने मामले का संज्ञान लिया है। उन्होंने रविवार को मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि वीडियो उनके संज्ञान में आया है और दृश्य अत्यंत गंभीर हैं। बीईओ फूदन राम ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी प्रधानाध्यापक कुमारी मालती से 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण (Show Cause) मांगा है।

​अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि विद्यालय केवल बच्चों की पढ़ाई के लिए है, न कि शिक्षकों की व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के लिए। उन्होंने कहा कि “प्रसारित वीडियो के हर पहलू की बारीकी से जांच की जा रही है। अगर यह पाया जाता है कि शिक्षिका ने जानबूझकर बच्चों से पंखा झलवाया या उन्हें काम में लगाया, तो उनके खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई की जाएगी, जिसमें निलंबन भी शामिल हो सकता है।” फूदन राम के इस कड़े रुख से विद्यालय के अन्य शिक्षकों में भी हड़कंप मचा हुआ है। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि केवल स्पष्टीकरण काफी नहीं है, बल्कि ऐसी मानसिकता वाले शिक्षकों को शिक्षा व्यवस्था से ही बाहर किया जाना चाहिए।

बिहार की शिक्षा व्यवस्था और ‘निगरानी’ का संकट

​बिहार में शिक्षा विभाग ने ‘ई-शिक्षाकोष’ जैसे डिजिटल ऐप और निरीक्षण की कई प्रणालियां लागू की हैं, लेकिन सुरवाबारी जैसे सुदूर स्कूलों में ये प्रणालियां ‘नेटवर्क’ और ‘नियत’ की कमी के कारण विफल होती दिख रही हैं। जब प्रधानाध्यापक खुद ही नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हों, तो सहायक शिक्षकों और छात्रों से अनुशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

​यह घटना दर्शाती है कि केवल वेतन बढ़ा देने या बुनियादी ढांचे को सुधारने से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरेगी, जब तक कि शिक्षकों के भीतर ‘नैतिक उत्तरदायित्व’ का संचार न हो। कुमारी मालती का आचरण उस पूरी शिक्षक बिरादरी को बदनाम करता है जो निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर शिक्षक खुद को गाँव का ‘छोटा सरकार’ समझने लगते हैं और गरीब तबके के बच्चों को अपनी जागीर का हिस्सा मान लेते हैं। इस सामंती सोच को तोड़ने के लिए जिला स्तर पर एक सशक्त और निष्पक्ष निगरानी तंत्र की आवश्यकता है।

बच्चों के मनोविज्ञान पर प्रहार: कौन भरेगा ये घाव?

​जो छात्राएं आज हाथ में पंखा लेकर अपनी शिक्षिका को हवा दे रही हैं, उनके मन में ‘गुरु’ की क्या छवि बनेगी? क्या वे स्कूल को सीखने की जगह के रूप में देखेंगी या शोषण की जगह के रूप में? बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के कृत्य बच्चों के आत्मविश्वास को जड़ से खत्म कर देते हैं। वे खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं और उनके भीतर यह भावना घर कर जाती है कि सत्ता और पद का उपयोग दूसरों की सेवा लेने के लिए किया जाना चाहिए।

​बगहा की यह घटना केवल एक प्रखंड की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्थागत दोष का प्रतीक है जहाँ ‘चेक एंड बैलेंस’ की कमी है। अगर कोई ग्रामीण इस वीडियो को नहीं बनाता, तो शायद यह सिलसिला महीनों तक यूँ ही चलता रहता। अभिभावकों का कहना है कि वे पेट काटकर बच्चों को स्कूल भेजते हैं, लेकिन स्कूल में उन्हें ‘पंखे वाली’ और ‘मजदूर’ बना दिया जाता है। चंपारण की यह धरती, जो सत्याग्रह के लिए जानी जाती है, वहां शिक्षा के नाम पर हो रहा यह ‘असत्याग्रह’ बर्दाश्त के बाहर है।

भविष्य की राह: कार्रवाई या खानापूर्ति?

​19 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट इस उम्मीद के साथ समाप्त होती है कि बीईओ फूदन राम की जांच केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। कुमारी मालती से प्राप्त होने वाले स्पष्टीकरण का विश्लेषण निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए। यदि वीडियो की सत्यता प्रमाणित होती है, तो यह मामला केवल विभागीय अनुशासन का नहीं, बल्कि किशोर न्याय अधिनियम के उल्लंघन का भी बनता है।

​बगहा के नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग ने मांग की है कि जिले के सभी स्कूलों में औचक निरीक्षण बढ़ाया जाए और शिक्षकों के मोबाइल उपयोग पर क्लास के दौरान पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। शिक्षा मंत्री और शिक्षा विभाग के सचिव को इस मामले में हस्तक्षेप कर एक नजीर पेश करनी चाहिए, ताकि बिहार के किसी अन्य स्कूल में किसी छात्र को पंखा न झलना पड़े और न ही किसी छात्रा को क्लासरूम में कुदाल पकड़नी पड़े। सुरवाबारी की इन मासूम बच्चियों की आँखों में तैरते सवाल आज पूरे बिहार के शिक्षा तंत्र से जवाब मांग रहे हैं।

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