AEDO परीक्षा विवाद: आर्थिक अपराध इकाई की एंट्री से बढ़ा सियासी पारा, अब ‘स्पेशल-7’ की टीम खंगालेगी पेपर लीक के डिजिटल सुराग

पटना। बिहार में सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं और विवादों का चोली-दामन का साथ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सहायक शिक्षा विकास पदाधिकारी (AEDO) की परीक्षा को लेकर मचे घमासान के बीच अब सूबे की सबसे ताकतवर जांच एजेंसी आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने मोर्चा संभाल लिया है। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के गंभीर आरोपों को देखते हुए सरकार ने इस पूरे मामले की कमान ईओयू को सौंप दी है। 18 अप्रैल 2026 की यह कार्रवाई न केवल उन अभ्यर्थियों के लिए उम्मीद की किरण है जो शुचिता की मांग कर रहे थे, बल्कि उन शिक्षा माफियाओं के लिए भी बड़ी चेतावनी है जो सरकारी तंत्र में सेंधमारी की फिराक में रहते हैं। ईओयू ने इस केस को अपने हाथ में लेते ही मुंगेर और नालंदा के कनेक्शन को जोड़ना शुरू कर दिया है। अब जांच केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उस ‘रूट’ का पता लगाया जाएगा जहाँ से प्रश्न-पत्र के लीक होने या गड़बड़ी की साजिश की शुरुआत हुई थी। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होने की उम्मीद बढ़ गई है, क्योंकि जांच के दायरे में कई सफेदपोश और रसूखदार चेहरों के आने की संभावना जताई जा रही है।

एसपी राजेश कुमार के नेतृत्व में ‘विशेष जांच दल’ (SIT) का गठन

​ईओयू ने मामले की संवेदनशीलता और इसके व्यापक फैलाव को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। इस टीम का नेतृत्व अनुभवी पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार को सौंपा गया है। राजेश कुमार अपनी सधी हुई कार्यशैली और संगठित अपराध के खिलाफ अपनी सख्त कार्रवाई के लिए जाने जाते हैं। टीम में उनके साथ कई तेज-तर्रार उपाधीक्षक (DSP), निरीक्षक (Inspectors) और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

​इस एसआईटी की प्राथमिकता उन कड़ियों को जोड़ना है जो मुंगेर की गिरफ्तारियों और नालंदा के संदिग्ध ठिकानों के बीच बिखरी हुई हैं। टीम को निर्देश दिए गए हैं कि वे न केवल पकड़े गए अभियुक्तों के बयान दर्ज करें, बल्कि उनके मोबाइल डेटा और डिजिटल फुटप्रिंट्स का वैज्ञानिक विश्लेषण भी करें। जांच टीम का मुख्य फोकस इस बात पर है कि क्या यह केवल एक स्थानीय स्तर की साजिश थी या इसके पीछे अंतरराज्यीय परीक्षा माफिया का कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। राजेश कुमार ने पदभार संभालते ही साक्ष्यों के संकलन (Collection of evidence) के लिए छापेमारी की योजना बनानी शुरू कर दी है।

मुंगेर और नालंदा का ‘खतरनाक’ सिंडिकेट: जांच के घेरे में

​जांच की सुई फिलहाल मुंगेर और नालंदा के इर्द-गिर्द घूम रही है। विदित हो कि 13 अप्रैल 2026 को मुंगेर पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए परीक्षा से ठीक एक दिन पहले 20 अभ्यर्थियों और 2 मास्टरमाइंडों को गिरफ्तार किया था। इनके पास से कई संदिग्ध उपकरण और दस्तावेज मिले थे। वहीं, नालंदा में भी इसी तरह के इनपुट मिले हैं कि वहां के कुछ ‘सेटिंग गेटिंग’ गिरोहों ने अभ्यर्थियों से मोटी रकम वसूली थी।

​ईओयू अब इन दोनों जिलों में दर्ज एफआईआर (FIR) को एक साथ जोड़कर एक ‘कोऑर्डिनेटेड इनवेस्टिगेशन’ कर रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मुंगेर में पकड़े गए गिरोह के पास प्रश्न-पत्र पहुँचने का ‘सोर्स’ क्या था। हालांकि, बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने अपने बयान में पेपर लीक की बात को सिरे से खारिज किया है और इसे केवल ‘साजिश’ बताया है, लेकिन ईओयू इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि क्या प्रश्न-पत्र की डिजिटल कॉपी किसी स्तर पर लीक हुई थी? मुंगेर और नालंदा के इस सिंडिकेट के तार उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ संदिग्ध गिरोहों से जुड़ने की भी आशंका है।

एसटीएफ और साइबर सेल की जुगलबंदी: डिजिटल साक्ष्यों पर जोर

​आज के दौर में प्रश्न-पत्र लीक करने का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। अब कागज के बजाय टेलीग्राम, व्हाट्सएप और डार्क वेब के जरिए खेल खेला जाता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए ईओयू ने बिहार पुलिस की विशेष कार्य बल (STF) और साइबर सेल की सहायता ली है। एसटीएफ की टीम उन फरार संदिग्धों की तलाश में जुटी है जो छापेमारी के दौरान भागने में सफल रहे थे।

​वहीं, साइबर सेल की टीम उन मोबाइल नंबरों और आईपी एड्रेस (IP Address) को ट्रैक कर रही है जिनका उपयोग प्रश्न-पत्रों की कथित फोटो भेजने या पैसे के लेनदेन के लिए किया गया। डिजिटल ट्रांजैक्शन की जांच से यह साफ होगा कि किस स्तर पर और कितने पैसों का लेन-देन हुआ। ईओयू ने बैंकों से कुछ संदिग्ध खातों की जानकारी भी मांगी है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही मैसेज डिलीट कर दिए गए हों, लेकिन सर्वर के जरिए उन तक पहुँचना अब संभव है। यह डिजिटल सबूत ही अदालत में आरोपियों के खिलाफ सबसे मजबूत गवाह बनेंगे।

बीपीएससी का बचाव और ईओयू की निष्पक्षता: एक संतुलित नजरिया

​इस पूरे घटनाक्रम में बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) का पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आयोग ने 18 अप्रैल को ही एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर स्पष्ट किया था कि मुंगेर की घटना दरअसल प्रशासन की मुस्तैदी का उदाहरण है, जहाँ परीक्षा से पहले ही अपराधियों को पकड़ लिया गया। आयोग का दावा है कि 14 अप्रैल को आयोजित परीक्षा पूरी तरह शुचितापूर्ण रही और प्रश्न-पत्र लीक होने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

​ईओयू की जांच अब इसी बिंदु के इर्द-गिर्द घूमेगी। एक ओर आयोग अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईओयू यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि अभ्यर्थियों के मन में कोई संदेह न रहे। ईओयू की कार्यप्रणाली स्वतंत्र है, और वह यह जांच करेगी कि क्या गिरफ्तार आरोपियों के पास जो सामग्री थी, वह वास्तविक प्रश्न-पत्र से मेल खाती थी या नहीं। इस संतुलित जांच से ही यह तय होगा कि परीक्षा रद्द होनी चाहिए या नहीं। अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले सभी तकनीकी और भौतिक साक्ष्यों का मिलान करेंगे ताकि न्याय के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न हो।

खुलेंगे रसूखदारों के राज? ‘बड़े नामों’ पर गिर सकती है गाज

​एईडीओ पेपर लीक कांड में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, राजनैतिक गलियारों में भी बेचैनी देखी जा रही है। सूत्रों की मानें तो पकड़े गए अभियुक्तों के कॉल रिकॉर्ड्स में कुछ रसूखदार लोगों और शिक्षा विभाग के कुछ निचले स्तर के कर्मियों के नंबर मिले हैं। ईओयू इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस साजिश को किसी सरकारी ‘इनसाइडर’ (भीतरी व्यक्ति) का समर्थन प्राप्त था?

​बिहार में पहले भी कई भर्ती परीक्षाओं में बड़े अधिकारियों और राजनेताओं की संलिप्तता सामने आती रही है। ईओयू के वरिष्ठ अधिकारियों ने निर्देश दिया है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होनी चाहिए, चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। आने वाले 48 से 72 घंटों में ईओयू की टीम कुछ और बड़ी गिरफ्तारियां कर सकती है। यदि यह साबित होता है कि प्रश्न-पत्र परीक्षा से पहले किसी भी डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध था, तो आयोग के लिए अपनी साख बचाना एक बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल, ईओयू मुख्यालय में बैठकों का दौर जारी है और समय-समय पर सरकार को रिपोर्ट भेजी जा रही है।

अभ्यर्थियों की दुविधा और भविष्य की राह

​लाखों अभ्यर्थियों के लिए यह समय बहुत कठिन है। जिन्होंने सालों मेहनत की है, वे इस डर में हैं कि कहीं माफियाओं के चक्कर में उनकी मेहनत पर पानी न फिर जाए। सोशल मीडिया पर #AEDOPaperLeak जैसे ट्रेंड्स के बीच अभ्यर्थियों की मांग है कि ईओयू अपनी जांच जल्द पूरी करे और सत्य सामने लाए।

​ईओयू की इस कार्रवाई ने यह संदेश तो दे दिया है कि सरकार अब परीक्षा माफियाओं को बख्शने के मूड में नहीं है। एआई आधारित मॉनिटरिंग और एसटीएफ की सक्रियता से यह उम्मीद जगी है कि अब ‘सिस्टम’ के छेद भरे जाएंगे। 18 अप्रैल 2026 की यह शाम बिहार की प्रतियोगी परीक्षाओं के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। अब सबकी निगाहें एसपी राजेश कुमार की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि बिहार की भर्ती परीक्षाओं में ‘शुचिता’ केवल एक शब्द है या एक हकीकत। ईओयू की यह जांच बिहार के गौरवशाली शैक्षणिक इतिहास को बचाने की एक बड़ी लड़ाई बन गई है।

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