​गोपालगंज की उस सनसनीखेज रात का अंत: दो साल बाद नाले से निकला ‘चंदन’ का सच, प्रेम की सजा मौत और फिर दो फीट गहरी कब्र

गोपालगंज। अपराध चाहे कितना भी गहरा दफन क्यों न हो, वह एक न एक दिन सतह पर आ ही जाता है। बिहार के गोपालगंज जिले में एक ऐसी ही रूह कंपा देने वाली वारदात का खुलासा हुआ है, जिसने पुलिसिया तफ्तीश और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। दो साल पहले जो युवक एक उत्सव में शामिल होने निकला था, उसका अस्तित्व अब केवल एक नरमुंड और जबड़े के अवशेषों के रूप में बरामद हुआ है। कुचायकोट थाना क्षेत्र के सासामुसा सिरिसिया गांव के 22 वर्षीय चंदन कुमार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम खौफनाक नहीं है। 780 दिनों तक जिस मां ने अपने बेटे की वापसी की उम्मीद में थाने की चौखट और अदालत के गलियारों को नापा, उसे अंततः अपने लाल की पहचान के तौर पर केवल हड्डियों के टुकड़े नसीब हुए। यह मामला न केवल एक जघन्य हत्या की दास्तां है, बल्कि ‘ऑनर किलिंग’ और ‘साक्ष्य मिटाने’ की उस क्रूर मानसिकता का भी प्रमाण है, जहाँ प्रेम की परिणति श्मशान की राख के बजाय एक गंदे नाले की सिल्ट में कर दी गई।

तिलक समारोह और वह रहस्यमयी रात: जब मोबाइल की घंटी मौन हो गई

​वारदात की शुरुआत 28 फरवरी 2024 की शाम से होती है। सिरिसिया गांव का रहने वाला चंदन कुमार (22 वर्ष) उस दिन काफी उत्साहित था। शाम के करीब 6 बजे थे, जब उसने अपनी मां से यह कहकर घर छोड़ा कि वह अपने चार दोस्तों के साथ एक तिलक समारोह में शामिल होने जा रहा है। गाँव के माहौल में यह एक सामान्य बात थी। लेकिन रात गहराने के साथ जब चंदन घर नहीं लौटा, तो परिवार की चिंता बढ़ने लगी। देर रात जब उसकी माँ ने उसके मोबाइल पर फोन किया, तो वह स्विच ऑफ मिला। उस रात की खामोशी ने आने वाले दो वर्षों के दर्द की पटकथा लिख दी थी।

​अगली सुबह चंदन की माँ ने उसके उन दोस्तों को फोन किया जिनके साथ वह गया था, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया ने संदेह के बीज बो दिए। दोस्तों ने चंदन के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया। एक माँ का दिल भांप चुका था कि दाल में कुछ काला है। 29 फरवरी 2024 को कुचायकोट थाने में तीन नामजद आरोपियों के खिलाफ लिखित शिकायत दी गई। पुलिस ने शुरुआती दौर में आरोपियों को हिरासत में लिया और उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भी भेजा, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में वे जल्द ही रिहा हो गए। कानून की इसी ‘लूपहोल’ ने अपराधियों के हौसले बुलंद कर दिए और चंदन का गायब होना एक अनसुलझी पहेली बनकर रह गया।

माँ की जिद और पुलिस कप्तान का एक्शन: दो साल बाद खुला ‘पेंडोरा बॉक्स’

​अपराधियों की रिहाई के बाद भी चंदन का परिवार हार मानने को तैयार नहीं था। मामले को दबाने की कोशिशें हुईं, लेकिन परिजन हाई कोर्ट तक जा पहुँचे। आखिरकार शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को परिवार ने गोपालगंज के पुलिस अधीक्षक (SP) विनय तिवारी के सामने अपनी फरियाद रखी। एसपी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल एक विशेष टीम का गठन किया। इस बार पुलिस ने ‘रूटीन पूछताछ’ के बजाय वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दबाव वाली पद्धति अपनाई।

​नामजद आरोपियों को फिर से हिरासत में लिया गया। जब पुलिस ने सख्ती बरती और कड़ियों को आपस में जोड़ा, तो अपराधियों का धैर्य जवाब दे गया। पूछताछ के दौरान उन्होंने जो खुलासा किया, उसने कमरे में मौजूद पुलिस अधिकारियों के माथे पर पसीना ला दिया। आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने दो साल पहले ही चंदन की गला दबाकर हत्या कर दी थी और साक्ष्य छिपाने के लिए उसके शव को एक नाले में दफन कर दिया था। आरोपियों की निशानदेही पर जब पुलिस ने खुदाई शुरू कराई, तो वहां से मिट्टी में सना एक मानव नरमुंड और जबड़ा बरामद हुआ। यह दृश्य देखकर मौके पर मौजूद ग्रामीणों की भीड़ में सन्नाटा पसर गया।

‘प्रेम प्रसंग’ की खूनी रंजिश: बहन से प्यार की कीमत जान देकर चुकाई

​कुचायकोट थानाध्यक्ष दर्पण सुमन के अनुसार, इस जघन्य हत्याकांड की मुख्य वजह प्रेम प्रसंग रही है। जाँच में यह स्पष्ट हुआ है कि चंदन का प्रेम संबंध मुख्य आरोपी की बहन के साथ था। ग्रामीण अंचलों में आज भी ‘इज्जत’ के नाम पर ऐसी रंजिशें आम हैं। आरोपियों को यह रिश्ता कतई नागवार था और वे इसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर चोट मान रहे थे। उन्होंने चंदन को रास्ते से हटाने के लिए एक सुनियोजित साजिश रची।

​साजिश के तहत, 28 फरवरी की उस शाम चंदन को ‘दोस्ती’ के बहाने घर से बुलाया गया। तिलक समारोह का तो केवल एक बहाना था। रास्ते में एक सुनसान जगह पर मुख्य आरोपी ने अपने दो सहयोगियों के साथ मिलकर चंदन को काबू में किया और गमछे से उसका गला घोंट दिया। हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी, इसलिए उन्होंने उसे नाले के पास दफना दिया ताकि पानी और कीचड़ के कारण शव जल्दी गल जाए और किसी को कभी उसकी गंध तक न आए। दो वर्षों तक यह रहस्य दफन रहा, लेकिन अपराध की जड़ें अंततः उखड़ ही गईं।

वैज्ञानिक साक्ष्य और फॉरेंसिक चुनौती: अब डीएनए पर टिकी है पहचान

​भले ही आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है और चंदन की माँ ने बरामद अवशेषों को अपने बेटे का मान लिया है, लेकिन कानूनन इसे सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों की आवश्यकता है। पुलिस ने बरामद नरमुंड और जबड़े को तत्काल फॉरेंसिक जाँच और डीएनए (DNA) टेस्ट के लिए भेज दिया है। चूँकि शव पूरी तरह गल चुका है और केवल हड्डियाँ बची हैं, इसलिए डीएनए मिलान ही वह अंतिम कड़ी होगी जो इस मामले को अदालत में ठोस आधार प्रदान करेगी।

​फिलहाल पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जबकि तीसरे हत्यारोपी की तलाश में छापेमारी जारी है। दर्पण सुमन का कहना है कि पुलिस के पास अब पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं। आरोपियों का कबूलनामा और बरामदगी एक मजबूत ‘रिकवरी केस’ बनाती है। यह गिरफ्तारी उन अपराधियों के लिए एक चेतावनी है जो यह सोचते हैं कि वक्त बीतने के साथ उनके गुनाह पुराने होकर मिट जाएंगे।

समाज का चेहरा और न्याय की गुहार: सुलगते सवाल

​इस घटना ने सासामुसा सिरिसिया गांव में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। स्थानीय लोग इस बात से स्तब्ध हैं कि उनके ही बीच रहने वाले कुछ युवकों ने इतनी क्रूरता से अपने ही दोस्त की जान ले ली और दो साल तक सामान्य जीवन जीते रहे। यह वारदात समाज के उस चेहरे को भी दिखाती है जहाँ ‘प्रेम’ आज भी एक अपराध माना जाता है और ‘हत्या’ को उसका समाधान।

​चंदन के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। दो साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद जब उन्हें न्याय की उम्मीद दिखी, तो वह एक त्रासदी के रूप में सामने आई। अब ग्रामीण दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग कर रहे हैं। गोपालगंज पुलिस के लिए यह एक बड़ी सफलता जरूर है, लेकिन यह मामला यह भी याद दिलाता है कि यदि शुरुआत में ही ऐसी सख्ती दिखाई गई होती, तो शायद चंदन के अवशेषों के बजाय उसका शरीर मिल पाता और साक्ष्य और भी पुख्ता होते। अब सबकी निगाहें फॉरेंसिक रिपोर्ट और फरार आरोपी की गिरफ्तारी पर टिकी हैं।

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