
पटना। बिहार की राजधानी पटना की फिजाओं में शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को रंगों और कल्पनाओं का एक अनूठा संगम देखने को मिला। अवसर था ‘विश्व धरोहर दिवस’ का, जिसे यादगार बनाने के लिए कला एवं संस्कृति विभाग और बिहार विरासत विकास समिति के साझा प्रयासों से एक भव्य चित्रकला प्रतियोगिता “चित्रकारी” का आयोजन किया गया। पटना स्थित बिहार विरासत विकास समिति के परिसर में आयोजित इस प्रतियोगिता ने शहर के नन्हे कलाकारों को एक ऐसा मंच प्रदान किया, जहाँ उन्होंने न केवल अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, बल्कि अपनी कला के माध्यम से यह भी साबित किया कि विरासत केवल पत्थरों और स्मारकों में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच और संवेदनाओं में भी जीवित रहती है। सुबह से ही परिसर में बच्चों का उत्साह देखते ही बन रहा था। हाथों में ब्रश और रंगों की डिब्बी थामे ये बच्चे अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उतारने के लिए बेताब दिखे। इस आयोजन ने न केवल बच्चों की रचनात्मकता को निखारा, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान किया।
उद्घाटन और सहभागी शिक्षण संस्थानों का उत्साह
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत बिहार विरासत विकास समिति के उपकार्यपालक निदेशक अरविंद कुमार तिवारी, समन्वयक डॉ. अमित रंजन और सहायक निदेशक डॉ. अजय कुमार सिंह के द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर की गई। उद्घाटन सत्र के दौरान अधिकारियों ने बच्चों का उत्साहवर्धन किया और उन्हें बताया कि कला समाज का आईना होती है। इस प्रतियोगिता में शहर के विभिन्न प्रतिष्ठित विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
सहभागी संस्थानों में प्राथमिक एवं उच्च विद्यालय के साथ-साथ पटना तारामंडल और ‘वॉइस ईंटू थिएटर’ जैसे संस्थानों के बच्चे भी शामिल थे। इन बच्चों ने जिस अनुशासन और लगन के साथ अपनी कलाकृतियों को आकार दिया, वह वहां मौजूद दर्शकों के लिए किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। प्रतियोगिता को विभिन्न आयु वर्गों में विभाजित किया गया था, ताकि हर बच्चे को अपनी योग्यता के अनुसार प्रतिस्पर्धा करने का समान अवसर मिल सके। उद्घाटन के बाद पूरा परिसर एक बड़े ‘ओपन-एयर स्टूडियो’ में तब्दील हो गया, जहाँ हर तरफ केवल रंग, कागज और बच्चों की एकाग्रता दिखाई दे रही थी।
विषयों की विविधता: पर्यावरण से लेकर सांस्कृतिक धरोहर तक
“चित्रकारी” प्रतियोगिता के लिए जो विषय निर्धारित किए गए थे, वे बच्चों की सोच को व्यापक आयाम देने वाले थे। बच्चों को पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत, स्वच्छता, प्रकृति और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर अपनी रचनात्मकता दिखाने को कहा गया था। कागज के सफेद पन्नों पर जब बच्चों के ब्रश चले, तो कहीं गंगा की अविरल धारा दिखी, तो कहीं महाबोधि मंदिर की भव्यता। कुछ बच्चों ने अपनी पेंटिंग के जरिए बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताई, तो कुछ ने ‘स्वच्छ भारत’ के सपने को रंगों से सजाया।
विशेष रूप से, सांस्कृतिक विरासत पर आधारित चित्रों में बिहार की लोक कला और ऐतिहासिक स्मारकों का सुंदर चित्रण देखने को मिला। बच्चों ने अपनी कला के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर हम आज अपनी प्रकृति और विरासत को नहीं बचाएंगे, तो भविष्य के लिए कुछ भी शेष नहीं रहेगा। रंगों के संयोजन और विषयों के चुनाव में बच्चों की परिपक्वता ने निर्णायक मंडल को भी काफी प्रभावित किया। उनकी पेंटिंग्स में सादगी के साथ-साथ एक गहरा सामाजिक संदेश भी छिपा था, जो यह बताता है कि आज का बचपन अपनी जड़ों और पर्यावरण के प्रति कितना सजग है।
शीर्ष-10 प्रतिभागियों का सम्मान और प्रोत्साहन
प्रतिस्पर्धा के कड़े दौर के बाद निर्णायकों के लिए विजेताओं का चयन करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। पेंटिंग्स की गुणवत्ता और उनमें छिपे संदेश को आधार बनाकर शीर्ष-10 प्रतिभागियों का चयन किया गया। कार्यक्रम के समापन सत्र में बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक कृष्ण कुमार ने इन चयनित मेधावी बच्चों को पुरस्कृत किया। विजेताओं को स्मृति चिह्न और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
कृष्ण कुमार ने पुरस्कार वितरण के दौरान केवल विजेताओं की ही नहीं, बल्कि हर उस बच्चे की सराहना की जिसने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था। उन्होंने कहा कि कला में हार-जीत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण ‘अभिव्यक्ति’ होती है। जो बच्चे टॉप-10 में स्थान नहीं बना पाए, उन्हें भी भागीदारी प्रमाण पत्र देकर प्रोत्साहित किया गया, ताकि उनका उत्साह बना रहे और वे भविष्य में और बेहतर कर सकें। पुरस्कार पाकर बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान थी, वह इस सफल आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।
विरासत और पहचान: कार्यपालक निदेशक का संदेश
पुरस्कार वितरण के बाद उपस्थित जनसमूह और बच्चों को संबोधित करते हुए कार्यपालक निदेशक कृष्ण कुमार ने विरासत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत केवल इतिहास की कोई निर्जीव धरोहर नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक पहचान है। यह वह धुरी है जिस पर हमारा भविष्य टिका है।” उन्होंने बच्चों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स की सराहना करते हुए कहा कि जिस तरह से नन्हे हाथों ने विरासत, परंपरा और प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को कागज पर उकेरा है, वह वास्तव में प्रेरणादायक है।
कृष्ण कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे आयोजनों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि जब कोई बच्चा किसी ऐतिहासिक स्मारक या प्रकृति का चित्र बनाता है, तो वह अनजाने में ही उसके महत्व को अपने भीतर आत्मसात कर लेता है। यह जुड़ाव ही भविष्य में विरासत के संरक्षण की नींव रखता है। उन्होंने अभिभावकों और शिक्षकों से भी अपील की कि वे बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास को समझने के लिए भी प्रेरित करें।
रचनात्मकता को बढ़ावा और भविष्य की संभावनाएं
कला एवं संस्कृति विभाग की यह पहल बिहार में बच्चों के बीच सांस्कृतिक चेतना जगाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। “चित्रकारी” जैसे आयोजनों से न केवल बच्चों की कलात्मक क्षमता का विकास होता है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है। पटना के सैंडिस कंपाउंड या अन्य सार्वजनिक स्थलों की तरह ही बिहार विरासत विकास समिति का परिसर भी अब ऐसी गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा है।
अभिभावकों ने भी इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि मोबाइल और गैजेट्स के दौर में बच्चों को रंगों और कागज के करीब लाना एक सराहनीय प्रयास है। इस प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक स्वस्थ माध्यम मिला। विभाग की योजना है कि आने वाले समय में ऐसे आयोजनों को जिला स्तर पर भी ले जाया जाए, ताकि बिहार के सुदूर इलाकों में छिपी प्रतिभाओं को भी अपनी पहचान बनाने का मौका मिल सके।
निष्कर्ष के बिना: रंगों के साथ खत्म हुई एक यादगार शाम
18 अप्रैल 2026 की यह शाम पटना के लिए केवल एक प्रतियोगिता का समापन नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के संरक्षकों के तैयार होने की एक नई शुरुआत थी। जब बच्चे अपने प्रमाण पत्र लेकर परिसर से बाहर निकल रहे थे, तो उनके हाथों में भले ही कागज के टुकड़े थे, लेकिन उनकी आँखों में अपनी विरासत के प्रति एक नई चमक और सम्मान का भाव था। “चित्रकारी” ने यह साबित कर दिया कि अगर सही दिशा और मंच मिले, तो हमारा बचपन दुनिया को बदलने वाले संदेश बड़े ही खूबसूरत ढंग से दे सकता है। बिहार की यह सांस्कृतिक विरासत अब सुरक्षित हाथों में है, क्योंकि इसे सहेजने का संकल्प अब नन्हे कंधों ने भी उठा लिया है।


