
भागलपुर/सबौर। बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी अध्याय जुड़ने जा रहा है। अब तक धान, गेहूं और मक्के की पारंपरिक लकीर पीट रहे बिहार के खेतों में अब विदेशी ‘सुपरफूड’ की खुशबू महकने वाली है। सिल्क सिटी भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर ने एक साहसिक और दूरगामी पहल करते हुए ‘ब्लूबेरी’ (Blueberry) की खेती का सफल आगाज कर दिया है। यह वही फल है जिसके लिए अब तक भारतीय बाजार पूरी तरह से अमेरिका, कनाडा और पोलैंड जैसे देशों के आयात पर निर्भर रहता था। लेकिन सबौर के वैज्ञानिकों की मेहनत ने यह साबित कर दिया है कि अगर तकनीक और इच्छाशक्ति का मेल हो, तो सात समंदर पार का स्वाद बिहार की मिट्टी में भी घोला जा सकता है। इस पहल से न केवल सूबे के किसानों की तकदीर बदलने की उम्मीद है, बल्कि बिहार को ‘बागवानी हब’ के रूप में वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में यह एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
अमेरिका से सबौर तक: कैसे संभव हुई ‘नीला सोना’ की एंट्री?
ब्लूबेरी, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘नीला सोना’ कहा जाता है, मुख्य रूप से ठंडे और शीतोष्ण (Temperate) जलवायु का पौधा है। अमेरिका के मिशिगन और कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया जैसे प्रांतों में इसकी बंपर पैदावार होती है। भारत में इसकी उपलब्धता केवल बड़े शहरों के चुनिंदा सुपरमार्केट तक सीमित रही है, जहाँ इसकी कीमतें आसमान छूती हैं। ऐसे में बिहार जैसे गर्म और आर्द्र (Humid) जलवायु वाले प्रदेश में इसकी खेती के बारे में सोचना भी किसी चुनौती से कम नहीं था।
सबौर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ वर्षों से इस पर गहन शोध किया कि क्या ब्लूबेरी की ऐसी प्रजातियों को विकसित या अनुकूलित किया जा सकता है जो बिहार के बढ़ते तापमान को सहन कर सकें। विश्वविद्यालय के कुलपति डी.आर. सिंह के मार्गदर्शन में चली इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य फसल विविधीकरण (Crop Diversification) था। कुलपति डी.आर. सिंह का मानना है कि पारंपरिक फसलों से किसान केवल अपनी जीविका चला सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें लखपति बनाना है, तो ‘हाई-वैल्यू’ वाली फसलों की ओर मुड़ना ही होगा। ब्लूबेरी इसी रणनीति का एक हिस्सा है, जो कम लागत और कम क्षेत्रफल में किसानों को मोटा मुनाफा दे सकती है।
कुलपति का विजन: पारंपरिक खेती से ‘स्मार्ट फार्मिंग’ की ओर
बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डी.आर. सिंह ने इस नई शुरुआत पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज के दौर में खेती को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने बताया कि सबौर में ब्लूबेरी की खेती का प्रयोग सफल रहा है और अब इसे प्रायोगिक स्तर से निकालकर किसानों के खेतों तक पहुँचाने की तैयारी है।
कुलपति के अनुसार, ब्लूबेरी की खेती के लिए सबौर की मिट्टी और यहाँ की जलवायु को अनुकूल बनाने के लिए विशेष ‘मल्चिंग’ और ‘ड्रिप इरिगेशन’ तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि बिहार का किसान केवल स्थानीय बाजारों पर निर्भर न रहे। जब हमारे यहाँ की ब्लूबेरी तैयार होगी, तो इसकी मांग न केवल पटना या कोलकाता में होगी, बल्कि हम इसे निर्यात करने की स्थिति में भी होंगे। यह प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और किसानों की आय दोगुनी करने के सपने को साकार करने की दिशा में एक ठोस कदम है।”
वैज्ञानिक नजरिया: एंटीऑक्सीडेंट का खजाना और सुपरफूड की ताकत
खेती की तकनीक के साथ-साथ इस फल की पौष्टिकता ने भी वैज्ञानिकों को काफी उत्साहित किया है। विश्वविद्यालय की कृषि वैज्ञानिक प्रीति सिंह ने ब्लूबेरी के गुणों पर रोशनी डालते हुए इसे ‘आधुनिक युग का अमृत’ करार दिया। प्रीति सिंह के मुताबिक, ब्लूबेरी केवल स्वाद में ही लाजवाब नहीं है, बल्कि यह सेहत के लिए औषधीय गुणों से भरपूर है। इसे ‘सुपरफूड’ की श्रेणी में इसलिए रखा गया है क्योंकि इसमें ‘एंथोसायनिन’ (Anthocyanin) नामक एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
प्रीति सिंह ने बताया कि आज के तनावपूर्ण जीवन और बढ़ती बीमारियों के बीच ब्लूबेरी का सेवन रामबाण साबित हो सकता है। यह न केवल शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाता है, बल्कि मधुमेह (Diabetes), हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में भी सहायक है। आँखों की रोशनी और याददाश्त बढ़ाने के लिए भी डॉक्टर इसे खाने की सलाह देते हैं। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि ताजी ब्लूबेरी की गुणवत्ता स्टोर किए गए विदेशी फलों से कहीं बेहतर होती है। ऐसे में जब बिहार के लोगों को अपने ही राज्य में उगी हुई ताजी ब्लूबेरी मिलेगी, तो यह स्वास्थ्य क्रांति की तरह होगा।
किसानों के लिए मुनाफे का गणित: क्यों है यह फायदे का सौदा?
बिहार के किसानों के लिए ब्लूबेरी की खेती आकर्षण का केंद्र इसलिए भी है क्योंकि इसका बाजार मूल्य बहुत अधिक है। वर्तमान में भारत में ब्लूबेरी की कीमत 1000 रुपये से लेकर 2000 रुपये प्रति किलो तक रहती है। चूँकि इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है और आपूर्ति कम है, इसलिए किसानों को इसके लिए कभी भी खरीदार की कमी नहीं खलेगी।
सबौर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार, एक बार पौधा लगाने के बाद यह कई वर्षों तक फल देता है। इसके पौधों को बहुत अधिक जमीन की आवश्यकता नहीं होती, इसे बड़े गमलों या ‘ग्रो बैग्स’ में भी उगाया जा सकता है, जो ‘अर्बन फार्मिंग’ (शहरी खेती) के लिए भी एक बेहतरीन विकल्प है। कृषि वैज्ञानिक प्रीति सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय अब किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित करेगा, जहाँ उन्हें मिट्टी के पीएच (pH) मान को बनाए रखने और जैविक खाद के उपयोग के बारे में जानकारी दी जाएगी।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि, ब्लूबेरी की खेती बिहार में पूरी तरह सफल बनाने के लिए कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती यहाँ की भीषण गर्मी है। ब्लूबेरी के पौधों को तेज लू और तपिश से बचाने के लिए ‘नेट हाउस’ या ‘पॉली हाउस’ की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा, इसकी सिंचाई के लिए पानी की सटीक मात्रा का होना जरूरी है, जिसके लिए ड्रिप सिंचाई सबसे उपयुक्त है।
विश्वविद्यालय प्रशासन इन चुनौतियों से निपटने के लिए सब्सिडी और सरकारी योजनाओं को जोड़ने की योजना बना रहे हैं। कुलपति डी.आर. सिंह ने कहा कि वे राज्य सरकार से बातचीत कर रहे हैं ताकि ब्लूबेरी की खेती करने वाले किसानों को शुरुआती निवेश में मदद मिल सके। यदि सबौर का यह प्रयोग बड़े पैमाने पर सफल होता है, तो आने वाले कुछ वर्षों में बिहार का भागलपुर क्षेत्र ‘मैंगो सिटी’ के साथ-साथ ‘ब्लूबेरी हब’ के नाम से भी जाना जाएगा।
एक नई कृषि क्रांति की आहट
सबौर में विदेशी फल की इस एंट्री ने बिहार की कृषि छवि को एक नया आयाम दिया है। अब तक बिहार को केवल पिछड़ेपन या बाढ़ की विभीषिका के नजरिए से देखा जाता था, लेकिन अब यहाँ के वैज्ञानिक और किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप खेती कर रहे हैं। स्ट्रॉबेरी और ड्रैगन फ्रूट की सफल खेती के बाद अब ब्लूबेरी का आगमन यह साबित करता है कि बिहार की मिट्टी में हर वो बीज पनपने की क्षमता है, जिसे तकनीक और मेहनत का सहारा मिले।
18 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट इस बात की गवाह है कि सबौर का बिहार कृषि विश्वविद्यालय केवल किताबी शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जमीन पर बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध है। अब देखना यह होगा कि बिहार के प्रगतिशील किसान इस ‘नीले सोने’ को कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से अपनाते हैं। इतना तो तय है कि जिस दिन बिहार की ब्लूबेरी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी चमक बिखेरेगी, उस दिन राज्य के विकास की कहानी एक नई स्याही से लिखी जाएगी।


