बिहार कृषि विश्वविद्यालय में खरीफ 2026 की महातैयारी: वैज्ञानिकों और किसानों के साझा मंथन से तैयार हुआ सात जिलों का ‘समृद्धि रोडमैप’, तकनीक और नवाचार पर जोर

सबौर (भागलपुर)। खेती-किसानी के भविष्य को वैज्ञानिक आधार देने और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच किसानों की उपज को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर में एक महत्वपूर्ण वैचारिक समागम संपन्न हुआ। शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026 को विश्वविद्यालय के सभाकक्ष में जोन IIIA के अंतर्गत ‘इकतीसवीं क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रसार सलाहकार समिति’ (ZREAC) की बैठक आयोजित की गई। यह बैठक आगामी खरीफ 2026 सीजन के लिए रणनीतिक तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। अंग प्रदेश की इस उर्वर भूमि पर सात जिलों—भागलपुर, बांका, मुंगेर, खगड़िया, शेखपुरा, लखीसराय और जमुई—के कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों ने एक साथ बैठकर उन तकनीकी बाधाओं पर चर्चा की जो अक्सर किसानों की मेहनत पर पानी फेर देती हैं। इस बैठक का मुख्य स्वर ‘प्रयोगशाला से खेत तक’ की दूरी को कम करना और अत्याधुनिक शोध को सीधे किसान के हल तक पहुँचाना था।

अनुसंधान और प्रसार के बीच की कड़ी: एक साझा विजन

​बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर का इतिहास गौरवशाली रहा है और अब कुलपति डी. आर. सिंह के नेतृत्व में यह विश्वविद्यालय अनुसंधान के साथ-साथ प्रसार (Extension) के क्षेत्र में भी नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। बैठक की अध्यक्षता कर रहे निदेशक अनुसंधान अनिल कुमार सिंह ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि अनुसंधान तब तक सार्थक नहीं है जब तक उसका लाभ गांव के अंतिम छोर पर खड़े किसान को न मिल जाए। उन्होंने कुलपति के उस विजन को साझा किया जिसके तहत विश्वविद्यालय अब केवल चारदीवारी के भीतर प्रयोग नहीं कर रहा, बल्कि ‘रियल-टाइम’ समस्याओं के समाधान के लिए किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित कर रहा है।

​बैठक में प्राचार्य रुबी रानी, सहायक निदेशक अनुसंधान चंदा कुशवाहा और विभिन्न संकायों के प्रमुखों ने भाग लिया। इसके साथ ही कृषि विभाग की ओर से सहायक निदेशक दीप रश्मि और हेमलता ने शासन और प्रशासन के बीच समन्वय की भूमिका निभाई। जमुई और लखीसराय जैसे जिलों से आए कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के प्रमुखों ने इस बात पर जोर दिया कि आगामी खरीफ सीजन में बीजों की समय पर उपलब्धता और मिट्टी के स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों का उपयोग सुनिश्चित करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

खरीफ 2026 की चुनौतियां और जलवायु अनुकूल खेती

​पिछले कुछ वर्षों में मानसून के बदलते मिजाज ने बिहार की खरीफ फसलों, विशेषकर धान और मक्का को काफी प्रभावित किया है। बैठक में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की गई कि कैसे ‘क्लाइमेट स्मार्ट’ तकनीक के माध्यम से अनिश्चित बारिश के प्रभाव को कम किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने सलाह दी कि किसानों को अब ऐसी किस्मों की ओर बढ़ना चाहिए जो कम पानी में भी बेहतर पैदावार दे सकें और जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो।

​विशेषज्ञों ने खरीफ 2026 के लिए ‘फसल विविवधकरण’ (Crop Diversification) को एक अनिवार्य कदम बताया। केवल पारंपरिक धान की खेती के बजाय, किसानों को मोटे अनाज (मिलेट्स), दलहन और तिलहन की उन फसलों को भी शामिल करने के लिए प्रेरित किया गया जो कम लागत में अधिक मुनाफा देती हैं। बांका और जमुई जैसे क्षेत्रों, जहाँ सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां के लिए विशेष शुष्क खेती (Dryland Farming) की तकनीकों पर शोध के परिणामों को साझा किया गया। वैज्ञानिकों ने किसानों को मिट्टी में नमी संरक्षण के आधुनिक तरीकों और मल्चिंग जैसी पद्धतियों के बारे में विस्तार से बताया।

‘सबाग्री’ स्टार्टअप: कृषि में उद्यमिता का नया द्वार

​बिहार कृषि विश्वविद्यालय केवल खेती सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों को ‘कृषि-उद्यमी’ बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है। अनिल कुमार सिंह ने “सबाग्री” (Sabagri) स्टार्टअप पहल के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कुलपति के मार्गदर्शन में इस पहल के जरिए उन युवाओं को मंच दिया जा रहा है जो खेती में नई तकनीक और व्यापारिक मॉडल्स लेकर आ रहे हैं। सबाग्री स्टार्टअप के माध्यम से कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग के नए तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे किसान को अपनी उपज का सही मूल्य मिल सके।

​रिसर्च एडवाइजरी ग्रुप्स की भूमिका पर चर्चा करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि अब अनुसंधान की दिशा ‘डिमांड ड्रिवेन’ यानी मांग आधारित होनी चाहिए। बाजार में किस तरह के अनाज या सब्जी की मांग है, उसी के आधार पर शोध किए जा रहे हैं। स्टार्टअप के माध्यम से कृषि में नवाचार (Innovation) को जोड़ने से खेती अब घाटे का सौदा नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में उभर रही है।

किसान-वैज्ञानिक संवाद: शंकाओं का समाधान और मार्गदर्शन

​ZREAC की इस बैठक की सबसे जीवंत कड़ी वह सत्र रहा जहाँ किसानों ने सीधे वैज्ञानिकों से सवाल पूछे। खगड़िया और शेखपुरा से आए किसानों ने खरीफ फसलों में लगने वाले कीटों और रोगों, विशेषकर धान के ‘ब्लास्ट’ और मक्का के ‘फॉल आर्मी वर्म’ जैसे खतरों पर चिंता जताई। किसानों का कहना था कि कई बार बाजार में मिलने वाली दवाएं प्रभावी नहीं होतीं, जिससे उनकी पूरी फसल बर्बाद हो जाती है।

​इन सवालों का जवाब देते हुए विषय विशेषज्ञों ने ‘समेकित कीट प्रबंधन’ (IPM) पर जोर दिया। वैज्ञानिकों ने बताया कि केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक नियंत्रण और खेती के पारंपरिक तरीकों का मेल ही फसलों को सुरक्षा दे सकता है। जल प्रबंधन के विषय पर भी किसानों को महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। वैज्ञानिकों ने कहा कि मानसून की बारिश को खेतों में ही सहेजने के लिए ‘इन-सीटू’ जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना खरीफ 2026 की सफलता के लिए अपरिहार्य है।

विस्तार गतिविधियों का सुदृढ़ीकरण और भविष्य का रोडमैप

​बैठक के अंतिम सत्र में अनुसंधान और प्रसार के बीच के समन्वय को और अधिक प्रभावी बनाने पर सहमति बनी। यह तय किया गया कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अब केवल ब्लॉक स्तर तक नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर जाकर किसानों को प्रशिक्षित करेंगे। केवीके (KVK) के वैज्ञानिकों को निर्देश दिया गया कि वे आगामी सीजन से पहले हर जिले में प्रदर्शन प्रक्षेत्र (Demonstration Plots) तैयार करें ताकि किसान नई तकनीकों को अपनी आंखों से देख सकें और उनका प्रभाव समझ सकें।

​प्राचार्य एम. के. वाधवानी, रवि केसरी और संजय कुमार ने शैक्षणिक और शोध के दृष्टिकोण से खरीफ की रणनीति को और अधिक वैज्ञानिक बनाने पर बल दिया। बैठक में यह भी चर्चा हुई कि कैसे डिजिटल माध्यमों और मोबाइल एप्स के जरिए किसानों तक मौसम की जानकारी और कृषि सलाह त्वरित रूप से पहुँचाई जा सकती है। डॉ. नेहा पांडेय के मंच संचालन और डॉ. दीपक पटेल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह बैठक संपन्न हुई, लेकिन इसने बिहार की कृषि प्रगति के लिए एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया।

निष्कर्ष: सात जिलों की साझा समृद्धि का संकल्प

​17 अप्रैल 2026 की यह बैठक बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के उस संकल्प का प्रमाण है जहाँ ज्ञान और पसीना एक साथ मिलते हैं। भागलपुर से लेकर जमुई तक की यह सात जिलों की पट्टी बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वैज्ञानिकों और किसानों के बीच हुआ यह मंथन खरीफ 2026 के लिए केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है जो बाढ़, सूखा और कीटों के खतरों के बीच भी किसान की मेहनत को सुरक्षित रखेगा। कुलपति डी. आर. सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय अब एक नए युग में प्रवेश कर चुका है, जहाँ तकनीक केवल किताबों में नहीं, बल्कि किसानों के खेतों में लहलहाती हुई नजर आएगी।

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