
पटना। बिहार की उच्च शिक्षा के सिरमौर और ‘पूर्व के ऑक्सफोर्ड’ के नाम से विख्यात पटना विश्वविद्यालय (PU) में जालसाजी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अकादमिक जगत की शुचिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। मेधा और विद्वता के केंद्र माने जाने वाले इस गौरवशाली संस्थान में एक शिक्षक ने ‘अनुभव’ की ऐसी झूठी सीढ़ी तैयार की, जिस पर चढ़कर उसने सहायक प्राध्यापक की कुर्सी तो हासिल कर ली, लेकिन सत्य की आंच ने उस कुर्सी को जलने में वक्त नहीं लगाया। पटना विश्वविद्यालय प्रशासन ने भूगोल विभाग में नियुक्त सहायक प्राध्यापक विवेक कुमार को फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र देने के आरोप में तत्काल प्रभाव से सेवा से मुक्त कर दिया है। यह कार्रवाई केवल एक शिक्षक को हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो फर्जी दस्तावेजों के दम पर व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश करते हैं। विश्वविद्यालय की कुलसचिव शालिनी ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया है कि अकादमिक भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
देवरिया का वह ‘कागजी’ कॉलेज और गोरखपुर की जांच रिपोर्ट
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से जुड़ी हैं। विवेक कुमार ने सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति पाने के लिए आवेदन के समय एक अनुभव प्रमाणपत्र संलग्न किया था। यह प्रमाणपत्र देवरिया के रूद्रपुर स्थित पंडित श्री कृष्ण उपाध्याय महाविद्यालय के नाम पर जारी किया गया था। इसमें दावा किया गया था कि विवेक कुमार ने वहां भूगोल विषय के प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। चूंकि चयन प्रक्रिया में पूर्व के अनुभव को वरीयता दी जाती है, इसलिए इस प्रमाणपत्र ने विवेक कुमार की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
हालांकि, पटना विश्वविद्यालय प्रशासन ने पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप जब इन दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की, तो परतें खुलने लगीं। विश्वविद्यालय ने इस प्रमाणपत्र की प्रमाणिकता की जांच के लिए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (जिससे उक्त कॉलेज संबद्ध है) के कुलसचिव को पत्र भेजा। गोरखपुर विश्वविद्यालय से जो जवाब आया, उसने पटना विश्वविद्यालय के अधिकारियों को भी हतप्रभ कर दिया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि विवेक कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया अनुभव प्रमाणपत्र पूरी तरह से फर्जी और निराधार है।
विडंबना: जहाँ भूगोल पढ़ाया ही नहीं जाता, वहां के बन गए ‘गुरु’
इस फर्जीवाड़े में जो सबसे हास्यास्पद और गंभीर तथ्य सामने आया, वह विषय से संबंधित है। विवेक कुमार ने जिस कॉलेज (पंडित श्री कृष्ण उपाध्याय महाविद्यालय, देवरिया) के नाम पर भूगोल विषय का अनुभव प्रमाणपत्र पेश किया था, जांच में यह बात निकलकर सामने आई कि उस महाविद्यालय में भूगोल विषय की पढ़ाई ही नहीं होती है। यह अकादमिक जगत की सबसे बड़ी विडंबना है कि एक अभ्यर्थी ने उस विषय में विशेषज्ञता और अनुभव का दावा किया, जिसे उस संस्थान के पाठ्यक्रम में कभी शामिल ही नहीं किया गया था।
जांच में यह भी पाया गया कि विवेक कुमार ने कॉलेज के आधिकारिक लेटर पैड का दुरुपयोग किया था। संभवतः लेटर पैड का मूल प्रारूप लेकर उस पर फर्जी जानकारियां और मुहरें अंकित की गईं ताकि वह देखने में बिल्कुल प्रामाणिक लगे। इस प्रकार, भूगोल विभाग का सहायक प्राध्यापक बनने के लिए भूगोल की ही जड़ें खोदने का काम किया गया। पटना विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया कि कैसे एक व्यक्ति ने इतनी बड़ी संस्था को गुमराह करने का दुस्साहस किया।
वेतन पर रोक और उच्च शिक्षा विभाग को कड़ा पत्र
विवेक कुमार के खिलाफ कार्रवाई केवल पद से हटाने तक सीमित नहीं रखी गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके अब तक के वेतन भुगतान और वित्तीय लेन-देन पर भी कड़ा रुख अख्तियार किया है। कुलसचिव शालिनी ने उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक को एक औपचारिक पत्र लिखा है, जिसमें विवेक कुमार के वेतन भुगतान को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का अनुरोध किया गया है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि इस मामले में जब तक कोई अंतिम विधिसम्मत निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी प्रकार का सरकारी धन उन्हें नहीं दिया जाएगा।
विश्वविद्यालय का मानना है कि चूंकि नियुक्ति ही धोखाधड़ी पर आधारित थी, इसलिए उस पद के माध्यम से प्राप्त किया गया लाभ भी अवैध की श्रेणी में आता है। प्रशासन अब इस कानूनी पहलू पर भी विचार कर रहा है कि क्या विवेक कुमार से अब तक प्राप्त किए गए वेतन की वसूली की जा सकती है। इसके अलावा, जांच रिपोर्ट की एक प्रति लोकभवन और उच्च शिक्षा निदेशालय को भी भेज दी गई है ताकि उनके विरुद्ध भविष्य में किसी भी सरकारी पद के लिए स्थायी प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जा सके।
चयन प्रक्रिया और सत्यापन प्रणाली पर उठते सवाल
विवेक कुमार की बर्खास्तगी ने विश्वविद्यालय की प्रारंभिक चयन प्रक्रिया और दस्तावेजों की जांच की प्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। प्रश्न यह है कि साक्षात्कार और नियुक्ति के समय ही इन दस्तावेजों की गहनता से जांच क्यों नहीं की गई? हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि सत्यापन एक समय लेने वाली प्रक्रिया है और अक्सर नियुक्ति के बाद भी ‘प्रोबेशन पीरियड’ के दौरान यह प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन बुद्धिजीवियों का मानना है कि अगर सत्यापन पहले ही कड़ाई से किया जाता, तो योग्य और ईमानदार अभ्यर्थियों के हक का हनन नहीं होता।
विवेक कुमार जैसे लोगों की वजह से उन सैंकड़ों मेधावी छात्रों और शोधार्थियों के बीच निराशा का भाव पैदा होता है जो दिन-रात कड़ी मेहनत कर ईमानदारी से शैक्षणिक पदों की योग्यता हासिल करते हैं। पटना विश्वविद्यालय ने इस कार्रवाई के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि भले ही झूठ के पांव कितने भी तेज क्यों न हों, सत्य अंततः उसे पकड़ ही लेता है।
लेटर पैड का दुरुपयोग और आपराधिक साजिश का पहलू
यह मामला केवल विभागीय अनुशासनहीनता का नहीं, बल्कि एक गंभीर आपराधिक साजिश का भी है। कॉलेज के लेटर पैड का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेज तैयार करना भारतीय न्याय संहिता के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला बनता है। पटना विश्वविद्यालय प्रशासन अब इस पर भी विचार कर रहा है कि क्या विवेक कुमार के विरुद्ध संबंधित थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई जानी चाहिए।
कॉलेज के लेटर पैड तक विवेक कुमार की पहुँच कैसे हुई और क्या इसमें उस कॉलेज के किसी कर्मचारी की भी संलिप्तता थी, यह भी जांच का विषय हो सकता है। गोरखपुर विश्वविद्यालय की रिपोर्ट ने यह तो साफ कर दिया कि दस्तावेज फर्जी हैं, लेकिन इस ‘फर्जी फैक्ट्री’ के पीछे के खिलाड़ियों को बेनकाब करना अभी बाकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कड़ा रुख यह बताता है कि आने वाले दिनों में विवेक कुमार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
अकादमिक सुचिता के लिए कड़ा संदेश
पटना विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में हुई इस कार्रवाई का पूरे परिसर में स्वागत किया जा रहा है। अन्य प्राध्यापकों और छात्रों का कहना है कि शिक्षा के मंदिर में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय ने इस प्रकरण के बाद अब अन्य हालिया नियुक्तियों के दस्तावेजों की भी स्क्रूटनी तेज कर दी है। यह एक निवारक (Preventive) कार्रवाई के रूप में काम करेगा ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस तरह के दुस्साहस की कल्पना न कर सके।
कुलसचिव शालिनी ने स्पष्ट किया है कि पटना विश्वविद्यालय अपनी गरिमा और साख को बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में होने वाली सभी नियुक्तियों में सत्यापन की प्रक्रिया को और अधिक त्रिस्तरीय और अभेद्य बनाया जाए। विवेक कुमार को तत्काल प्रभाव से हटाना इसी दिशा में उठाया गया पहला और निर्णायक कदम है। उच्च शिक्षा विभाग भी इस मामले पर पैनी नजर बनाए हुए है और उम्मीद की जा रही है कि अन्य विश्वविद्यालयों को भी अपने स्तर पर ऐसे ‘कागजी शिक्षकों’ की पहचान करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
निष्कर्ष और भविष्य की कार्रवाई
17 अप्रैल की यह कार्रवाई पटना विश्वविद्यालय के इतिहास में सुशासन के एक उदाहरण के रूप में दर्ज की जाएगी। विवेक कुमार, जो कल तक भूगोल के सिद्धांतों की व्याख्या करते थे, आज स्वयं जालसाजी के मानचित्र पर एक ‘दागी’ के रूप में अंकित हो गए हैं। उनकी बर्खास्तगी न केवल उन्हें मिली सजा है, बल्कि समाज के लिए यह एक सबक भी है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता और अनैतिक तरीके से हासिल की गई उपलब्धि कभी स्थायी नहीं होती।
विश्वविद्यालय प्रशासन अब रिक्त हुए इस पद पर नई बहाली की प्रक्रिया को लेकर भी जल्द ही दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। फिलहाल, विवेक कुमार के पास अपनी सफाई देने के लिए कानूनी रास्ते भले ही खुले हों, लेकिन गोरखपुर विश्वविद्यालय की दो-टूक रिपोर्ट ने उनके बचाव के सारे रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं। बिहार की उच्च शिक्षा को ऐसे दागों से बचाने के लिए पटना विश्वविद्यालय का यह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नितांत आवश्यक था।


