नीट छात्रा केस: समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई CBI, हॉस्टल मालिक मनीष रंजन को कोर्ट ने दी सशर्त जमानत

पटना। राजधानी पटना के चर्चित और हृदयविदारक ‘नीट छात्रा’ दरिंदगी मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) की सुस्ती और निर्धारित समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल न कर पाने की विफलता का लाभ इस मामले के एक प्रमुख आरोपी को मिल गया है। पटना के पॉक्सो (POCSO) विशेष न्यायालय ने शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मालिक मनीष रंजन को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया है। गुरुवार, 16 अप्रैल 2026 को सुनाए गए इस फैसले ने न केवल जांच एजेंसी की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन तमाम दावों की भी पोल खोल दी है जिनमें जघन्य अपराधों के मामलों में त्वरित न्याय की बात कही जाती थी। विशेष न्यायाधीश राजीव रंजन रमन ने इस मामले में सीबीआई को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि जब एजेंसी कानून द्वारा निर्धारित अवधि में जांच पूरी करने में विफल रहती है, तो आरोपी को वैधानिक जमानत (Statutory Bail) का लाभ मिलना उसका अधिकार बन जाता है। करीब तीन महीने से बेऊर जेल में बंद मनीष रंजन के बाहर आने की खबर ने एक बार फिर इस संवेदनशील कांड की चर्चाओं को गर्म कर दिया है।

सीबीआई की बड़ी लापरवाही: समय सीमा का ‘डेडलाइन’ चूकी एजेंसी

​इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू सीबीआई जैसी पेशेवर संस्था का ‘डेडलाइन’ का पालन न कर पाना है। भारतीय कानून के तहत, विशेष रूप से पॉक्सो और जघन्य अपराधों के मामलों में, गिरफ्तारी के बाद एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 90 दिन) के भीतर जांच एजेंसी को अदालत में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल करना अनिवार्य होता है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो आरोपी को ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ का कानूनी हक मिल जाता है।

​नीट छात्रा मामले में पॉक्सो के विशेष न्यायाधीश राजीव रंजन रमन ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि सीबीआई ने अदालत द्वारा 10 अप्रैल को दिए गए पिछले निर्देशों का पालन नहीं किया। अदालत ने पूछा कि निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी आपराधिक कांड की जांच क्यों अधूरी है? न्यायाधीश ने इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए जमानत आदेश की एक प्रति सीबीआई के पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इस सुस्ती के जिम्मेदार अधिकारियों पर उचित प्रशासनिक कार्रवाई की जा सके। यह आदेश सीधे तौर पर दिल्ली सीबीआई की उस टीम पर सवाल उठाता है जो इस हाई-प्रोफाइल केस की कमान संभाल रही है।

सशर्त रिहाई: इन पाबंदियों के बीच जेल से बाहर आएगा मनीष रंजन

​भले ही मनीष रंजन को जमानत मिल गई है, लेकिन अदालत ने उसे पूरी तरह ‘आजाद’ नहीं छोड़ा है। विशेष अदालत ने 25 हजार रुपये के दो जमानतदारों के साथ सशर्त नियमित जमानत मंजूर की है। जमानत की शर्तें काफी कड़ी रखी गई हैं ताकि जांच प्रभावित न हो सके। अदालत के आदेशानुसार:

  • क्षेत्राधिकार का बंधन: मनीष रंजन पॉक्सो अदालत के क्षेत्राधिकार (Patna Jurisdiction) से बाहर बिना पूर्व अनुमति के नहीं जा सकेगा।
  • जांच में सहयोग: उसे सीबीआई की जांच और भविष्य के ट्रायल में पूरी तरह सहयोग करना होगा।
  • हाजिरी: जब भी जांच एजेंसी उसे पूछताछ के लिए बुलाएगी, उसे अनिवार्य रूप से उपस्थित होना पड़ेगा।
  • साक्ष्य सुरक्षा: आरोपी किसी भी परिस्थिति में सबूतों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेगा।

​इन शर्तों का उल्लंघन होने पर अदालत किसी भी समय उसकी जमानत रद्द कर सकती है। मनीष रंजन के वकील ने दलील दी थी कि चूंकि सीबीआई ने कानूनी समय सीमा के भीतर कोई ठोस सबूत या चार्जशीट पेश नहीं की है, इसलिए उनके मुवक्किल को अनिश्चितकाल के लिए जेल में रखना मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन है।

चित्रगुप्त नगर थाने से दिल्ली सीबीआई तक का सफर

​इस कांड की जड़ें 10 जनवरी 2026 को दर्ज हुई उस एफआईआर (FIR) में छिपी हैं, जिसने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया था। एक होनहार नीट छात्रा के साथ हुई दरिंदगी के बाद चित्रगुप्त नगर थाने की तत्कालीन थानेदार रोशनी कुमारी ने इस मामले की जांच शुरू की थी। शुरुआती जांच में ही शंभू गर्ल्स हॉस्टल की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए हॉस्टल मालिक मनीष रंजन के आवासीय परिसर को सील कर दिया था।

​पुलिस ने वहां से सीसीटीवी कैमरे, डीवीआर (DVR), मृतका का मोबाइल फोन और कई अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य जब्त किए थे। 15 जनवरी को भागवत नगर इलाके से मनीष रंजन की गिरफ्तारी हुई थी और उसे जेल भेज दिया गया था। बाद में मामले की गंभीरता और इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए राज्य सरकार की अनुशंसा पर जांच पटना सीबीआई को सौंपी गई। कुछ ही समय बाद, जांच का दायरा बढ़ाते हुए इसे दिल्ली सीबीआई की टीम को हस्तांतरित कर दिया गया। 12 फरवरी को सीबीआई ने हत्या का प्रयास और पॉक्सो एक्ट की संगीन धाराओं के तहत नया मामला दर्ज कर नए सिरे से अनुसंधान शुरू किया था।

रिमांड पर न लेना बना चर्चा का विषय

​सीबीआई की जांच प्रक्रिया में एक और बिंदु राजनैतिक और सामाजिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, जब से सीबीआई ने इस केस को अपने हाथ में लिया है, उसने एक बार भी मुख्य आरोपियों में से एक मनीष रंजन को अपनी हिरासत (Remand) में लेकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं समझी। आम तौर पर ऐसे संगीन मामलों में जांच एजेंसियां आरोपियों को रिमांड पर लेकर अपराध के पीछे की साजिश और अन्य संलिप्त लोगों का पता लगाती हैं।

​मनीष रंजन करीब तीन महीने तक बेऊर जेल में रहा, लेकिन सीबीआई की सुस्ती इस कदर रही कि वह न तो उससे पूछताछ कर पाई और न ही उसके खिलाफ अदालत में कोई निर्णायक दस्तावेज समय पर पेश कर सकी। यही वजह रही कि सीबीआई के वकील को अदालत में यह स्वीकार करना पड़ा कि जांच अभी लंबित है और फिलहाल चार्जशीट तैयार नहीं है। इस कबूलनामे ने अदालत के पास जमानत देने के अलावा कोई दूसरा कानूनी विकल्प नहीं छोड़ा।

छात्रावासों की सुरक्षा और अभिभावकों की चिंता

​इस मामले ने पटना के हजारों निजी हॉस्टलों और वहां रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही छात्राओं की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। नीट छात्रा के साथ हुई इस घटना के बाद राजधानी के छात्रावासों में डर का माहौल व्याप्त हो गया था। मनीष रंजन जैसे रसूखदार हॉस्टल मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद की जा रही थी, ताकि अन्य संचालकों के बीच एक कड़ा संदेश जाए।

​आज जब वह कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बाहर आ रहा है, तो उन अभिभावकों की चिंता बढ़ना लाजमी है जिन्होंने अपनी बेटियों को ‘डॉक्टर’ बनाने का सपना लेकर पटना भेजा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जांच एजेंसियों की यह सुस्ती पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। सुशासन के दावों के बीच यदि एक नीट छात्रा को इंसाफ मिलने में ऐसी तकनीकी अड़चनें आएंगी, तो आम जनता का व्यवस्था पर से विश्वास उठना तय है।

अगली डगर: क्या अब रफ़्तार पकड़ेगी जांच?

​अदालत की कड़ी फटकार और मनीष रंजन की जमानत के बाद अब सीबीआई के ऊपर भारी दबाव है। सीबीआई के एसपी को भेजे गए कोर्ट के निर्देश के बाद उम्मीद की जा रही है कि जांच टीम में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं या जांच की गति तेज की जा सकती है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सीबीआई कब तक अपनी अंतिम रिपोर्ट (Chargesheet) दाखिल करती है।

​कानून विशेषज्ञों का मानना है कि मनीष रंजन की रिहाई से जांच प्रभावित हो सकती है, क्योंकि वह एक प्रभावशाली व्यक्ति है। हालांकि, अदालत ने कड़ी शर्तें लगाई हैं, लेकिन जमीन पर उन शर्तों का पालन कितना होता है, यह पुलिस और सीबीआई की निगरानी पर निर्भर करेगा। नीट छात्रा के लिए न्याय की लड़ाई अब एक नए मोड़ पर है, जहाँ एक ओर साक्ष्यों का संकलन है और दूसरी ओर कानूनी समय सीमा की चुनौती। 16 अप्रैल का यह अदालती आदेश दिल्ली से लेकर पटना तक सीबीआई के दफ्तरों में हलचल पैदा करने के लिए पर्याप्त है। बिहार की जनता और छात्रा का परिवार अब भी उस दिन का इंतजार कर रहा है जब इस दरिंदगी के हर दोषी को उसके किए की अंतिम सजा मिलेगी।

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