
भागलपुर। राजनीति में भौगोलिक निकटता अक्सर विकास की नई इबारत लिखती है। बिहार की सत्ता के शीर्ष पर सम्राट चौधरी की ताजपोशी के बाद राजधानी पटना से कोसों दूर रेशम नगरी भागलपुर की गलियों में एक नई उम्मीद ने अंगड़ाई ली है। भागलपुर के लोगों के लिए सम्राट चौधरी केवल सूबे के नए मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे ‘पड़ोसी’ और ‘अंगभाषी’ हैं जिनकी जड़ें इसी माटी के अहसास से जुड़ी हैं। भागलपुर के अंतिम छोर के गांव और मुख्यमंत्री के पैतृक गांव के बीच की दूरी महज एक सड़क की चौड़ाई जितनी है। कांवरिया पथ की वह लकीर जहाँ एक तरफ भागलपुर की सीमा को छूती है, वहीं दूसरी तरफ मुंगेर जिले का तारापुर (मुख्यमंत्री का पैतृक क्षेत्र) खड़ा है। यही वजह है कि भागलपुर के आम नागरिकों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को यह भरोसा है कि इस बार ‘अंग’ की आवाज सचिवालय के बंद कमरों में दबेगी नहीं, बल्कि उसे वह मुकाम मिलेगा जिसका वह दशकों से हकदार रहा है। भागवत झा आजाद के स्वर्णिम युग के बाद भागलपुर एक ऐसे ‘विकास पुरुष’ की तलाश में है जो फाइलों में बंद पड़े प्रोजेक्ट्स को धरातल पर उतार सके।
पड़ोसी होने का अहसास और अंगिका का जुड़ाव
भागलपुर और सम्राट चौधरी का रिश्ता केवल राजनैतिक नहीं, बल्कि जज्बाती भी है। मुख्यमंत्री का पैतृक निवास तारापुर में होना और भागलपुर के सुल्तानगंज व असरगंज क्षेत्रों से उनकी भौगोलिक निकटता ने एक मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाई है। नागरिक विकास समिति के रमण कर्ण बताते हैं कि भागलपुरवासियों के लिए यह गर्व का विषय है कि उनका एक अपना व्यक्ति सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर है। वे कहते हैं कि भागवत झा आजाद के बाद सम्राट चौधरी दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हो सकते हैं, जिन्हें यहाँ की आने वाली पीढ़ियां विकास पुरुष के रूप में याद रखेंगी।
स्थानीय लोगों का मानना है कि सम्राट चौधरी अंगिका संस्कृति और यहाँ की समस्याओं को उसी गहराई से समझते हैं जैसे एक घर का सदस्य। जब नेतृत्व अपनी भाषा और अपनी माटी का होता है, तो संवाद की औपचारिकताएं खत्म हो जाती हैं और उम्मीदें परवान चढ़ने लगती हैं। तारापुर और भागलपुर के बीच की यह ‘एक सड़क की दूरी’ अब विकास की उस रफ़्तार को तय करने वाली है जिसका इंतजार भागलपुर दशकों से कर रहा है।
अगुवानी घाट पुल: एक ‘सपना’ जो अब चुनौती बन चुका है
भागलपुर की सबसे बड़ी उम्मीद और नए मुख्यमंत्री की साख का सबसे बड़ा सवाल ‘सुल्तानगंज-अगुवानी घाट पुल’ है। यह पुल केवल एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि सम्राट चौधरी का एक पुराना सपना भी रहा है। खगड़िया के परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहते हुए उन्होंने ही पहली बार इस पुल के निर्माण की सार्वजनिक घोषणा की थी और उन्हीं के पुरजोर प्रयास पर तत्कालीन राज्य सरकार ने इसकी योजना बनाकर शिलान्यास किया था।
आज नियति ने उन्हें उस स्थान पर खड़ा किया है जहाँ वे इस अधूरे और विवादित प्रोजेक्ट को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं। गंगा नदी पर बन रहा यह पुल दो बार धराशायी हो चुका है, जिससे इसकी तकनीक और ठेका प्रणाली पर बड़े सवाल उठे हैं। भागलपुरवासियों को उम्मीद है कि चूंकि यह प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री के दिल के करीब है, इसलिए वे इसकी जांच में तेजी लाएंगे और इसे जल्द से जल्द जनता को समर्पित करेंगे। यह पुल मुंगेर, भागलपुर और खगड़िया के बीच यातायात की रीढ़ साबित होगा और व्यापारिक गतिविधियों को नई ऊंचाई देगा।
सुल्तानगंज ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट: पर्यटन और विकास का नया गेटवे
विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला और बाबा अजगैबीनाथ की नगरी सुल्तानगंज में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भागलपुर के लिए दूसरी सबसे बड़ी मांग है। भागलपुर का वर्तमान हवाई अड्डा तकनीकी कारणों से बड़े विमानों के लिए उपयुक्त नहीं है, ऐसे में सुल्तानगंज में प्रस्तावित एयरपोर्ट इस पूरे क्षेत्र की किस्मत बदल सकता है।
अंग प्रदेश के लोगों का मानना है कि अगर सुल्तानगंज में हवाई सेवा शुरू होती है, तो यह न केवल देवघर जाने वाले कांवरियों के लिए सुगम होगा, बल्कि रेशम उद्योग और जर्दालु आम के वैश्विक निर्यात को भी पंख लगेंगे। मुख्यमंत्री के समक्ष इस प्रोजेक्ट की जमीन अधिग्रहण और तकनीकी बाधाओं को दूर करना एक बड़ी चुनौती है। नागरिक समाज का तर्क है कि जब अन्य छोटे शहरों में एयरपोर्ट बन सकते हैं, तो बिहार के इस महत्वपूर्ण व्यापारिक और धार्मिक केंद्र को इससे वंचित क्यों रखा जाए?
पटना जैसा भागलपुर: गंगा पथ (मरीन ड्राइव) का सपना
राजधानी पटना में गंगा किनारे बने मरीन ड्राइव (जेपी गंगा पथ) ने वहां की यातायात व्यवस्था और पर्यटन की सूरत बदल दी है। अब कुछ वैसी ही उम्मीद भागलपुर के लोगों को भी है। परिधि संस्था के उदय बताते हैं कि नए मुख्यमंत्री से भागलपुर को यह अपेक्षा है कि वे यहाँ भी गंगा पथ का काम जल्द शुरू कराएंगे।
भागलपुर शहर की सबसे बड़ी समस्या यहाँ की जाम और संकरी सड़कें हैं। यदि गंगा किनारे एक समानांतर सड़क (मरीन ड्राइव) का निर्माण होता है, तो यह भागलपुर और मुंगेर जिलों के बीच एक नया ‘ट्रैफिक कॉरिडोर’ तैयार करेगा। इससे शहर के भीतर के भारी वाहनों का दबाव कम होगा और लोगों को गंगा के शीतल सान्निध्य में एक नया पर्यटन स्थल मिलेगा। उदय का कहना है कि सम्राट चौधरी जिस ऊर्जा के लिए जाने जाते हैं, वे इस ‘मरीन ड्राइव’ प्रोजेक्ट को फाइलों से निकालकर जमीन पर जरूर उतारेंगे।
मेट्रो ट्रेन का सर्वेक्षण और फाइलों की धूल
भागलपुर जैसे बढ़ते शहर के लिए अब केवल बसें और ऑटो पर्याप्त नहीं हैं। भागलपुरवासियों का एक बड़ा सपना शहर में मेट्रो ट्रेन पर चढ़ने का भी है। संयोगवश, नगर विकास एवं आवास विभाग की कमान स्वयं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास ही है। इससे उम्मीदें और बढ़ गई हैं। भागलपुर में मेट्रो या लाइट मेट्रो को लेकर पहले भी सर्वेक्षण की बातें सामने आई थीं, लेकिन वे रिपोर्टें अब धूल फांक रही हैं।
बुद्धिजीवियों का कहना है कि चूंकि मुख्यमंत्री स्वयं इस विभाग के मुखिया हैं, इसलिए वे फाइलों में बंद उन सर्वेक्षण रिपोर्टों को बाहर निकालकर उन्हें अमलीजामा पहनाने का काम करें। भागलपुर की बढ़ती जनसंख्या और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए मेट्रो प्रोजेक्ट अब कोई विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। लोग चाहते हैं कि सम्राट चौधरी इस प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता (Feasibility) की पुनः जांच कराएं और भागलपुर को एक आधुनिक परिवहन प्रणाली की सौगात दें।
अंग प्रदेश की सांस्कृतिक और औद्योगिक पहचान का पुनरुद्धार
विकास केवल ईंट और पत्थर से नहीं होता, वह पहचान से भी जुड़ा होता है। सम्राट चौधरी से उम्मीद की जा रही है कि वे भागलपुर के मरणासन्न सिल्क उद्योग (Silk Industry) को पुनर्जीवित करने के लिए कोई विशेष पैकेज या ‘सिल्क पार्क’ की घोषणा करेंगे। इसके अलावा, मंजूषा कला और अंगिका साहित्य के संरक्षण के लिए भी सरकार की ओर से ठोस पहल की प्रतीक्षा है।
मुख्यमंत्री का ‘पड़ोसी’ होना यहाँ के स्थानीय कलाकारों और उद्यमियों के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। वे सीधे अपनी बात मुख्यमंत्री तक पहुँचाने का हौसला रख रहे हैं। भागलपुर के लोगों को विश्वास है कि सम्राट चौधरी केवल पटना के होकर नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे अपने ‘अंग’ के इस छोटे घर को भी उसी चमक-धमक से नवाजेंगे जैसा उन्होंने पटना के लिए सोचा है।
चुनौतियां और संतुलन: सुशासन की असली परीक्षा
उम्मीदों का पहाड़ जितना ऊँचा है, मुख्यमंत्री के सामने चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति और ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ कार्यशैली की असली परीक्षा भागलपुर के इन बड़े प्रोजेक्ट्स में होगी। अगुवानी पुल के निर्माण में हुई लापरवाही पर सख्त कार्रवाई करना और स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह बनाना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
भागलपुर की जनता यह भी देख रही है कि क्या मुख्यमंत्री केवल चुनावी घोषणाओं तक सीमित रहेंगे या वास्तव में वे ‘सम्राट’ की तरह अपने क्षेत्र का कायाकल्प करेंगे। 17 अप्रैल 2026 की यह दोपहर भागलपुर की उम्मीदों की एक नई डायरी है, जिसमें हर पन्ने पर सम्राट चौधरी का नाम लिखा है। अंग प्रदेश अब अपने इस ‘शक्तिशाली पड़ोसी’ की ओर टकटकी लगाए देख रहा है कि कब विकास का वह सूरज उगेगा जिसकी रोशनी से भागलपुर का कोना-कोना जगमगा उठेगा।


