
पटना। बिहार की सत्ता के गलियारों में 15 अप्रैल 2026 की यह सुबह केवल एक नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण का शोर नहीं है, बल्कि यह उस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की नई परिभाषा है जिसे भारतीय जनता पार्टी और एनडीए ने बहुत ही बारीकी से बुना है। जब मंगलवार की शाम लोकभवन में सम्राट चौधरी ने राज्यपाल सय्यद अता हसनैन को सरकार बनाने के दावे का पत्र सौंपा, तो उनके पीछे खड़ी एनडीए के दिग्गजों की कतार—संजय झा, शिवराज सिंह चौहान, जीतन राम मांझी, ललन सिंह, विजय कुमार चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा—एक बड़े राजनैतिक संदेश की तस्दीक कर रही थी। भाजपा ने सम्राट चौधरी को बिहार की कमान सौंपकर एक साथ कई मोर्चों पर फतह हासिल करने की कोशिश की है। यह फैसला केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि बिहार के सबसे मजबूत और वफादार वोट बैंक ‘लव-कुश’ समीकरण को यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि सत्ता का केंद्र भले ही जदयू से भाजपा की ओर मुड़ गया हो, लेकिन उसकी बागडोर आज भी इसी समुदाय के हाथों में सुरक्षित है।
लव-कुश समीकरण: एनडीए की अभेद्य दीवार और 7.07% का गणित
बिहार की राजनीति में ‘लव-कुश’ यानी कुर्मी और कोयरी (कुशवाहा) समाज पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार की ताकत का सबसे बड़ा आधार रहे हैं। बिहार की हालिया जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो यह समुदाय राज्य की कुल आबादी का लगभग 7.07 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें कोयरी (कुशवाहा) की संख्या 4.2 प्रतिशत है, जबकि कुर्मी समाज की आबादी 2.87 प्रतिशत है। यादव समाज के बाद ओबीसी वर्ग में यह दूसरा सबसे बड़ा और प्रभावशाली वोट बैंक है।
नीतीश कुमार (कुर्मी) के मुख्यमंत्री रहते हुए यह वोट बैंक पूरी तरह से एनडीए के साथ लामबंद रहा है। अब जबकि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं, तो भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस आधार को बिखरने से रोकने की थी। सम्राट चौधरी (कुशवाहा) को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने इस शून्य को भरने का प्रयास किया है। सम्राट के जरिए भाजपा ने यह संदेश दिया है कि ‘लव’ (नीतीश) के बाद अब ‘कुश’ (सम्राट) शासन करेंगे। यह जातीय इंजीनियरिंग केवल कुर्मी-कोयरी तक सीमित नहीं है, बल्कि दांगी, धानुक, अमात और गंगोता जैसी उप-जातियों को भी एकजुट रखने का एक रणनीतिक दांव है, जो पारंपरिक रूप से एनडीए के पाले में रही हैं।
नेतृत्व का शून्य और सम्राट का उदय: क्यों विफल रहे पुराने प्रयोग?
भाजपा के भीतर सुशील कुमार मोदी के कद का नेता तलाशना पार्टी के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। सुशील मोदी के जाने के बाद भाजपा ने तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी जैसे चेहरों को उपमुख्यमंत्री बनाकर नेतृत्व की नई लाइन तैयार करने की कोशिश की थी। हालांकि, राजनैतिक जानकारों का मानना है कि यह प्रयोग अपेक्षाकृत असफल रहा। इन नेताओं का प्रभाव और आक्रामकता संगठन और जनता के बीच वह अमिट छाप नहीं छोड़ सकी जिसकी जरूरत बिहार जैसे जटिल राजनैतिक राज्य में थी।
इसी शून्यता को भरने के लिए भाजपा ने सम्राट चौधरी पर बड़ा दांव खेला। सम्राट चौधरी ने न केवल विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपनी धार दिखाई, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में संगठन को भी पुनर्जीवित किया। सम्राट के आक्रामक तेवर ने भाजपा के कार्यकर्ताओं में वह ऊर्जा भरी जो नीतीश कुमार की छत्रछाया में दबी हुई महसूस होती थी। सदन से लेकर सड़क तक सम्राट ने जिस तरह से सरकार और विपक्ष के बीच की लकीर को स्पष्ट किया, उसने दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि 2030 के विजन के लिए सम्राट ही सबसे सटीक चेहरा हैं।
समाजवादी विरासत: राजद और जदयू से भाजपा तक का सेतु
सम्राट चौधरी की एक बड़ी खूबी उनका समाजवादी बैकग्राउंड है। भाजपा में आने से पहले उन्होंने राजद और जदयू जैसे दलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राजनीति की शुरुआत समाजवादी विचारधारा से करने के कारण सम्राट के संबंध पुरानी पीढ़ी के नेताओं और विधायकों के साथ काफी बेहतर रहे हैं। वे एक ऐसे ‘मिलनसार’ नेता के रूप में उभरे जो भाजपा की कैडर-आधारित राजनीति और समाजवाद की जमीनी राजनीति के बीच का सेतु बन गए।
जब नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का मन बनाया, तो उन्होंने सम्राट चौधरी को ही अपने सबसे करीबी सहयोगी के रूप में आगे बढ़ाया। पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे अवसर आए जब नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी साये की तरह एक साथ दिखे। सम्राट की यही खूबी कि वे भाजपा के कट्टर समर्थक होने के साथ-साथ नीतीश कुमार के लिए भी स्वीकार्य थे, उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आई। नीतीश ने सम्राट में उस युवा नेतृत्व को देखा जो उनके द्वारा शुरू किए गए विकास कार्यों को आगे बढ़ा सकता है।
शकुनी और नीतीश: तीन दशकों पुराना वह पारिवारिक नाता
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की पटकथा केवल वर्तमान समीकरणों पर नहीं, बल्कि तीन दशक पुराने ऐतिहासिक संबंधों पर भी टिकी है। सम्राट के पिता, पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, और नीतीश कुमार का रिश्ता राजनैतिक से ज्यादा पारिवारिक और भावनात्मक रहा है। 1990 के दशक में जब लालू प्रसाद के खिलाफ बिहार में नई राजनीति की शुरुआत हुई थी, तो शकुनी चौधरी उन चुनिंदा बड़े नेताओं में थे जिन्होंने नीतीश कुमार का साथ दिया था।
शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 1994 में जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से अलग होकर अपनी नई राह चुनी, तो शकुनी चौधरी ने अपनी पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी थी। उनके समर्थन के बिना नीतीश के लिए पूरे बिहार में ‘लव-कुश’ आधार तैयार करना लगभग नामुमकिन था। शकुनी चौधरी ने ही नीतीश को पहली बार मुख्यमंत्री बनाने में किंगमेकर की भूमिका निभाई थी। आज जब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं, तो उन्होंने अपने पुराने साथी शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी का नाम भाजपा नेतृत्व के समक्ष खुद प्रस्तावित कर उस ऐतिहासिक कर्ज को उतारा है। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि सम्राट के नाम पर नीतीश की सहमति ही इस पूरी सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी बुनियाद रही।
भविष्य की चुनौतियां: क्या सम्राट साध पाएंगे सहयोगियों को?
सम्राट चौधरी के सामने अब एक बड़ी चुनौती एनडीए के तमाम सहयोगियों को साथ लेकर चलने की है। मंगलवार को जब वे सरकार बनाने का दावा पेश करने लोकभवन पहुँचे, तो उनके साथ उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और ललन सिंह की मौजूदगी ने एक एकजुट एनडीए का चेहरा पेश किया। हालांकि, मंत्रिमंडल विस्तार को 4 मई तक टालना यह बताता है कि अभी भी पर्दे के पीछे कई चीजों को सुलझाना बाकी है।
सम्राट चौधरी को न केवल अपने ‘कुशवाहा’ समाज की आकांक्षाओं को पूरा करना है, बल्कि कुर्मी समाज के भीतर पैदा होने वाले किसी भी असुरक्षा बोध को भी खत्म करना है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल एक समुदाय के नेता नहीं, बल्कि पूरे बिहार के मुख्यमंत्री हैं। 37 साल बाद पूर्वी बिहार को मिले इस नेतृत्व से पूरे क्षेत्र की उम्मीदें जुड़ी हैं। भाजपा ने सम्राट को आगे कर यह तो बता दिया है कि वह अपने दम पर सरकार चलाने की क्षमता रखती है, लेकिन गठबंधन के धर्म का पालन करना सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होगी।
एक नए युग का आगाज़
कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में ‘सोशल जस्टिस 2.0’ की शुरुआत है। भाजपा ने नीतीश कुमार की विरासत को सुरक्षित रखते हुए अपने चेहरे को स्थापित कर दिया है। लव-कुश समीकरण अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ नेतृत्व की कमान एक युवा और आक्रामक नेता के पास है। 15 अप्रैल की यह दोपहर बिहार के राजनैतिक कैलेंडर में एक नया इतिहास लिख चुकी है। सम्राट के पास अब वह मौका है जहाँ वे यह साबित कर सकें कि बिहार का ‘विकसित’ होना केवल एक नारा नहीं, बल्कि उनके शासन की हकीकत होगा।


