
पटना। बिहार में खरीफ सीजन की आहट के साथ ही खेती-किसानी की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। किसानों की सबसे बड़ी चिंता यानी उर्वरक की उपलब्धता को लेकर राज्य सरकार ने अब अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। सोमवार, 13 अप्रैल 2026 को राजधानी पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन में एक महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया। कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में राज्य के सभी प्रमुख उर्वरक विक्रेताओं, थोक व्यापारियों और बड़ी उर्वरक कंपनियों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी खरीफ सीजन के दौरान यूरिया और अन्य खादों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और बाजार में होने वाली कृत्रिम किल्लत या कालाबाजारी पर लगाम कसना था। कृषि निदेशक ने साफ तौर पर कहा कि राज्य के पास वर्तमान में 2.84 लाख टन यूरिया का पर्याप्त भंडार मौजूद है, इसलिए किसी भी स्तर पर घबराने या पैनिक करने की आवश्यकता नहीं है। प्रशासन का पूरा जोर अब इस बात पर है कि यह भंडार बिना किसी धांधली के सीधे अन्नदाताओं तक उनके खेतों तक पहुँचे।
यूरिया का विशाल भंडार और वितरण की नई रणनीति
कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव ने बैठक को संबोधित करते हुए उर्वरक विक्रेताओं को कड़े लहजे में निर्देश दिया कि स्टॉक की उपलब्धता और वितरण के बीच पारदर्शिता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 2.84 लाख टन यूरिया एक बड़ी मात्रा है और अगर इसका प्रबंधन सही ढंग से किया जाए, तो बिहार के एक भी किसान को खाद के लिए कतारों में नहीं लगना पड़ेगा। उन्होंने निर्देश दिया कि उर्वरकों की बिक्री केवल गहन जांच-पड़ताल और किसान की वास्तविक जरूरत के आधार पर ही की जाए। अक्सर देखा जाता है कि सीजन शुरू होने से पहले बड़े स्टॉकहोल्डर्स खाद को डंप कर लेते हैं, जिससे बाजार में कमी का आभास होता है।
इसे रोकने के लिए कृषि निदेशक ने पदाधिकारियों को सावधानी बरतने और नियमित अंतराल पर दुकानों और गोदामों का भौतिक सत्यापन करने का आदेश दिया है। अब उर्वरकों की बिक्री पीओएस (Point of Sale) मशीनों के माध्यम से और आधार सत्यापन के बाद ही सुनिश्चित की जाएगी। इससे न केवल कालाबाजारी पर रोक लगेगी, बल्कि यह भी पता चल सकेगा कि खाद का इस्तेमाल किस क्षेत्र में और कितनी मात्रा में हो रहा है।
टैगिंग और कालाबाजारी: बर्दाश्त नहीं होगी किसानों की लूट
बिहार के किसानों की एक पुरानी और बड़ी शिकायत ‘टैगिंग’ (Tagging) को लेकर रही है। अक्सर थोक विक्रेता या दुकानदार यूरिया की एक बोरी के साथ किसानों को जबरन जिंक, सल्फर या अन्य महंगे सूक्ष्म पोषक तत्व खरीदने पर मजबूर करते हैं। कृषि निदेशक ने इस कुप्रथा पर कड़ा प्रहार करते हुए उर्वरक निर्माता कंपनियों और थोक विक्रेताओं को सख्त निर्देश दिया कि उर्वरकों के साथ किसी भी अन्य उत्पाद की टैगिंग कतई नहीं की जाएगी। यदि किसी दुकान पर किसान को यूरिया के साथ कोई दूसरा उत्पाद जबरन खरीदने के लिए मजबूर किया गया, तो उस दुकानदार का लाइसेंस रद्द करने के साथ-साथ उन पर आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा।
सौरभ सुमन यादव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर कोई थोक विक्रेता, दुकानदार या यहाँ तक कि विभाग का कोई पदाधिकारी भी किसी गलत गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है, तो उस पर गाज गिरना तय है। उन्होंने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जिला स्तर पर निगरानी समितियों को और अधिक सक्रिय करने का आह्वान किया। उचित मूल्य (MRP) से एक रुपया भी अधिक लेना कानूनन अपराध माना जाएगा और इसके लिए कड़ी निगरानी प्रणाली विकसित की गई है।
लॉजिस्टिक्स और एफओआर आपूर्ति की अनिवार्यता
बैठक में उर्वरकों की ढुलाई और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को लेकर भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए गए। सभी आपूर्तिकर्ता और विनिर्माता उर्वरक कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे एफओआर (Freight on Road/Rate) आधार पर उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित करें। इसका सीधा अर्थ यह है कि कंपनियों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे निर्धारित दर पर खाद को विक्रेताओं तक पहुँचाएं, ताकि परिवहन लागत का अतिरिक्त बोझ किसानों पर न पड़े।
वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए, चूंकि अभी फसल का मुख्य सीजन शुरू होने में कुछ समय बाकी है, इसलिए कृषि निदेशक ने राज्य और जिला स्तर पर उर्वरकों के वैज्ञानिक भंडारण और संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि नमी और खराब रख-रखाव के कारण खाद की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। सभी जिलों से आए 5-5 प्रमुख थोक विक्रेताओं को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में बफर स्टॉक की स्थिति पर नजर रखें और समय रहते विभाग को मांग की जानकारी दें।
वैकल्पिक उर्वरकों और नैनो यूरिया पर जोर
मिट्टी की सेहत सुधारने और पारंपरिक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए कृषि निदेशक ने एक नई पहल की बात कही। उन्होंने उर्वरक विक्रेताओं से आग्रह किया कि वे किसानों को वैकल्पिक उर्वरकों, जैसे नैनो यूरिया और जैविक खादों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करें। नैनो यूरिया न केवल परिवहन में आसान है, बल्कि यह पारंपरिक यूरिया की तुलना में अधिक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल भी है।
सौरभ सुमन यादव के अनुसार, रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग बिहार की उपजाऊ मिट्टी को दीर्घकाल में नुकसान पहुँचा रहा है। इसलिए, विक्रेताओं को केवल ‘सेलर’ की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, बल्कि उन्हें एक ‘परामर्शदाता’ के रूप में किसानों को संतुलित उर्वरक प्रयोग (Integrated Nutrient Management) के बारे में शिक्षित करना चाहिए। इससे किसानों की लागत कम होगी और पैदावार की गुणवत्ता में सुधार होगा। विभाग ने इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की भी योजना बनाई है।
जिला स्तर पर कड़ी निगरानी और फीडबैक सिस्टम
बैठक में यह भी तय किया गया कि उर्वरक वितरण की निगरानी केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगी। कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी रैंडम तरीके से जिलों का दौरा करेंगे और सीधे किसानों से फीडबैक लेंगे। प्रत्येक जिले के जिला कृषि पदाधिकारी (DAO) को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि उनके क्षेत्र में उर्वरकों का कोई अवैध भंडारण न हो।
कृषि निदेशक ने कहा कि राज्य के सभी जिलों से जो थोक विक्रेता इस बैठक में शामिल हुए हैं, वे अपने क्षेत्रों में एक ‘नोडल’ की तरह काम करें और छोटे खुदरा विक्रेताओं तक यह संदेश पहुँचाएं कि सरकार की मंशा बिल्कुल साफ है—किसानों को उनके हक की खाद सही समय और सही दाम पर मिलनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि सीजन के दौरान यदि किसी जिले से खाद की कमी या ऊंचे दाम पर बिक्री की शिकायत आई, तो संबंधित पदाधिकारी की जवाबदेही तय की जाएगी।
बिहार की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में खरीफ सीजन, विशेषकर धान की खेती का बहुत महत्व है। यूरिया की समय पर उपलब्धता ही अच्छी पैदावार की गारंटी है। कृषि भवन में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक ने उर्वरक सिंडिकेट को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि प्रशासन की नजर उनके हर कदम पर है। 2.84 लाख टन का यह स्टॉक बिहार के किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है, जिसे सही हाथों तक पहुँचाना अब विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है। सौरभ सुमन यादव ने अंत में सभी प्रतिनिधियों से सहयोग की अपील की ताकि बिहार के कृषि विकास की गति को और तेज किया जा सके।


