
मोतिहारी। बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी खबर सामने आई है, जहाँ पुलिस महकमे के भीतर जड़ें जमा चुके ‘दलाल तंत्र’ पर निगरानी विभाग ने करारा प्रहार किया है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की पटना से आई विशेष टीम ने रक्सौल अनुमंडल के आदापुर थाना में अवैध रूप से काम करने वाले एक ‘प्राइवेट मुंशी’ को 14 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई आदापुर थाना क्षेत्र के जमुनभार चौक पर उस समय हुई जब आरोपी एक नागरिक से हथियार लाइसेंस के सत्यापन के बदले पैसों की उगाही कर रहा था। इस गिरफ्तारी ने न केवल पुलिस थानों में निजी व्यक्तियों के हस्तक्षेप को उजागर किया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वर्दी की आड़ में चल रहे अवैध वसूली के धंधे पर अब सीधे मुख्यालय की नजर है। आरोपी की पहचान आदापुर निवासी इंतकाब आलम के रूप में हुई है, जो लंबे समय से थाने में मुंशी का काम अनाधिकृत रूप से कर रहा था।
हथियार लाइसेंस के नाम पर वसूली: आफताब की शिकायत पर बिछा जाल
इस पूरे मामले की शुरुआत आदापुर थाना क्षेत्र के बखरी गांव निवासी आफताब अंसारी की एक शिकायत से हुई। आफताब अंसारी ने आत्मरक्षा के लिए हथियार के लाइसेंस हेतु आवेदन किया था। प्रशासनिक नियमों के अनुसार, हथियार लाइसेंस की प्रक्रिया में स्थानीय थाने से चरित्र और सुरक्षा संबंधी सत्यापन (Verification) अनिवार्य होता है। आफताब का आवेदन जब सत्यापन के लिए आदापुर थाना पहुँचा, तो वहां कार्यरत निजी मुंशी इंतकाब आलम ने उससे संपर्क किया।
आरोप है कि इंतकाब आलम ने थानाध्यक्ष के नाम पर और फाइल को आगे बढ़ाने के बदले आफताब से मोटी रकम की मांग की। उसने दावा किया कि बिना रिश्वत के सत्यापन की रिपोर्ट सही तरीके से नहीं भेजी जाएगी। बार-बार के दबाव और पैसों की मांग से तंग आकर आफताब अंसारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का फैसला किया और पटना स्थित निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई। ब्यूरो ने मामले की गंभीरता को देखते हुए गुप्त रूप से जांच शुरू की, जिसमें प्रथम दृष्टया रिश्वत मांगने की बात सही पाई गई।
निगरानी की घेराबंदी: जमुनभार चौक पर रंगे हाथों पकड़ा गया मुंशी
आफताब की शिकायत की पुष्टि होने के बाद निगरानी ब्यूरो ने ‘निगरानी थाना कांड संख्या 042/2026’ दर्ज की। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक विशेष धावादल (Trap Team) का गठन किया गया। इस टीम का नेतृत्व निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना के पुलिस उपाधीक्षक (DSP) गौतम कृष्ण कर रहे थे। योजना के अनुसार, आफताब अंसारी को रिश्वत के 14 हजार रुपये देने के लिए इंतकाब आलम के पास भेजा गया।
इंतकाब आलम ने आफताब को जमुनभार चौक के पास पैसे लेकर बुलाया था। निगरानी की टीम पहले से ही सादे लिबास में उस इलाके की घेराबंदी कर चुकी थी। जैसे ही आफताब अंसारी ने चिह्नित नोट इंतकाब आलम के हाथों में थमाए, वैसे ही सतर्क निगरानी टीम ने उसे दबोच लिया। आरोपी को संभलने तक का मौका नहीं मिला। मौके पर ही उसके पास से रिश्वत की वह राशि बरामद कर ली गई, जो उसने सत्यापन के नाम पर ली थी। इस गिरफ्तारी के बाद मौके पर काफी भीड़ जमा हो गई और अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
थाने के ‘प्राइवेट मुंशी’ संस्कृति पर उठे सवाल
इंतकाब आलम की गिरफ्तारी ने बिहार के पुलिस थानों में चल रहे ‘प्राइवेट मुंशी’ या ‘निजी कारिंदों’ की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक तौर पर किसी भी थाने में निजी व्यक्ति को सरकारी फाइलों या आधिकारिक कार्यों के प्रबंधन की अनुमति नहीं है। बावजूद इसके, आदापुर जैसे कई थानों में पुलिस पदाधिकारियों की मिलीभगत से ऐसे लोग काम करते हैं। ये ‘प्राइवेट मुंशी’ पुलिस और आम जनता के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाते हैं और अक्सर अनपढ़ या सीधे-साधे ग्रामीणों से काम कराने के नाम पर अवैध वसूली करते हैं।
निगरानी की टीम ने जब इंतकाब आलम को हिरासत में लिया, तो उसने स्वयं स्वीकार किया कि वह थाने पर प्राइवेट तौर पर मुंशी का काम करता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि थानाध्यक्ष और अन्य वरीय पुलिस अधिकारियों की नाक के नीचे एक गैर-सरकारी व्यक्ति इतने संवेदनशील कागजातों का निपटारा कैसे कर रहा था? क्या इस रिश्वतखोरी के पैसे में पुलिस पदाधिकारियों की भी हिस्सेदारी थी? निगरानी विभाग अब इन पहलुओं पर भी गहनता से अनुसंधान कर रहा है।
पूछताछ और कानूनी प्रक्रिया: रक्सौल से पटना तक की दौड़
गिरफ्तारी के बाद निगरानी की टीम आरोपी इंतकाब आलम को लेकर तुरंत रक्सौल अनुमंडल पुलिस कार्यालय पहुँची। यहाँ कड़ी सुरक्षा के बीच उससे प्रारंभिक पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान टीम ने यह जानने की कोशिश की कि वह कितने समय से इस थाने में सक्रिय था और अब तक उसने कितने लोगों से इस तरह की वसूली की है।
आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद निगरानी की टीम अभियुक्त को अपने साथ पटना ले गई। वहाँ उसे निगरानी की विशेष अदालत में पेश किया जाएगा। डीएसपी गौतम कृष्ण ने बताया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। ब्यूरो की इस कार्रवाई से न केवल आदापुर थाना, बल्कि पूरे पूर्वी चम्पारण जिले के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। जिले के अन्य थानों में भी काम कर रहे ‘निजी सहायकों’ ने डर के मारे फिलहाल थानों से दूरी बना ली है।
भ्रष्टाचार मुक्त शासन: आफताब अंसारी की हिम्मत की सराहना
आदापुर की यह घटना यह भी दर्शाती है कि अगर आम नागरिक जागरूक हों और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएं, तो तंत्र को साफ किया जा सकता है। आफताब अंसारी की हिम्मत की स्थानीय लोग सराहना कर रहे हैं। यदि आफताब ने रिश्वत देने के बजाय शिकायत करने का रास्ता नहीं चुना होता, तो शायद इंतकाब आलम जैसे लोग कभी कानून की गिरफ्त में नहीं आते।
निगरानी विभाग ने अपील की है कि यदि कोई भी सरकारी सेवक या उनके नाम पर कोई बिचौलिया रिश्वत की मांग करता है, तो तुरंत ब्यूरो को सूचित करें। विभाग का कहना है कि रिश्वतखोरी केवल सरकारी दफ्तरों को ही खोखला नहीं करती, बल्कि यह समाज के गरीब और जरूरतमंद वर्ग के अधिकारों का भी हनन करती है।
निष्कर्ष: सुधार की आवश्यकता
आदापुर थाने के इस प्रकरण ने राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि थानों के भीतर से बिचौलियों को बाहर निकालना अब अनिवार्य हो गया है। केवल निचले स्तर के कारिंदों की गिरफ्तारी काफी नहीं है; उन पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो इन निजी मुंशियों को अपने कक्ष में बैठकर काम करने की इजाजत देते हैं। जब तक पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं आएगी और ‘प्राइवेट मुंशी’ जैसी अवैध संस्थाओं का अंत नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाचार पर पूर्ण विराम लगाना कठिन होगा।
फिलहाल, इंतकाब आलम सलाखों के पीछे है और निगरानी विभाग उसके संपर्कों की पड़ताल कर रहा है। मोतिहारी और रक्सौल की जनता इस कार्रवाई से उत्साहित है और उम्मीद कर रही है कि आने वाले दिनों में पुलिस प्रशासन अपने भीतर की इन गंदगी को साफ करने के लिए खुद भी सख्त कदम उठाएगा।


