
मुख्य बिंदु:
- मरीज: भागलपुर निवासी 30 वर्षीय युवक, जिसकी गर्दन पर गहरे और जानलेवा जख्म थे।
- अस्पताल: पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच), पटना।
- समय: शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 की सुबह 8 बजे इमरजेंसी में भर्ती।
- जटिलता: घाव गर्दन के पिछले हिस्से में रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) के बेहद करीब था।
- टीम वर्क: ईएनटी, प्लास्टिक सर्जरी और जनरल सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों का संयुक्त ऑपरेशन।
- नेतृत्व: अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह की निगरानी और ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति शर्मा का सफल संचालन।
पटना। जिंदगी और मौत के बीच का फासला कभी-कभी महज कुछ मिलीमीटर का होता है। भागलपुर के एक 30 वर्षीय युवक के लिए शुक्रवार की सुबह कुछ ऐसी ही कयामत लेकर आई थी, जहाँ उसकी सांसें उसकी गर्दन पर लगे एक गहरे जख्म के साथ उखड़ रही थीं। लेकिन कहते हैं कि ‘हौसलों के आगे पहाड़ भी झुक जाते हैं’, और पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) के डॉक्टरों ने इस कहावत को हकीकत में बदल दिया। शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को पीएमसीएच के ऑपरेशन थिएटर में जो हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। गर्दन के पिछले हिस्से में स्पाइन तक पहुँच चुके गहरे घाव के साथ पहुँचे युवक को डॉक्टरों ने अपनी सूझबूझ और असाधारण सर्जिकल कौशल से नया जीवन प्रदान किया। यह ऑपरेशन न केवल मेडिकल साइंस की जीत है, बल्कि यह बिहार के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की उस मुस्तैदी की भी कहानी है, जहाँ संसाधनों से ज्यादा डॉक्टरों की दृढ़ इच्छाशक्ति काम आती है।
मौत की दहलीज पर खड़ा मरीज: 8 बजे की वह खौफनाक सुबह
शुक्रवार की सुबह करीब 8 बजे जब पूरा शहर अपनी रफ्तार पकड़ रहा था, पीएमसीएच की इमरजेंसी में भागलपुर के एक युवक को लाया गया। युवक की स्थिति इतनी भयावह थी कि उसे देखकर वहां मौजूद कर्मियों के भी हाथ-पांव फूल गए। उसकी गर्दन के पिछले हिस्से में एक ऐसा गहरा और जटिल जख्म था, जिसने गर्दन की मांसपेशियों को चीरते हुए रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) की चौखट पर दस्तक दे दी थी।
डॉक्टरों के अनुसार, गर्दन शरीर का वह हिस्सा है जिसे ‘लाइफ लाइन’ कहा जाता है। यहाँ से होकर दिमाग को रक्त पहुँचाने वाली धमनियां और पूरे शरीर को संचालित करने वाला नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) गुजरता है। युवक की चोट इतनी गहरी थी कि जरा-सी भी लापरवाही या देरी उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना सकती थी या उसकी जान ले सकती थी। इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के साथ ही ईएनटी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति शर्मा को सूचित किया गया।
स्पाइन का संकट: मिलीमीटर की दूरी और जिंदगी का सवाल
चिकित्सीय परीक्षण के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे डराने वाले थे। घाव न केवल चौड़ा था, बल्कि वह गर्दन के पिछले हिस्से की संरचना को भेदते हुए स्पाइनल कॉलम के बेहद करीब पहुँच गया था। मेडिकल भाषा में इसे ‘न्यूरोलॉजिकल डेफिसिट’ का खतरा कहा जाता है। यदि रीढ़ की हड्डी के भीतर मौजूद तंत्रिकाओं को हल्की-सी भी खरोंच आती, तो युवक का पूरा शरीर लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो सकता था।
डॉ. प्रीति शर्मा ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए तुरंत अस्पताल अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह से संपर्क किया। अधीक्षक ने बिना समय गंवाए इसे एक ‘क्रिटिकल इमरजेंसी’ घोषित किया और निर्देश दिया कि इसे केवल एक विभाग नहीं, बल्कि विशेषज्ञों का एक संयुक्त समूह हैंडल करेगा। यह एक चुनौतीपूर्ण निर्णय था, क्योंकि समय रेत की तरह फिसल रहा था और मरीज का खून लगातार बह रहा था।
तीन विभागों का संगम: जब विज्ञान बना संजीवनी
अधीक्षक डॉ. राजीव सिंह के समन्वय से एक मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम का गठन किया गया। इसमें ईएनटी (ENT) विभाग, प्लास्टिक सर्जरी विभाग और जनरल सर्जरी विभाग के बेहतरीन सर्जनों को शामिल किया गया। इस तरह का तालमेल अक्सर बड़े निजी अस्पतालों में देखा जाता है, लेकिन पीएमसीएच ने साबित किया कि सरकारी व्यवस्था में भी समन्वय की कोई कमी नहीं है।
डॉ. प्रीति शर्मा के नेतृत्व में ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की गई। प्लास्टिक सर्जरी विभाग का काम यह सुनिश्चित करना था कि गर्दन की कटी हुई मांसपेशियों और त्वचा को इस तरह जोड़ा जाए कि भविष्य में गर्दन की सक्रियता (Mobility) बनी रहे। वहीं जनरल सर्जरी टीम का ध्यान रक्त के रिसाव को रोकने और आंतरिक अंगों की सुरक्षा पर था। डॉ. राजीव सिंह खुद इस पूरे ऑपरेशन की मॉनिटरिंग कर रहे थे ताकि किसी भी संसाधन की कमी आड़े न आए।
ऑपरेशन थिएटर का संघर्ष: सूई की नोंक पर टिकी जिंदगी
ऑपरेशन थिएटर के भीतर सन्नाटा था, जिसे केवल मशीनों की बीप तोड़ रही थी। डॉ. प्रीति शर्मा और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—रीढ़ की हड्डी को छुए बिना उसके चारों ओर की मृत मांसपेशियों (Debridement) को साफ करना और कटी हुई नसों को पुनर्जीवित करना। एक गलत कट और मरीज की जिंदगी हमेशा के लिए खामोश हो सकती थी।
विशेषज्ञों ने सूक्ष्म उपकरणों की मदद से पहले घाव के भीतर छिपे संक्रमण की संभावनाओं को खत्म किया। इसके बाद प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने कटी हुई नसों और ऊतकों की एक-एक परत को बारीकी से सीना शुरू किया। गर्दन की बनावट इतनी जटिल होती है कि यहाँ टांके लगाना किसी महीन चित्रकारी जैसा होता है। घंटों चले इस श्रमसाध्य ऑपरेशन के बाद आखिरकार डॉक्टरों ने उस जानलेवा जख्म को बंद करने में सफलता पाई।
न्यूरोलॉजिकल डेफिसिट से बचाव: डॉक्टरों की बड़ी जीत
ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने सबसे पहले युवक के रिफ्लेक्स और तंत्रिका तंत्र की जांच की। यह देखना सुखद था कि युवक के शरीर के अंगों में हलचल थी, जिसका मतलब था कि स्पाइन सुरक्षित थी। डॉ. प्रीति शर्मा ने बताया कि अगर मरीज को अस्पताल लाने में एक घंटा भी और देरी होती, तो संक्रमण या अधिक रक्तस्राव के कारण उसे बचाना असंभव हो जाता।
अधीक्षक डॉ. राजीव सिंह ने इस सफलता पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि पीएमसीएच में जटिल से जटिल सर्जरी के लिए विशेषज्ञ मौजूद हैं। उन्होंने टीम के आपसी तालमेल की सराहना की। यह सर्जरी बिहार के उन मरीजों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो अक्सर गंभीर चोटों की स्थिति में निजी अस्पतालों के भारी-भरकम बिलों के डर से टूट जाते हैं।
भागलपुर से पटना तक: एक परिवार की उम्मीदें
युवक का परिवार भागलपुर से उसे लेकर पटना पहुँचा था। उनकी आंखों में जो खौफ था, वह अब राहत के आंसुओं में बदल गया है। 30 साल की उम्र, जिसमें एक व्यक्ति अपने परिवार का स्तंभ होता है, उसे वापस खड़ा होते देखना उनके लिए किसी पुनर्जन्म जैसा है। फिलहाल युवक को आईसीयू में गहन निगरानी में रखा गया है, और उसकी स्थिति अब पूरी तरह स्थिर बताई जा रही है।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, अगले कुछ दिनों तक उसे विशेष एंटीबायोटिक्स और फिजियोथेरेपी की जरूरत होगी ताकि उसकी गर्दन की मांसपेशियां दोबारा अपनी पुरानी मजबूती हासिल कर सकें। भागलपुर के इस युवक की कहानी अब पीएमसीएच के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, जहाँ डॉक्टरों की एक ‘टीम’ ने मौत को उसके घर के दरवाजे से वापस भेज दिया।
निष्कर्ष: सरकारी अस्पतालों की सामूहिकता की मिसाल
पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का यह कारनामा केवल एक मेडिकल रिपोर्ट नहीं है, बल्कि यह सुशासन और स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे सुधारों का प्रतिबिंब है। जब अधीक्षक, विभागाध्यक्ष और कनिष्ठ डॉक्टर एक साथ मिलकर किसी मरीज की जान बचाने के लिए घंटों संघर्ष करते हैं, तो आम आदमी का भरोसा व्यवस्था पर और मजबूत होता है।
डॉ. प्रीति शर्मा, डॉ. राजीव सिंह और उनकी पूरी टीम ने यह साबित किया है कि अगर नीयत साफ हो और समन्वय सटीक, तो बड़ी से बड़ी आपदा को टाला जा सकता है। भागलपुर का वह युवक अब ठीक होकर अपने घर लौटेगा, लेकिन उसकी गर्दन पर लगा वह टांका हमेशा उसे पीएमसीएच के उन ‘फरिश्तों’ की याद दिलाएगा जिन्होंने उसे नया जीवन दिया। यह खबर उन तमाम लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो सरकारी अस्पतालों की सक्षमता पर सवाल उठाते हैं। पीएमसीएच आज अपनी इस कामयाबी के साथ बिहार के स्वास्थ्य मानचित्र पर एक बार फिर गर्व से खड़ा है।


