
आजमनगर (कटिहार)। 08 अप्रैल 2026: बिहार के कटिहार जिले से कानून और पुलिसिया तफ्तीश का ऐसा मजाक सामने आया है जिसे सुनकर किसी का भी सिर चकरा जाए। 10 महीने पहले जिस महिला को कागजों पर ‘मार’ दिया गया था, जिसकी ‘हत्या’ के जुर्म में एक निर्दोष देवर सलाखों के पीछे सड़ रहा है और जिसके शव की तलाश महानंदा नदी की लहरों में की गई थी—वह महिला न केवल जिंदा है, बल्कि अपने प्रेमी के साथ गुजरात में ‘हनीमून’ मनाकर वापस लौट आई है। आजमनगर प्रखंड के कुशहा गांव का यह मामला अब बिहार पुलिस की कार्यशैली पर एक ऐसा बदनुमा दाग बन गया है, जिसका जवाब देना आला अधिकारियों के लिए नामुमकिन साबित हो रहा है।
’मुर्दा’ लौटी जिंदा: सुधानी स्टेशन पर हुआ क्लाइमेक्स
यह फिल्मी पटकथा जैसा लगने वाला वाकया मंगलवार को उस वक्त हकीकत में बदल गया जब लक्खी देवी अपने प्रेमी प्रेम कुमार उर्फ घीसटा के साथ सुधानी थाना क्षेत्र के दोगज गांव पहुँची। जैसे ही गांव वालों ने उस महिला को देखा जिसे वे 10 महीने पहले ‘मृत’ मान चुके थे, पूरे इलाके में बिजली की तरह खबर फैल गई। सूचना मिलते ही पुलिस ने तत्काल लक्खी देवी को बरामद किया और आनन-फानन में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया। लक्खी देवी की वापसी ने उन तमाम पुलिसिया दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं जिनके आधार पर एक चचेरे देवर को ‘कातिल’ करार दिया गया था।
10 महीने का ‘झूठ’: कैसे फंसाया गया निर्दोष देवर?
प्रकरण की शुरुआत 9 जून 2025 को हुई थी, जब लक्खी देवी अचानक लापता हो गई। इसके बाद जो हुआ वह ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है:
- सूचक की साजिश: लक्खी देवी के भाई भीम यादव ने आजमनगर थाने में आवेदन देकर अपने चचेरे देवर राजेश यादव पर हत्या का संगीन आरोप लगाया।
- पुलिस का ‘कबुलीनामा’: पुलिस ने उस वक्त दावा किया था कि राजेश यादव ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, राजेश ने बताया था कि उसने लक्खी की हत्या कर शव को महानंदा नदी में फेंक दिया है।
- बिना लाश के सजा: ताज्जुब की बात यह है कि पुलिस ने महानंदा नदी में एक दिन भी सर्च ऑपरेशन चलाकर लाश बरामद करने की जहमत नहीं उठाई। बिना किसी फॉरेंसिक सबूत या शव के, सिर्फ एक ‘कथित’ कबुलीनामे के आधार पर राजेश यादव को जेल भेज दिया गया।
9 साल का प्रेम प्रसंग और गुजरात का पलायन
तफ्तीश में अब यह बात साफ हुई है कि लक्खी देवी मरी नहीं थी, बल्कि अपनी मर्जी से प्रेमी के साथ फरार हुई थी। लक्खी देवी और गुजरात में काम करने वाले युवक प्रेम कुमार के बीच पिछले 9 वर्षों से प्रेम प्रसंग चल रहा था। 9 जून 2025 को लक्खी देवी ने भागने का प्लान बनाया और प्रेमी के साथ गुजरात चली गई। वहां दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे थे। 10 महीने बाद जब वे वापस लौटे, तब जाकर इस पूरी साजिश का पर्दाफाश हुआ।
अनुसंधानकर्ता और सूचक पर उठते गंभीर सवाल
लक्खी देवी के जिंदा मिलने के बाद आजमनगर पुलिस और केस के अनुसंधानकर्ता (IO) कठघरे में हैं। लोग पूछ रहे हैं:
- लाश कहाँ थी? जब लाश मिली ही नहीं, तो पुलिस ने हत्या की धारा (302) के तहत चार्जशीट कैसे दाखिल की?
- जबरन कबुलीनामा? क्या राजेश यादव से मारपीट कर या दबाव डालकर हत्या की बात कबुलवाई गई थी?
- सूचक पर कार्रवाई: क्या अपनी बहन के भागने की बात छिपाकर देवर को फंसाने वाले भीम यादव पर जालसाजी का मुकदमा चलेगा?
निष्कर्ष: न्याय प्रणाली के चेहरे पर तमाचा
राजेश यादव पिछले 10 महीनों से उस गुनाह की सजा काट रहा है जो कभी हुआ ही नहीं। उसकी जवानी के 10 अनमोल महीने जेल की कालकोठरी में पुलिस की ‘लापरवाही’ की भेंट चढ़ गए। यह मामला बिहार पुलिस के लिए एक सबक है कि बिना वैज्ञानिक साक्ष्यों के केवल ‘बयानों’ के आधार पर किसी की जिंदगी बर्बाद करना कितना खतरनाक हो सकता है।
अब देखना यह है कि न्यायालय इस मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों और झूठी प्राथमिकी दर्ज कराने वाले भाई पर क्या कार्रवाई करता है। फिलहाल, कटिहार के कुशहा गांव में इस ‘जिंदा लाश’ की चर्चा हर जुबान पर है।


