
पटना के जल भवन में ‘ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट’ पर मंथन: 6500 योजनाओं का खाका तैयार, 5 वर्षों में हर खेत तक सिंचाई पहुँचाने का लक्ष्य; नवाचार और तकनीक से लैस होंगे अभियंता
पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था को मानसून की अनिश्चितताओं से उबारने और हर खेत तक सिंचाई की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में लघु जल संसाधन विभाग ने एक बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार, 7 अप्रैल 2026 को राजधानी पटना के ‘जल भवन’ में दो दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आगाज़ हुआ। ‘ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट एंड सस्टेनेबल इरिगेशन प्रैक्टिस’ (भूजल प्रबंधन एवं सतत सिंचाई पद्धति) विषय पर आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विभाग के अभियंताओं को आधुनिक तकनीकों से लैस करना और राज्य की जल संपदा का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन विभाग के सचिव बी. कार्तिकेय धनजी, अपर सचिव संगीता सिंह और अभियंता प्रमुख सुनील कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर सचिव ने स्पष्ट किया कि सरकार का विजन केवल कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका अंतिम लक्ष्य राज्य के प्रत्येक किसान की आय में वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बेहतर जल प्रबंधन के लिए केवल सरकारी आदेश काफी नहीं हैं, इसके लिए अभियंताओं का दक्ष होना और उनके पास एक स्पष्ट विजन होना अनिवार्य है।
संरचना निर्माण से आगे: किसानों के जीवन स्तर में सुधार का लक्ष्य
सचिव बी. कार्तिकेय धनजी ने अपने संबोधन में विभाग की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं का मूल उद्देश्य केवल भौतिक संरचनाओं (जैसे चेक डैम, नलकूप या तालाब) का निर्माण कर देना मात्र नहीं है। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब इन संरचनाओं के माध्यम से किसानों के जीवन स्तर में ठोस और सकारात्मक बदलाव नजर आए।
उनका कहना था कि राज्य सरकार का संकल्प ‘हर खेत तक पानी’ पहुँचाने का है। जब खेत के अंतिम छोर तक पानी पहुँचेगा, तभी फसल उत्पादन में स्थिरता आएगी और किसान बाजार की अनिश्चितताओं का सामना कर पाएगा। उन्होंने कहा कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए तीन स्तंभों—स्पष्ट विजन, सुदृढ़ योजना निर्माण और प्रभावी निगरानी—पर काम करना आवश्यक है। यदि योजना की नींव में ही विजन की कमी होगी, तो उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुँच पाएगा।
अभियंताओं की भूमिका: तकनीकी कौशल और प्रबंधकीय नवाचार
कार्यशाला का केंद्र बिंदु अभियंताओं का कौशल विकास रहा। सचिव ने माना कि बदलते वैश्विक परिवेश और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच पुरानी सिंचाई पद्धतियां अब पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने अभियंताओं से आह्वान किया कि वे स्वयं को नवीनतम तकनीकों, आधुनिक सिंचाई प्रणालियों और डेटा आधारित नवाचारों से अपडेट रखें। इसी उद्देश्य से विशेषज्ञों और अकादमिक संस्थानों को इस कार्यशाला में आमंत्रित किया गया है ताकि वे अभियंताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’ से अवगत करा सकें।
सचिव ने अभियंताओं को निर्देश दिया कि वे केवल दफ्तरों तक सीमित न रहें, बल्कि क्षेत्रीय अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा करें। योजनाओं के क्रियान्वयन में धरातल पर जो भी तकनीकी या सामाजिक कठिनाइयां आती हैं, उन पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। सामूहिक समाधान और अनुभवों के आदान-प्रदान से ही योजनाओं को परिणामोन्मुख बनाया जा सकता है। उन्होंने घोषणा की कि अभियंताओं के तकनीकी एवं प्रबंधकीय कौशल के उन्नयन के लिए भविष्य में भी ऐसी कार्यशालाएं निरंतर आयोजित की जाती रहेंगी।
योजनाओं का लेखा-जोखा: 5 वर्षों में पूरा होगा 6500 परियोजनाओं का लक्ष्य
बिहार में लघु सिंचाई की वर्तमान स्थिति और भविष्य के लक्ष्यों पर चर्चा करते हुए सचिव ने महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि राज्य के सभी जिलों में सिंचाई की आवश्यकताओं को समझने के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण कराया गया है। इस सर्वे के आधार पर राज्य भर में कुल 6500 योजनाओं को चिन्हित किया गया है।
इन योजनाओं के क्रियान्वयन की गति को लेकर उन्होंने संतोष जताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान लगभग 1300 योजनाओं को सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिया गया है। शेष योजनाओं के लिए एक पंचवर्षीय कार्ययोजना (Five-Year Plan) तैयार की गई है, जिसके तहत अगले पांच वर्षों में निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप सभी चिन्हित योजनाओं को पूरा कर लिया जाएगा। यह योजनाबद्ध तरीका यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य का कोई भी कोना सिंचाई सुविधा से वंचित न रहे।
जल संसाधन: हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर
अपने संबोधन के एक महत्वपूर्ण हिस्से में सचिव ने जल संसाधनों के संरक्षण को बिहार की संस्कृति और विरासत से जोड़ा। उन्होंने कहा कि तालाब, पोखर और अन्य पारंपरिक जल निकाय केवल सिंचाई के साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमारी अमूल्य धरोहर हैं। जल प्रबंधन के ऐतिहासिक उदाहरणों, जैसे पुराने समय की ‘आहार-पईन’ व्यवस्था, का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमें विरासत और आधुनिक तकनीक का समन्वय करना होगा।
तालाबों के संरक्षण से न केवल भूजल स्तर में सुधार होता है, बल्कि यह मत्स्य पालन जैसे सहायक आय के स्रोतों को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने समग्र जल प्रबंधन (Integrated Water Management) की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे एक ही जल स्रोत से कृषि, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण जैसे बहुआयामी लाभ लिए जा सकें।
तकनीकी सत्र: भूजल पुनर्भरण और डेटा आधारित योजना
दो दिवसीय कार्यशाला के पहले दिन विभिन्न तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ। इसमें देश भर से आए भूजल विशेषज्ञों ने ‘कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक’ (Artificial Recharge Techniques) और ‘सतत भूजल प्रबंधन’ पर विस्तृत जानकारी दी। कार्यशाला में चर्चा के मुख्य विषय रहे:
- भूजल आकलन: जमीन के नीचे उपलब्ध पानी की सटीक मात्रा का पता लगाने के लिए आधुनिक सेंसर और सैटेलाइट डेटा का उपयोग।
- जल उपयोग दक्षता: कम पानी में अधिक सिंचाई सुनिश्चित करने के लिए ‘ड्रिप’ और ‘स्प्रिंकलर’ जैसी प्रणालियों का एकीकरण।
- डेटा आधारित योजना: क्षेत्रीय डेटा का उपयोग कर यह तय करना कि किस इलाके में किस प्रकार की सिंचाई संरचना (जैसे बोरवेल या चेक डैम) अधिक प्रभावी होगी।
- सतत सिंचाई: पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना लंबे समय तक सिंचाई व्यवस्था को बनाए रखने के उपाय।
इन सत्रों के दौरान अभियंताओं ने विशेषज्ञों से अपनी शंकाओं का समाधान किया और भूजल संचयन के नए तौर-तरीकों को समझा।
मॉनसून पर निर्भरता कम करने का मिशन
सचिव ने गर्व के साथ उल्लेख किया कि पहले बिहार का किसान काफी हद तक केवल मॉनसून की मेहरबानी पर निर्भर रहता था। लेकिन सरकार के निरंतर प्रयासों, नहरों के जीर्णोद्धार और लघु सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार से अब यह निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है। अब लक्ष्य यह है कि वर्ष के बारहों महीने किसानों को उनकी आवश्यकतानुसार पानी उपलब्ध कराया जा सके, जिससे वे साल में तीन फसलें लेने में सक्षम हो सकें।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अभियंता सुनील कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया और इस आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अभियंताओं के लिए यह सीखने का एक बड़ा अवसर है। कार्यक्रम में संयुक्त सचिव, विभिन्न वैज्ञानिक और राज्य भर से आए सैकड़ों अभियंता उपस्थित थे। यह कार्यशाला 8 अप्रैल को भी जारी रहेगी, जिसमें दूसरे दिन के तकनीकी सत्रों के बाद निष्कर्षों के आधार पर एक ‘एक्शन प्लान’ तैयार किया जाएगा।
बिहार के लघु जल संसाधन विभाग की यह पहल निश्चित रूप से आने वाले समय में राज्य की कृषि विकास दर को नई गति प्रदान करेगी। जब अभियंता दक्ष होंगे और विजन स्पष्ट होगा, तो बिहार की धरती का हर कोना हरा-भरा होगा।


