रेलवे के डिजिटल सिस्टम और धरातल के बीच ‘सिग्नल’ फेल: पटना-आंबेडकर नगर स्पेशल ट्रेन में यात्रियों ने खोजा अपना कोच, पर पटरी पर था ही नहीं; 57 मुसाफिरों ने काटा हंगामा, डीडीयू में कोच जोड़कर थमी नाराजगी

  • ​पूर्व मध्य रेलवे के दानापुर मंडल में एक अजीबोगरीब ‘तकनीकी खेल’ देखने को मिला, जहाँ आरक्षण प्रणाली (PRS) में तो एक अतिरिक्त थर्ड एसी कोच जुड़ गया, लेकिन भौतिक रूप से ट्रेन में वह डिब्बा गायब था।
  • ​गाड़ी संख्या 09344 पटना-आंबेडकर नगर स्पेशल में कन्फर्म टिकट लेकर पहुँचे 57 यात्री उस समय सन्न रह गए, जब स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में उनके टिकट पर अंकित कोच नंबर वाली बोगी ही मौजूद नहीं थी।
  • ​पटना जंक्शन पर शनिवार की अहले सुबह 3:30 बजे यात्रियों के भारी विरोध और हंगामे के कारण रेल प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए, जिसके बाद यात्रियों को अन्य बोगियों में ‘एडजस्ट’ कर रवाना किया गया।
  • ​रेलवे के कॉमर्शियल, ऑपरेटिंग और मैकेनिकल विभागों के बीच समन्वय की भारी कमी इस घटना का मुख्य कारण मानी जा रही है, जिसकी उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।
  • ​अंततः मुगलसराय (डीडीयू) स्टेशन पर करीब 8 घंटे की देरी के बाद एक अतिरिक्त थर्ड एसी कोच जोड़ा गया, तब जाकर यात्रियों को उनकी आवंटित सीटें मिल सकीं।

पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।

डिजिटल मायाजाल और यात्री बेहाल: जब ‘कागजी’ कोच ने बढ़ाया रेल का तनाव

भारतीय रेलवे जहाँ एक ओर ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘आधुनिक रेल’ का दम भर रही है, वहीं पटना जंक्शन पर घटी एक घटना ने सिस्टम की खामियों की पोल खोलकर रख दी है। अक्सर यात्री ट्रेन लेट होने या सफाई न होने की शिकायत करते हैं, लेकिन पटना से उज्जैन होते हुए डॉ. आंबेडकर नगर जाने वाली विशेष ट्रेन (09344) में जो हुआ, वह रेल इतिहास की दुर्लभ तकनीकी भूलों में शुमार हो गया। 57 यात्रियों के हाथ में ‘कन्फर्म’ टिकट था, सिस्टम में सीट नंबर दर्ज थे, लेकिन जब वे प्लेटफॉर्म पर पहुँचे तो वह पूरी बोगी ही नदारद थी। यह स्थिति किसी भी मुसाफिर के लिए मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं थी, क्योंकि उन्होंने इस अतिरिक्त कोच के लिए बाकायदा भुगतान किया था और लंबी दूरी की यात्रा पर निकले थे।

तालमेल का अभाव: मैकेनिकल और कॉमर्शियल विभाग के बीच ‘पटरी’ खराब

रेलवे के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण की जड़ ‘समन्वय की कमी’ में छिपी है। दरअसल, स्पेशल ट्रेनों की मांग को देखते हुए कॉमर्शियल विभाग ने आरक्षण सिस्टम (PRS) में एक अतिरिक्त थर्ड एसी कोच अपलोड कर दिया था। इस अपलोडिंग के आधार पर यात्रियों ने धड़ाधड़ सीटें बुक कर लीं। नियमतः, जैसे ही सिस्टम में कोच बढ़ता है, ऑपरेटिंग और मैकेनिकल विभाग को इसकी सूचना दी जानी चाहिए ताकि यार्ड से ट्रेन निकालते समय वह कोच जोड़ दिया जाए। लेकिन यहाँ फाइलें या डिजिटल संदेश एक विभाग से दूसरे विभाग तक समय पर नहीं पहुँच सके। परिणाम यह हुआ कि मैकेनिकल विभाग ने ट्रेन में केवल सामान्य 7 कोच ही लगाए और ट्रेन को वॉशिंग पिट से प्लेटफॉर्म पर भेज दिया।

शनिवार की वह खौफनाक सुबह: पटना जंक्शन पर हंगामे का शोर

ट्रेन शुक्रवार की रात 9:30 बजे ही रवाना होनी थी, लेकिन यह पहले से ही 6 घंटे की देरी से चल रही थी। शनिवार की सुबह 3:30 बजे जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी, तो ठंड और थकान से चूर यात्री अपने कोच को ढूंढने लगे। जिन 57 यात्रियों के टिकट पर अतिरिक्त कोच का नंबर दर्ज था, वे पूरी ट्रेन में आगे से पीछे तक दौड़ते रहे, लेकिन उन्हें वह बोगी कहीं नहीं मिली। यात्रियों का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने प्लेटफॉर्म पर ही रेल प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी और हंगामा शुरू कर दिया। आरपीएफ और जीआरपी के जवानों ने स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन मुसाफिर अपनी कन्फर्म सीटों पर अड़े रहे। अंततः, अधिकारियों ने लिखित आश्वासन दिया कि मुगलसराय (डीडीयू) पहुँचते ही कोच जोड़ दिया जाएगा, तब जाकर यात्री किसी तरह अन्य डिब्बों में सवार हुए।

डीडीयू में हुआ ‘डैमेज कंट्रोल’: 8 घंटे की देरी और तब मिला सुकून

पटना से रवाना होने के बाद भी यात्रियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। ट्रेन सुबह 10:13 बजे दीन दयाल उपाध्याय (डीडीयू) स्टेशन पहुँची। यहाँ रेलवे ने ‘इमरजेंसी’ के तौर पर एक अतिरिक्त थर्ड एसी कोच तैयार रखा था। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैकेनिकल टीम ने फुर्ती दिखाते हुए नया कोच जोड़ा। 57 यात्रियों को उनकी सीटों पर शिफ्ट किया गया। इस पूरी प्रक्रिया और तकनीकी गड़बड़ी के कारण ट्रेन अपने निर्धारित समय से करीब 8 घंटे से भी ज्यादा की देरी से आगे बढ़ी। मुसाफिरों का कहना था कि रेलवे की इस लापरवाही ने उनकी पूरी यात्रा का जायका बिगाड़ दिया और जो समय उन्हें आराम में बिताना था, वह कोच ढूंढने और संघर्ष करने में व्यतीत हुआ।

सत्यानंद चंद्रा का आधिकारिक पक्ष: “दोषियों पर होगी सख्त कार्रवाई”

पूर्व मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी सरस्वती चंद्र ने इस मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए स्वीकार किया कि तकनीकी समस्या के कारण सिस्टम में अतिरिक्त कोच लोड हो गया था। उन्होंने बताया कि जैसे ही प्रशासन को इस भारी चूक का पता चला, तत्काल डीडीयू स्टेशन पर कोच की व्यवस्था की गई। सीपीआरओ के अनुसार, इस गंभीर लापरवाही की विस्तृत जांच की जा रही है। कॉमर्शियल और ऑपरेटिंग विभाग के उन अधिकारियों और कर्मचारियों को चिह्नित किया जा रहा है जिन्होंने सिस्टम में डेटा तो डाला लेकिन उसे भौतिक रूप से लागू करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए। रिपोर्ट आने के बाद जवाबदेही तय की जाएगी और कड़ी विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित होगी।

सूचना तंत्र की महत्ता: सांसद अजय कुमार मंडल ने भी उठाए थे सवाल

रेलवे और अन्य सार्वजनिक सेवाओं में सूचनाओं के सही प्रवाह का मुद्दा हाल ही में संसद में भी गूँजा था। भागलपुर के सांसद अजय कुमार मंडल ने 1 अप्रैल 2026 को लोकसभा में प्रश्न संख्या 6080 के माध्यम से प्रसारण सेवाओं और डिजिटल विस्तार की स्थिति पर सवाल पूछे थे। केंद्र सरकार ने अपने उत्तर में बताया कि “न्यूज़ ऑन एयर” मोबाइल ऐप और “वेव्स” ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से सूचनाओं को सुलभ बनाया जा रहा है। रेलवे के संदर्भ में भी, अगर यात्रियों के पास रीयल-टाइम सूचना अपडेट करने वाला कोई सटीक माध्यम होता, तो शायद स्टेशन पहुँचने से पहले ही उन्हें इस तकनीकी गड़बड़ी का पता चल जाता। सूचना और प्रसारण मंत्रालय सामुदायिक रेडियो और डिजिटल माध्यमों को इसी कारण बढ़ावा दे रहा है ताकि ऐसी प्रशासनिक विफलताओं की जानकारी त्वरित रूप से साझा की जा सके।

क्या केवल तकनीकी गलती कहना काफी है?

पटना जंक्शन की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम तकनीक पर इतने निर्भर हो गए हैं कि मानवीय निरीक्षण की आवश्यकता खत्म हो गई है? एक पूरी बोगी का गायब होना केवल सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी नहीं, बल्कि सुरक्षा और प्रबंधन की एक बड़ी चूक है। 57 यात्रियों के भरोसे को जिस तरह ठेस पहुँची है, उसकी भरपाई केवल एक अतिरिक्त कोच जोड़ देने से नहीं होगी। रेलवे को अपने अंतर्विभागीय संचार (Inter-departmental communication) को दुरुस्त करना होगा ताकि भविष्य में किसी यात्री को अपनी कन्फर्म सीट के लिए प्लेटफॉर्म पर आंदोलन न करना पड़े।

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