
किशनगंज। बिहार पुलिस के एक रसूखदार अधिकारी रहे गौतम कुमार की मुश्किलें अब केवल उनके दफ्तर या आवास तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि इसकी तपिश अब उनके करीबियों और उनके घर काम करने वाले कर्मचारियों तक पहुँच चुकी है। आय से अधिक संपत्ति (DA Case) अर्जित करने के मामले में आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए अब ‘बेनामी निवेश’ की उन कड़ियों को जोड़ना शुरू कर दिया है, जिन्हें अक्सर रसूखदार लोग अपनी काली कमाई छुपाने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। शनिवार, 4 अप्रैल 2026 को किशनगंज शहर के धर्मगंज इलाके में ईओयू की हलचल ने पूरे जिले के प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया। जांच टीम न केवल पूर्व एसडीपीओ के पूर्व सहयोगियों, बल्कि उनके घर काम करने वाली एक महिला कर्मचारी के दरवाजे तक जा पहुँची। यह कार्रवाई इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ईओयू अब गौतम कुमार द्वारा बनाई गई संपत्तियों के उस गुप्त साम्राज्य को ध्वस्त करने के मूड में है, जिसे उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान कथित रूप से खड़ा किया था।
धर्मगंज में सन्नाटा और बंद ताला: सहायिका के नाम पर ‘निवेश’ का संदेह
शनिवार की दोपहर जब किशनगंज शहर के धर्मगंज स्थित एक किराए के मकान के बाहर आर्थिक अपराध इकाई की गाड़ियां रुकीं, तो वहां के मोहल्लेवासियों में सुगबुगाहट तेज हो गई। ईओयू की टीम उस महिला के घर पहुँची थी, जो पूर्व एसडीपीओ गौतम कुमार के घर पर घरेलू सहायिका (काम करने वाली) के रूप में कार्यरत थी। हालांकि, जांच टीम को वहां खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि घर पर ताला जड़ा हुआ था और महिला वहां मौजूद नहीं थी।
भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों का यह एक पुराना और प्रभावी तरीका रहा है कि वे उन छोटे कर्मचारियों के बैंक खातों और संपत्तियों की जांच करते हैं, जिनका उपयोग बड़े अधिकारी अपनी संपत्ति को सफेद करने या छुपाने के लिए कर सकते हैं। ईओयू को संदेह है कि पूर्व एसडीपीओ ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कुछ निवेश या संपत्तियां अपनी इस कर्मचारी या उसके परिजनों के नाम पर भी खरीदी हो सकती हैं। हालांकि, ईओयू के अधिकारियों ने फिलहाल इस छापेमारी और बंद ताले को लेकर किसी भी प्रकार की आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार किया है, लेकिन इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि जांच का घेरा अब बहुत गहरा और व्यक्तिगत हो चला है।
परिवहन विभाग और निबंधन कार्यालय: ‘लग्जरी’ शौक की पड़ताल
ईओयू की जांच केवल धर्मगंज की गलियों तक ही सीमित नहीं रही। शनिवार को एक दूसरी टीम जिला परिवहन कार्यालय (DTO) पहुँची, जहाँ गौतम कुमार और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर पंजीकृत वाहनों की सूची खंगाली जा रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर देखा जाता है कि अवैध कमाई का एक बड़ा हिस्सा महंगी और लग्जरी गाड़ियों की खरीद में खपाया जाता है। ईओयू यह जानकारी जुटा रही है कि पिछले कुछ वर्षों में गौतम कुमार के परिवार द्वारा कितनी गाड़ियां खरीदी गईं और उनके भुगतान का स्रोत क्या था।
वहीं, एक तीसरी टीम जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े पहलुओं पर भी बारीकी से जांच कर रही है। निबंधन कार्यालय से उन जमीनों का ब्यौरा निकाला जा रहा है जो गौतम कुमार, उनकी पत्नी या अन्य रक्त संबंधियों के नाम पर किशनगंज, पूर्णिया या बिहार के अन्य शहरों में खरीदी गई हैं। जांच टीम का मुख्य फोकस उन सौदों पर है जिनकी सरकारी कीमत (Circle Rate) और बाजार दर में बड़ा अंतर है, क्योंकि ऐसे सौदों में अक्सर ‘ब्लैक मनी’ का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
गौतम कुमार का ‘पतन’: 29 मार्च से 4 अप्रैल तक का घटनाक्रम (विशेष विश्लेषण)
द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, गौतम कुमार के खिलाफ यह कार्रवाई किसी सुनियोजित जाल से कम नहीं है। पिछले सात दिनों के भीतर उनका करियर अर्श से फर्श तक पहुँच गया है।
- 29 मार्च 2026: आर्थिक अपराध इकाई थाना कांड संख्या 3/26 के तहत गौतम कुमार के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया। यह प्राथमिक जांच (PE) के बाद मिली ठोस सबूतों का परिणाम था।
- 31 मार्च 2026: एएसपी के नेतृत्व में ईओयू की टीमों ने किशनगंज, पूर्णिया सहित कुल छह ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। किशनगंज के धर्मगंज चौक स्थित सरकारी आवास से कई आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद होने की बात सामने आई।
- 1 अप्रैल 2026: छापेमारी के 24 घंटे के भीतर सरकार ने बड़ा एक्शन लेते हुए गौतम कुमार को एसडीपीओ के पद से हटा दिया और उन्हें पुलिस मुख्यालय से संबद्ध (Attach) कर दिया गया। यह प्रशासनिक रूप से एक ‘सजा’ के तौर पर देखा गया।
- 4 अप्रैल 2026: ईओयू अब बेनामी कड़ियों (जैसे घरेलू सहायिका) और सरकारी विभागों (DTO) से डेटा जुटाकर चार्जशीट को अंतिम रूप देने में लगी है।
आय से अधिक संपत्ति: भ्रष्टाचार का ‘मकड़जाल’
भ्रष्टाचार के मामलों में ‘आय से अधिक संपत्ति’ का केस तब बनता है जब किसी अधिकारी की कुल चल-अचल संपत्ति उसकी ज्ञात वैध आय (वेतन और भत्तों) की तुलना में बहुत अधिक पाई जाती है। ईओयू को मिले शुरुआती इनपुट्स के अनुसार, गौतम कुमार की संपत्ति उनकी आय से कई गुना अधिक हो सकती है। जांच टीम अब अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटा रही है ताकि इस कुल संपत्ति का एक सटीक और वैज्ञानिक आकलन किया जा सके।
इस जांच में केवल भौतिक संपत्तियां ही नहीं, बल्कि बैंक लॉकर, म्यूचुअल फंड निवेश और बेनामी सावधि जमा (Fixed Deposits) की भी बारीकी से पड़ताल की जा रही है। शनिवार को सहायिका के घर पहुँचने का मकसद भी यही था कि यह पता लगाया जा सके कि क्या उसके नाम पर कोई गुप्त बैंक खाता तो संचालित नहीं किया जा रहा था।
पुलिस महकमे के इकबाल पर प्रहार
एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखें तो, एक अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) स्तर के अधिकारी पर ऐसे संगीन आरोप और ईओयू की बार-बार की छापेमारी बिहार पुलिस की छवि को धूमिल करती है। गौतम कुमार जैसे अधिकारी पर जब विभाग ही नकेल कसता है, तो यह संदेश जाता है कि भ्रष्टाचार के मामले में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जा रही है। हालांकि, यह भी सच है कि जब तक न्यायालय में दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक ये केवल आरोप और जांच की प्रक्रियाएं हैं। लेकिन जिस तरह से ईओयू एक-एक कर उनकी संपत्तियों की कड़ियों को जोड़ रहा है, उससे बच निकलना गौतम कुमार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
समाधान की दिशा में बढ़ती ईओयू
4 अप्रैल 2026 की यह जांच रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि किशनगंज के पूर्व एसडीपीओ के लिए आने वाले दिन और भी मुश्किलों भरे होंगे। धर्मगंज में बंद ताला और परिवहन कार्यालय की फाइलें अब गौतम कुमार के भविष्य का फैसला करेंगी। आर्थिक अपराध इकाई की टीम अब भी किशनगंज में जमी हुई है और संभावना जताई जा रही है कि अगले कुछ दिनों में कुछ और ‘बेनामी चेहरों’ पर गाज गिर सकती है।
द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरे हाई-प्रोफाइल भ्रष्टाचार मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि न्याय की इस प्रक्रिया में दूध का दूध और पानी का पानी होना जरूरी है ताकि जनता का भरोसा कानून व्यवस्था पर बना रहे। फिलहाल, किशनगंज से लेकर पटना तक, हर कोई ईओयू के अगले कदम का इंतजार कर रहा है।


