​होर्मुज की घेराबंदी: ट्रंप ने मोड़ा मुंह तो दुनिया के 60 देश आए एक साथ, महाविनाश के मुहाने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था

लंदन/वॉशिंगटन/पटना। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण नस यानी ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) पर जारी तनाव ने अब वैश्विक राजनीति को दो फाड़ कर दिया है। एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट से अपने हाथ खींचते हुए इसे एशियाई देशों की जिम्मेदारी बताया है, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा समेत दुनिया के 60 देशों ने मिलकर एक नया मोर्चा खोल दिया है। गुरुवार को डिजिटल माध्यम से हुई एक ऐतिहासिक ‘महा-बैठक’ में इन देशों ने संकल्प लिया है कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था को ईरान के हाथों बंधक नहीं बनने देंगे। 3 अप्रैल 2026 की यह हलचल संकेत दे रही है कि दुनिया अब अमेरिका के भरोसे रहने के बजाय अपने रास्ते खुद तलाशने लगी है।

ट्रंप का ‘अकेला चलो’ रुख: सहयोगियों पर बरसे अमेरिकी राष्ट्रपति

​अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट के बीच एक ऐसा रुख अपनाया है जिसने नाटो सहयोगियों और एशियाई देशों को सकते में डाल दिया है। व्हाइट हाउस में एक निजी कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि होर्मुज जलमार्ग को सुरक्षित करना और खोलना अब अमेरिका का प्राथमिक काम नहीं है। उन्होंने अपने यूरोपीय सहयोगियों की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वे युद्ध के समय साथ नहीं खड़े होते, तो अब अमेरिका उनकी ऊर्जा सुरक्षा की चिंता क्यों करे?

​ट्रंप का तर्क है कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश इस जलमार्ग का सबसे अधिक उपयोग करते हैं, इसलिए उन्हें ही इसे सुरक्षित करने के लिए आगे आना चाहिए। ट्रंप की इस ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने एक कूटनीतिक शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरने के लिए अब 60 देशों का यह नया गठबंधन सामने आया है। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अपनी सेना को दूसरों के व्यापारिक हितों के लिए जोखिम में नहीं डालेगा, भले ही इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) चरमरा जाए।

60 देशों की महा-बैठक: ब्रिटेन की अगुवाई में कूटनीतिक दबाव

​अमेरिका की बेरुखी के बीच ब्रिटेन ने नेतृत्व संभाला है। ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर की अध्यक्षता में हुई इस डिजिटल बैठक में उम्मीद से कहीं अधिक देशों ने हिस्सा लिया। शुरुआत में केवल 28 देशों के शामिल होने की संभावना थी, लेकिन देखते ही देखते यह संख्या 60 तक पहुंच गई। इसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा, जापान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख देश शामिल हैं।

​बैठक के बाद जारी साझा बयान में इन देशों ने ईरान से तुरंत प्रभाव से होर्मुज जलमार्ग पर लगाए गए अवरोधों को हटाने का अनुरोध किया है। इन देशों ने संकल्प लिया है कि वे जलमार्ग के माध्यम से सुरक्षित पारगमन सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कूटनीतिक और राजनीतिक उपायों का मूल्यांकन करेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टॉर्मर ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता फंसे हुए जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और महत्वपूर्ण वस्तुओं, जैसे तेल और गैस, के परिवहन को फिर से शुरू करना है।

मैक्रों की चेतावनी: सैन्य ऑपरेशन का मतलब ‘आत्मघाती कदम’

​फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस संकट के सैन्य समाधान को लेकर दुनिया को आगाह किया है। दक्षिण कोरिया की यात्रा पर गए मैक्रों ने कहा कि कुछ लोग बलपूर्वक होर्मुज को खोलने की वकालत कर रहे हैं, लेकिन यह पूरी तरह से ‘अव्यावहारिक’ है। मैक्रों का मानना है कि अगर सैन्य अभियान शुरू किया गया, तो इसमें बहुत अधिक समय लगेगा और इस दौरान समुद्री मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के खतरनाक हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों का सामना करना पड़ेगा।

​मैक्रों का यह बयान सीधे तौर पर उन रणनीतिकारों पर हमला है जो इसे केवल एक सैन्य समस्या मान रहे हैं। फ्रांस का मानना है कि ईरान ने इस जलमार्ग को ‘हाईजैक’ कर लिया है और वह पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनी शर्तों पर झुकाना चाहता है। ऐसे में कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है, वरना एक छोटी सी सैन्य चूक पूरी दुनिया को महायुद्ध में धकेल सकती है।

एशियाई देशों की बेचैनी: चीन और दक्षिण कोरिया का रुख

​होर्मुज संकट का सबसे गहरा असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया ने घोषणा की है कि वह देश के भीतर गहराते ऊर्जा संकट से निपटने के लिए एक ‘बड़े बजट’ की योजना बना रहा है। दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्रालय के अनुसार, वे वाशिंगटन के साथ संपर्क में तो हैं, लेकिन ईरान के नियंत्रण ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी है।

​वहीं, चीन ने इस मामले में बेहद संतुलित और नपी-तुली प्रतिक्रिया दी है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि चीन सभी संबंधित पक्षों से बातचीत कर रहा है। चीन का मानना है कि होर्मुज में स्थिरता बहाल करना पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आम इच्छा है। चीन ने युद्धविराम की वकालत की है, लेकिन वह किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से बच रहा है। चीन के लिए यह संकट दोधारी तलवार जैसा है—एक तरफ उसे अपने तेल आयात की चिंता है, तो दूसरी तरफ वह अमेरिका या यूरोपीय गठबंधन के साथ पूरी तरह खड़ा होकर ईरान को नाराज नहीं करना चाहता।

बिहार और भारत पर क्या होगा असर? (विशेष विश्लेषण)

​अब सवाल उठता है कि होर्मुज की यह हलचल बिहार के आम आदमी के जीवन को कैसे प्रभावित करेगी? द वॉयस ऑफ बिहार की पड़ताल के अनुसार इसके तीन मुख्य प्रभाव होंगे:

  1. तेल और महंगाई: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते आने वाले तेल से पूरा करता है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा, तो बिहार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 150 रुपये के पार जा सकती हैं। माल ढुलाई महंगी होने से राशन और सब्जियों के दाम आसमान छूने लगेंगे।
  2. प्रवासी मजदूरों का भविष्य: खाड़ी देशों में काम करने वाले बिहार के लाखों प्रवासी मजदूर अब सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। अगर 60 देशों का यह गठबंधन और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है, तो इन मजदूरों की वापसी और उनकी कमाई (Remittance) पर बुरा असर पड़ेगा।
  3. रोजगार पर चोट: वैश्विक मंदी की आहट से बिहार में आने वाले निवेश और नई नौकरियों की संभावनाओं पर ब्रेक लग सकता है।

गठबंधन बनाम ईरान: कूटनीति की असली परीक्षा

​60 देशों ने हाथ तो मिला लिए हैं, लेकिन असली चुनौती जमीन पर है। यवेट कूपर ने ठीक ही कहा है कि ईरान वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने में सफल रहा है। ईरान के पास इस संकरे जलमार्ग में ऐसी रणनीतिक बढ़त है जिसे केवल कागजी बयानों से कम नहीं किया जा सकता।

​सैन्य शक्ति के मामले में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इस क्षेत्र को बारूदी सुरंगों और मिसाइल ठिकानों से पाट रखा है। अगर यह 60 देशों का गठबंधन केवल ‘अनुरोध’ तक सीमित रहता है, तो ईरान पर इसका कोई असर नहीं होगा। और अगर वे सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ते हैं, तो मैक्रों की भविष्यवाणी सच साबित हो सकती है कि यह प्रक्रिया अंतहीन और विनाशकारी होगी।

क्या अमेरिका की गैरमौजूदगी नया संकट है?

​ट्रंप का पीछे हटना एक बड़े बदलाव का संकेत है। पिछले 70 सालों से अमेरिका वैश्विक जलमार्गों का ‘पुलिसमैन’ बना हुआ था। अब जब उसने यह जिम्मेदारी छोड़ने का फैसला किया है, तो दुनिया में शक्ति संतुलन बिगड़ गया है। क्या ये 60 देश मिलकर अमेरिका जैसी सैन्य क्षमता और कूटनीतिक दबाव बना पाएंगे?

​यूरोपीय देशों का यह नया गठबंधन अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है। इसमें जापान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों का शामिल होना सकारात्मक तो है, लेकिन चीन और रूस जैसे बड़े खिलाड़ियों की सक्रिय भागीदारी के बिना यह दबाव अधूरा है। ट्रंप ने एक तरह से पूरी दुनिया को अपने हाल पर छोड़ दिया है, जो एक नए विश्व क्रम (New World Order) की शुरुआत भी हो सकती है।

समाधान की तलाश में भटकती मानवता

​होर्मुज का संकट अब केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि मानवीय और अस्तित्वगत संकट बन गया है। ट्रंप की ‘पाषाण युग’ वाली धमकी (जैसा कि उन्होंने पहले कहा था) और 60 देशों का यह कूटनीतिक मोर्चा, दोनों ही इस बात की तस्दीक करते हैं कि हम एक बड़े टकराव की ओर बढ़ रहे हैं। 3 अप्रैल 2026 की यह ‘महा बैठक’ दुनिया को बचाने की एक कोशिश तो है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान इन 60 देशों की आवाज को कितनी गंभीरता से लेता है।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर अपनी नजर बनाए हुए है। भागलपुर से लेकर लंदन तक, हर खबर के तार एक-दूसरे से जुड़े हैं। यह समय एकजुटता का है, क्योंकि होर्मुज की आग अगर भड़की, तो उसकी तपिश पूरी दुनिया के हर घर तक पहुंचेगी।

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