
- राजधानी के अगमकुआं थाना क्षेत्र में जाली नोटों की बरामदगी के मामले में अब आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने मोर्चा संभाल लिया है और तस्करों के अंतरराष्ट्रीय लिंक की तलाश शुरू कर दी है।
- पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यदि बरामद नोटों की गुणवत्ता ‘उच्च श्रेणी’ (HQ-FICN) की पाई जाती है, तो आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी।
- मामले की गंभीरता और आतंकी वित्तपोषण (Terror Funding) की आशंका को देखते हुए जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को भी सौंपा जा सकता है, क्योंकि जाली नोटों का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने की साजिश से है।
- गिरफ्तार चार तस्करों में राणा लव और राणा कुश जैसे उच्च शिक्षित युवक शामिल हैं, जिनमें से एक इटली और दुबई में रहकर पढ़ाई कर चुका है, जो इस पूरे सिंडिकेट के पीछे की गहरी योजना की ओर इशारा करता है।
- आरोपियों के मोबाइल फोन से नोटों की छपाई और लैब के कई संदिग्ध वीडियो मिले हैं, जिसकी कड़ियाँ उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और पड़ोसी राज्यों से जुड़ रही हैं।
पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।
अगमकुआं की छोटी बरामदगी के पीछे छिपी बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती
बिहार की राजधानी पटना के अगमकुआं इलाके में हाल ही में हुई नकली नोटों की बरामदगी अब केवल एक स्थानीय पुलिसिया कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। इस मामले ने एक बड़े अंतरराज्यीय और संभवतः अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट की ओर इशारा किया है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोखला करने की फिराक में है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने इस मामले की गहन तफ्तीश शुरू कर दी है। पुलिस को संदेह है कि बाजार में खपाने के लिए लाए गए ये नोट साधारण प्रिंटर से छपे हुए नहीं हैं, बल्कि इनके निर्माण में उन उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल हुआ है जो केवल बड़े संगठित गिरोहों या सीमा पार की संदिग्ध ताकतों के पास उपलब्ध होती हैं। ईओयू की टीम अब इन नोटों के ‘फाइबर’, ‘वॉटरमार्क’ और ‘सिक्योरिटी थ्रेड’ की सूक्ष्म जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ये फेक इंडियन करेंसी नोट (FICN) उच्च गुणवत्ता की श्रेणी में आते हैं।
यूएपीए और एनआईए: जब जाली नोट बन जाते हैं ‘आतंकी हथियार’
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जाली नोटों का कारोबार अब केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं रहा, बल्कि इसे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश के रूप में देखा जा रहा है। यदि लैब रिपोर्ट में यह साबित होता है कि बरामद नोट ‘उच्च गुणवत्ता’ के हैं और उन्हें पहचानना आम जनता के लिए नामुमकिन है, तो गिरफ्तार चारों आरोपियों—राणा लव, राणा कुश, अश्मित कुमार और आशुतोष कुमार—पर यूएपीए (UAPA) की सख्त धाराएं लगाई जाएंगी। यूएपीए लगने का सीधा अर्थ है कि इस मामले को आतंकवादी गतिविधियों से जोड़कर देखा जाएगा। ऐसी स्थिति में, जांच का दायरा स्वतः ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अधिकार क्षेत्र में चला जाएगा। एनआईए यह पता लगाएगी कि क्या इन जाली नोटों का इस्तेमाल देश के भीतर अशांति फैलाने या किसी खास मिशन की फंडिंग के लिए किया जाना था।
तस्करों का प्रोफाइल: इटली और दुबई रिटर्न ‘मास्टरमाइंड’ की कहानी
इस गिरोह की सबसे चौंकाने वाली कड़ी राणा लव और राणा कुश नामक दो सगे भाई हैं। पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि राणा लव कोई साधारण अपराधी नहीं है, बल्कि वह काफी पढ़ा-लिखा और दुनिया देख चुका युवक है। उसने इटली और दुबई जैसे देशों में रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त की है। एक विदेशी डिग्री धारक युवक का जाली नोटों के काले धंधे में शामिल होना पुलिस के लिए भी शोध का विषय बना हुआ है। जांच टीम यह पता लगा रही है कि क्या विदेश प्रवास के दौरान ही वह किसी ऐसे गिरोह के संपर्क में आया था जो भारत में जाली नोटों की खेप भेजने का काम करता है। राणा लव की हनक और उसकी बातचीत के लहजे से पुलिस को अंदेशा है कि वह इस गिरोह का वैचारिक और तकनीकी संचालक (Technological Operator) हो सकता है।
आजमगढ़ से पटना का ‘कॉरिडोर’ और दो सफल खेप का रहस्य
पूछताछ में तस्करों ने यह स्वीकार किया है कि वे उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और उसके आसपास के इलाकों से जाली नोटों की खेप लाकर पटना में खपाते थे। आजमगढ़ पहले भी जाली नोटों और संदिग्ध गतिविधियों के लिए चर्चा में रहा है, ऐसे में पटना पुलिस ने उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ समन्वय स्थापित किया है। आरोपियों ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि वे इस गिरफ्तारी से पहले दो बार सफलतापूर्वक नकली नोटों की बड़ी खेप पटना लाकर बाजार में खपा चुके हैं। इसका मतलब यह है कि पटना के कई बाजारों, छोटे व्यापारियों और आम लोगों के हाथों में पहले से ही करीब चार से पांच लाख रुपये के जाली नोट पहुंच चुके हैं। पुलिस अब उन ठिकानों की पहचान कर रही है जहां इन नोटों को सबसे पहले दिया गया था।
डिजिटल साक्ष्य: मोबाइल में कैद है ‘नोटों की लैब’ का सच
अगमकुआं पुलिस ने जब तस्करों के मोबाइल फोन जब्त किए और उनकी फॉरेंसिक जांच की, तो उनके होश उड़ गए। गैलरी में नोटों की छपाई के कई ऐसे वीडियो मिले हैं जो किसी प्रोफेशनल सेटअप में बनाए गए प्रतीत होते हैं। वीडियो में आधुनिक मशीनों, विशेष प्रकार के कागज और रंगों का उपयोग होते हुए दिखाया गया है। इन वीडियो के जरिए पुलिस यह समझने की कोशिश कर रही है कि क्या नोटों की छपाई उत्तर प्रदेश के किसी गुप्त ठिकाने पर हो रही है या फिर इनका कारखाना बिहार के ही किसी सुदूर इलाके में स्थापित है। मोबाइल रिकॉर्ड्स से कई ऐसे व्हाट्सएप चैट्स और वॉयस नोट्स भी मिले हैं जिनमें ‘माल’ की डिलीवरी और कमीशन के बंटवारे को लेकर कोडवर्ड्स में बातें की गई हैं।
रिमांड पर पूछताछ: मास्टरमाइंड तक पहुंचने की अंतिम कोशिश
पटना पुलिस बहुत जल्द चारों आरोपियों को रिमांड पर लेने के लिए अदालत में अर्जी दाखिल करने वाली है। पुलिस का मानना है कि जेल की सलाखों के पीछे अभी कई राज दफन हैं। रिमांड के दौरान पुलिस इन तस्करों को उन रास्तों और ठिकानों पर ले जाएगी जहां वे यूपी से आकर रुकते थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस गिरोह का असली ‘आका’ कौन है? क्या राणा लव और उसके साथी केवल ‘कूरियर’ के रूप में काम कर रहे थे या वे खुद इस नेटवर्क के मालिक हैं? पुलिस को अंदेशा है कि इस खेल में कुछ सफेदपोश लोग और स्थानीय एजेंट भी शामिल हो सकते हैं जो जाली नोटों को असली नोटों के साथ बदलकर बाजार में चलाने में मदद करते थे।
अर्थव्यवस्था पर प्रहार और आम जनता के लिए चेतावनी
आर्थिक अपराध इकाई के विशेषज्ञों का कहना है कि जाली नोटों का प्रसार मुद्रास्फीति को बढ़ावा देता है और मुद्रा की क्रय शक्ति को कम करता है। जब बाजार में जाली नोटों की संख्या बढ़ती है, तो आम आदमी का बैंकिंग प्रणाली से भरोसा उठने लगता है। अगमकुआं की इस घटना ने पटना के व्यवसायियों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है। पुलिस ने व्यापारियों से अपील की है कि वे बड़े लेनदेन के समय नोटों की सावधानीपूर्वक जांच करें और किसी भी संदिग्ध स्थिति में तुरंत नजदीकी थाने को सूचित करें। बैंक अधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे एटीएम और नकदी जमा मशीनों (CDM) की निगरानी बढ़ा दें ताकि जाली नोटों को बैंकिंग चैनल में घुसने से रोका जा सके।
निष्कर्ष: सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिष्ठा का प्रश्न
अगमकुआं नकली नोट कांड अब बिहार पुलिस और ईओयू के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। एक तरफ जहां इटली-दुबई रिटर्न आरोपी कानून को चुनौती दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियां यूएपीए जैसे ब्रह्मास्त्र के जरिए इस नेटवर्क को जड़ से मिटाने की तैयारी में हैं। यूपी और बिहार पुलिस का साझा अभियान ही इस ‘नकली साम्राज्य’ को ध्वस्त कर पाएगा। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के तार और किन-किन शहरों या देशों से जुड़ते हैं। द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस मामले की हर छोटी-बड़ी अपडेट पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है ताकि देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों का असली चेहरा सामने आ सके।


