
समाचार के मुख्य बिंदु: तेजाब पीड़ितों के लिए न्याय और पुनर्वास की नई किरण
- मुख्य संबोधन: पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संगम कुमार साहू ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के कार्यक्रम में तेजाब पीड़ितों के अधिकारों और न्यायिक सेवाओं पर विस्तृत चर्चा की.
- सख्त चेतावनी: यदि कोई भी सरकारी या निजी अस्पताल तेजाब पीड़ित का इलाज करने से इनकार करता है, तो उसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 200 के तहत 1 साल का कारावास और आर्थिक दंड भुगतना होगा.
- मुआवजे का खाका: पीड़ितों को आवेदन के साथ ही 5-10 हजार रुपये, 15 दिनों के भीतर 1 लाख रुपये और अगले 2 महीने में शेष 2 लाख रुपये (कुल 3 लाख) देने का प्रावधान है.
- अतिरिक्त सहायता: पीएम राहत कोष से 1 लाख रुपये और आयुष्मान योजना के तहत इलाज के साथ प्लास्टिक सर्जरी के लिए अलग से 50 हजार रुपये की सहायता मिलेगी.
- सामाजिक सुरक्षा: पीड़ितों को सरकारी नौकरियों में विकलांगों के समान आरक्षण और मुफ्त कानूनी सहायता (NALSA स्कीम 2016) मुहैया कराई जाएगी.
- VOB इनसाइट: यह कार्यक्रम केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस ‘हॉरर’ (डर) के खिलाफ एक न्यायिक युद्ध है जिसे समाज ‘एसिड अटैक’ कहता है। मुख्य न्यायाधीश का यह कहना कि “किसी मामले में अस्वीकृति हिंसा का कारण नहीं हो सकती”, सीधे तौर पर उस जहरीली मानसिकता पर चोट है जो ‘अस्वीकृत प्रेम’ या ‘प्रतिशोध’ के नाम पर किसी का जीवन बर्बाद कर देती है। बिना पहचान पत्र के तेजाब की बिक्री पर रोक और अस्पतालों की जवाबदेही तय करना सुशासन की दिशा में सबसे कड़ा और जरूरी कदम है।
पटना | 29 मार्च, 2026
न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी जरूर बंधी है, लेकिन उसका हृदय पीड़ितों की पीड़ा के प्रति कितना संवेदनशील है, इसकी बानगी रविवार को पटना में देखने को मिली। बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा आयोजित एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संगम कुमार साहू ने तेजाब पीड़ितों के हक में न केवल भावनात्मक अपील की, बल्कि कानून के उन ‘हथौड़ों’ की भी जानकारी दी जो दोषियों और लापरवाह संस्थानों को कुचलने के लिए तैयार हैं।
कविता के जरिए रूह की आवाज: “आत्मसम्मान मेरा अब भी बाकी है”
मुख्य न्यायाधीश श्री साहू ने अपने संबोधन की शुरुआत बेहद मार्मिक कविता से की, जिसने हॉल में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। उन्होंने कहा:
“शरीर झुलसा है, रूह में जान अभी बाकी है, हिम्मत से लड़ूंगी जिंदगी की लड़ाई, आत्मसम्मान मेरा अब भी बाकी है।”
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एसिड अटैक मानवता पर किया गया एक जघन्य अपराध है। इसे समाप्त करने के लिए केवल कानून काफी नहीं, बल्कि समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। अस्वीकृत प्रेम, घरेलू हिंसा, दहेज और संपत्ति विवाद जैसे कारण इस अपराध की जड़ में हैं, जिन्हें सामाजिक जागरूकता से ही उखाड़ा जा सकता है.
अस्पतालों की मनमानी पर ‘कानूनी बेड़ियां’
जस्टिस साहू ने स्वास्थ्य संस्थानों को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए कहा कि कोई भी अस्पताल (सरकारी या निजी) बिना किसी औपचारिक देरी के पीड़ित का मुफ्त इलाज शुरू करने के लिए बाध्य है। उन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 200 का जिक्र करते हुए बताया कि इलाज से इनकार करने वाले डॉक्टरों या अस्पताल प्रबंधन को एक वर्ष का कारावास और जुर्माना दोनों हो सकता है.
न्याय व्यवस्था अब पीड़ितों के दरवाजे तक पहुँचेगी। नालसा (NALSA) स्कीम 2016 के तहत पीड़ितों को मुफ्त वकील, कानूनी सलाह और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि उन्हें अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें.
आर्थिक सुरक्षा चक्र: मुआवजे और सहायता की समय-सीमा
पीड़ितों के पुनर्वास के लिए जस्टिस साहू ने मुआवजे की राशि और उसके भुगतान की निश्चित अवधि के बारे में जानकारी साझा की, जो इस प्रकार है:
सहायता का प्रकार | राशि (रुपये में) | समय-सीमा / विवरण |
|---|---|---|
प्रारंभिक सहायता | 5,000 – 10,000 | आवेदन मिलने के साथ ही |
प्रथम किस्त | 1,00,000 (1 लाख) | घटना के 15 दिनों के अंदर |
अंतिम किस्त | 2,00,000 (2 लाख) | अधिकतम दो महीने के भीतर |
पीएम राहत कोष | 1,00,000 (1 लाख) | पुनर्वास के लिए अतिरिक्त सहायता |
प्लास्टिक सर्जरी | 50,000 | आयुष्मान कार्ड योजना के अंतर्गत |
संयुक्त मुआवजा | – | यदि पीड़ित यौन उत्पीड़न का भी शिकार है |
नौकरी और पहचान: सम्मान से जीने का अधिकार
मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि तेजाब पीड़ितों को केवल आर्थिक मदद की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान के साथ स्वीकार करना आवश्यक है। उन्हें सरकारी नौकरियों में विकलांगों के समान आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें. इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बाजार में तेजाब की बिक्री बिना पहचान-पत्र के कतई नहीं होनी चाहिए और इस पर जिला प्रशासन को सख्त निगरानी रखनी होगी।
कार्यक्रम को जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस मोहित कुमार शाह ने भी संबोधित किया, जहाँ उन्होंने विधिक सेवा प्राधिकार की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाने पर चर्चा की.
VOB का नजरिया: न्याय की राह में जागरूकता ही ‘एंटीडोट’ है
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि चीफ जस्टिस का यह संबोधन उन पीड़ितों के लिए ‘मरहम’ का काम करेगा जो अब तक अंधेरे में थे।
- धारा 200 का प्रचार: अधिकांश पीड़ितों और उनके परिजनों को यह पता ही नहीं होता कि इलाज से इनकार करना अपराध है। इस जानकारी को हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) के बाहर बोर्ड पर लिखा जाना चाहिए।
- तेजाब की उपलब्धता: जब तक बाजार में तेजाब सरेआम बिकता रहेगा, ऐसे अपराधों पर लगाम लगाना मुश्किल है। पुलिस को ‘बिना आईडी’ तेजाब बेचने वाले दुकानदारों पर ‘मर्डर’ के प्रयास जैसी धाराएं लगानी चाहिए।
- मानसिक स्वास्थ्य: आर्थिक मदद के साथ-साथ पीड़ितों के लिए ‘मनोवैज्ञानिक परामर्श’ (Counselling) को अनिवार्य करना चाहिए ताकि वे उस ट्रॉमा से बाहर निकल सकें।
निष्कर्ष: सुशासन और न्याय का ‘कवच’
जस्टिस संगम कुमार साहू के नेतृत्व में पटना हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि बिहार में अब अपराधियों और उदासीन अधिकारियों के लिए कोई जगह नहीं है। तेजाब पीड़ितों को समाज की मुख्यधारा में लाने का यह प्रयास सराहनीय है।


