पूसा कृषि विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक ‘कीर्तिमान’! पूर्वी भारत में पहली बार IVF तकनीक से पैदा हुई ‘साहीवाल’ बाछी; समस्तीपुर ने पशुपालन में गाड़ा झंडा

समाचार के मुख्य बिंदु: बिहार के वैज्ञानिकों ने रचा नया स्वर्णिम इतिहास

  • बड़ी उपलब्धि: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा के वैज्ञानिकों ने इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक के जरिए साहीवाल नस्ल की बाछी को जन्म दिलाने में सफलता पाई है।
  • क्षेत्रीय गौरव: इस उपलब्धि के साथ ही पूसा विश्वविद्यालय ‘साहीवाल’ नस्ल की बाछी को आईवीएफ तकनीक से पैदा करने वाला पूर्वी भारत का पहला संस्थान बन गया है।
  • नस्ल सुधार: साहीवाल नस्ल अपनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता और रोग प्रतिरोधक शक्ति के लिए जानी जाती है। आईवीएफ तकनीक से इसके प्रसार में तेजी आएगी।
  • वैज्ञानिक टीम: विश्वविद्यालय के पशुपालन और प्रजनन विशेषज्ञों की टीम ने महीनों की मेहनत के बाद इस ‘प्रोजेक्ट’ को सफल बनाया है।
  • VOB इनसाइट: यह केवल एक बछड़े का जन्म नहीं, बल्कि बिहार के डेयरी सेक्टर के लिए ‘क्रांति’ की शुरुआत है। अब राज्य के किसानों को उन्नत नस्ल के मवेशियों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर नहीं रहना होगा।

पूसा (समस्तीपुर) | 28 मार्च, 2026

​बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने पशु विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसी छलांग लगाई है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला और विशेषज्ञों की टीम ने ‘टेस्ट ट्यूब’ तकनीक (IVF) का सफल प्रयोग करते हुए साहीवाल नस्ल की एक स्वस्थ बाछी को जन्म दिलाया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी भारत में यह अपनी तरह का पहला सफल प्रयोग है, जो आने वाले समय में बिहार को ‘मिल्क हब’ बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।

IVF तकनीक: प्रयोगशाला से गोशाला तक का सफर

​इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक का उपयोग आमतौर पर मनुष्यों में संतान प्राप्ति के लिए सुना जाता रहा है, लेकिन पशुपालन में इसका उपयोग उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों को तेजी से बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

कैसे मिली सफलता?

  1. ओवम पिक-अप (OPU): वैज्ञानिकों ने एक उच्च गुणवत्ता वाली साहीवाल गाय से अंडे (Oocytes) प्राप्त किए।
  2. लैब फर्टिलाइजेशन: इन अंडों को प्रयोगशाला में उन्नत साहीवाल सांड के वीर्य के साथ निषेचित (Fertilize) किया गया।
  3. भ्रूण प्रत्यारोपण (ET): तैयार भ्रूण को एक ‘सरोगेट’ (किराये की मां) गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया गया, जिसने 9 महीने बाद इस ऐतिहासिक बाछी को जन्म दिया।

साहीवाल नस्ल ही क्यों?

​भारत की स्वदेशी नस्लों में साहीवाल का स्थान सबसे ऊपर है। यह नस्ल बिहार की जलवायु के अनुकूल है और कम चारे में अधिक दूध देने के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

विशेषता

विवरण

संस्थान

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

नस्ल

साहीवाल (Sahiwal)

तकनीक

इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF)

रिकॉर्ड

पूर्वी भारत का पहला सफल संस्थान

महत्व

स्वदेशी नस्ल का संरक्षण और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि

किसानों के लिए क्या है इसके मायने?

​अभी तक बिहार के किसानों को अच्छी नस्ल की गायों के लिए पंजाब या हरियाणा की ओर देखना पड़ता था। पूसा के वैज्ञानिकों की इस सफलता के बाद अब कम समय में हजारों की संख्या में उन्नत साहीवाल गायें तैयार की जा सकेंगी।

  • तेजी से विकास: एक सामान्य गाय अपने जीवनकाल में केवल 8-10 बछड़ों को जन्म दे सकती है, लेकिन आईवीएफ तकनीक के जरिए एक उच्च गुणवत्ता वाली गाय से साल भर में दर्जनों भ्रूण तैयार किए जा सकते हैं।
  • आर्थिक समृद्धि: बाछी के जन्म से भविष्य में दूध उत्पादन बढ़ेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

VOB का नजरिया: विज्ञान के साथ बदलता बिहार

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि पूसा विश्वविद्यालय की यह उपलब्धि बिहार के ‘कृषि रोडमैप’ की सफलता का प्रमाण है।

  1. टेक्नोलॉजी का लोकतंत्रीकरण: अब चुनौती इस तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर आम पशुपालकों के दरवाजे तक पहुँचाने की है।
  2. स्टार्टअप को बढ़ावा: इस सफलता से बिहार में ‘एग्री-टेक’ और ‘एनिमल ब्रीडिंग’ स्टार्टअप्स के लिए नए रास्ते खुलेंगे।
  3. ब्रांडिंग: बिहार अब केवल श्रम शक्ति के लिए नहीं, बल्कि ‘साइंटिफिक एक्सीलेंस’ के लिए भी जाना जाएगा।

पशुपालन के नए युग का सूत्रपात

​कुलपति और वैज्ञानिकों की इस टीम ने बिहार को गर्व करने का एक बड़ा अवसर दिया है। यह साहीवाल बाछी केवल एक पशु नहीं, बल्कि बिहार के आत्मनिर्भर होने का प्रतीक है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) इस तकनीक के व्यावसायिक उपयोग और किसानों को मिलने वाली ट्रेनिंग की हर ताज़ा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।

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