
समाचार के मुख्य बिंदु: मृदा विज्ञान में तकनीकी क्रांति की ओर BAU सबौर का कदम
- बड़ा आयोजन: बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा आईसीएआर (ICAR) प्रायोजित 21 दिवसीय ‘विंटर स्कूल’ का भव्य समापन।
- अत्याधुनिक विषय: “उन्नत मृदा एवं जल संसाधन मानचित्रण हेतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एवं भू-स्थानिक उपकरणों का एकीकरण”।
- प्रशिक्षण की अवधि: 7 मार्च से 27 मार्च, 2026 तक देश भर के वैज्ञानिकों और शिक्षकों ने लिया हिस्सा।
- ड्रोन और डेटा: प्रतिभागियों को ड्रोन आधारित प्रिसीजन एग्रीकल्चर मैपिंग और डिजिटल सॉयल मैपिंग की आधुनिक बारीकियां सिखाई गईं।
- प्रयोगशाला भ्रमण: एनएबीएल मान्यता प्राप्त लैब, एक्स-रे डिफ्रैक्शन (XRD) और आईसीपी-एमएस (ICP-MS) जैसी विश्वस्तरीय इकाइयों का प्रदर्शन।
- VOB इनसाइट: भविष्य की खेती अब ‘डेटा’ पर आधारित होगी; सबौर में हुआ यह प्रशिक्षण बिहार और देश के कृषि वैज्ञानिकों को ‘स्मार्ट एग्रीकल्चर’ के लिए तैयार करने की दिशा में मील का पत्थर है।
सबौर (भागलपुर) | 27 मार्च, 2026
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर एक बार फिर देश के कृषि अनुसंधान मानचित्र पर चमक उठा है। मृदा विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विंटर स्कूल का आज सफलतापूर्वक समापन हो गया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, इस कार्यक्रम ने पारंपरिक मृदा विज्ञान को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रिमोट सेंसिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से जोड़कर वैज्ञानिकों को भविष्य की चुनौतियों के लिए सुसज्जित किया है।
AI और जीआईएस: मिट्टी की सेहत का डिजिटल एक्सरे
7 मार्च से शुरू हुए इस विंटर स्कूल का मुख्य केंद्र ‘डिजिटल सॉयल मैपिंग’ था। प्रतिभागियों को सिखाया गया कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जीआईएस (GIS) के माध्यम से मिट्टी और जल संसाधनों का सटीक मानचित्र तैयार किया जा सकता है।
प्रशिक्षण के प्रमुख तकनीकी पहलू:
- रिमोट सेंसिंग: उपग्रहों से प्राप्त डेटा के जरिए जमीन की उर्वरता का आकलन।
- ड्रोन तकनीक: प्रिसीजन एग्रीकल्चर मैपिंग के लिए ड्रोन का उपयोग, जिससे उर्वरकों और पानी की बर्बादी को रोका जा सके।
- डेटा-आधारित वर्गीकरण: मृदा वर्गीकरण के लिए उन्नत सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम का प्रयोग।
विश्वस्तरीय प्रयोगशालाओं और नवाचारों का अनुभव
प्रशिक्षण केवल व्याख्यानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रतिभागियों को सबौर स्थित विश्वविद्यालय की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का व्यावहारिक अनुभव (Hands-on training) भी प्रदान किया गया।
- अत्याधुनिक इकाइयां: वैज्ञानिकों ने एनएबीएल (NABL) मान्यता प्राप्त कीटनाशक अवशेष विश्लेषण लैब, एक्स-रे डिफ्रैक्शन (XRD) और इंडक्टिवली कपल्ड प्लाज्मा मास स्पेक्ट्रोमेट्री (ICP-MS) जैसी उन्नत मशीनों के संचालन को समझा।
- जैविक और वाणिज्यिक इकाइयां: एजोला उत्पादन, वर्मी कम्पोस्टिंग और वाणिज्यिक जैव उर्वरक इकाइयों का भ्रमण कराया गया, ताकि वैज्ञानिक ‘लैब टू लैंड’ (Lab to Land) के सिद्धांत को प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।
समापन सत्र: विशेषज्ञों ने थपथपाई पीठ
आज आयोजित समापन (Valedictory) सत्र में वैज्ञानिकों ने इस प्रशिक्षण को ‘परिवर्तनकारी’ बताया। समापन सत्र की अध्यक्षता अनुसंधान निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में विख्यात मृदा वैज्ञानिक डॉ. जगदीश प्रसाद उपस्थित रहे।
प्रमुख संदेश:
- कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह: माननीय कुलपति ने अपने संदेश में कहा कि भविष्य की कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीक का समावेश अनिवार्य है। उन्होंने आयोजकों को इस समसामयिक विषय पर सफल आयोजन के लिए बधाई दी।
- कोर्स निदेशक डॉ. अंशुमान कोहली: डॉ. कोहली के कुशल नेतृत्व में इस 21 दिवसीय कार्यक्रम का सफल क्रियान्वयन हुआ। उनके साथ सह-कोर्स निदेशकों—डॉ. भवानी प्रसाद मंडल, डॉ. इंगल सागर नंदुलाल, डॉ. चंद्रभान पटेल एवं डॉ. अमित कुमार प्रधान के समर्पण की भी सराहना की गई।
VOB का नजरिया: बिहार की कृषि में सबौर की बढ़ती भूमिका
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि सबौर विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि तकनीकी नवाचार का पावरहाउस बन रहा है।
- वैज्ञानिकों का सशक्तिकरण: देश के विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों का यहाँ प्रशिक्षण लेना यह दर्शाता है कि सबौर की शैक्षणिक साख राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही है।
- स्मार्ट फार्मिंग: AI और ड्रोन जैसे उपकरणों का ज्ञान जब खेतों तक पहुँचेगा, तो इससे किसानों की लागत कम होगी और पैदावार बढ़ेगी।
- संसाधन प्रबंधन: जल और मृदा संसाधनों की मैपिंग से जलवायु परिवर्तन के खतरों के बीच भी कृषि को टिकाऊ (Sustainable) बनाया जा सकेगा।
सुशासन और वैज्ञानिक प्रगति का संगम
बीएयू सबौर का यह विंटर स्कूल एक प्रभावशाली शैक्षणिक पहल के रूप में संपन्न हुआ। इसने न केवल प्रतिभागियों को आधुनिक मृदा विज्ञान की तकनीकी बारीकियों से अवगत कराया, बल्कि भागलपुर के नाम को कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में और ऊंचा किया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ विश्वविद्यालय के अगले बड़े शोध और किसानों के लिए जारी होने वाली नई गाइडलाइन्स की हर ताज़ा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।


