जदयू में ‘बगावत’ की बड़ी कार्रवाई! बांका सांसद गिरिधारी यादव की सदस्यता खत्म करने की तैयारी; बेटे के लिए ‘लालटेन’ थामने का आरोप, ओम बिरला तक पहुँचा मामला

समाचार के मुख्य बिंदु: बांका की राजनीति में भूचाल, अपनों ने ही घेरा

  • बड़ी कार्रवाई: जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने अपने ही बांका सांसद गिरिधारी यादव के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को उनकी सदस्यता रद्द करने का आवेदन दिया।
  • आरोप का आधार: बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ‘दल विरोधी’ गतिविधियों में शामिल होने का गंभीर आरोप; पार्टी लाइन से अलग जाकर विपक्षी दल के लिए काम करने की शिकायत।
  • पारिवारिक पेंच: सांसद के पुत्र चाणक्य प्रकाश ने बेलहर विधानसभा से राजद (RJD) के टिकट पर चुनाव लड़ा, जिसमें सांसद पर बेटे के पक्ष में प्रचार करने का आरोप है।
  • संसदीय दल का रुख: जदयू संसदीय दल के नेता दिलेश्वर कामैत ने कहा— पार्टी के पास सांसद के खिलाफ पुख्ता वीडियो और दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।
  • सांसद का बचाव: गिरिधारी यादव ने आरोपों को नकारा; कहा— बेटा बालिग है और अपना फैसला लेने को स्वतंत्र, मेरा दल विरोधी गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं।
  • VOB इनसाइट: 2024 में एक लाख से अधिक मतों से जीत दर्ज करने वाले ‘दिग्गज’ नेता पर अपनों का यह प्रहार जदयू के भीतर अनुशासन के नए मानक तय करने की कोशिश है।

पटना | 26 मार्च, 2026

​बिहार की सियासत में ‘बेटा प्रेम’ अक्सर बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए गले की फांस बनता रहा है। ताजा मामला बांका के कद्दावर सांसद गिरिधारी यादव का है, जिनकी लोकसभा सदस्यता पर अब खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, जदयू ने अनुशासन का डंडा चलाते हुए सीधे लोकसभा अध्यक्ष के पास सांसद की बर्खास्तगी की अर्जी लगा दी है। यह कदम न केवल बांका बल्कि पूरे बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि गिरिधारी यादव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भरोसेमंद और वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते रहे हैं।

बेलहर की चुनावी जंग और ‘पिता’ का धर्म: क्या है असली विवाद?

​विवाद की जड़ें हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ी हैं। जदयू का आरोप है कि जब पार्टी चुनाव मैदान में एनडीए गठबंधन के तहत लड़ रही थी, तब सांसद गिरिधारी यादव पर्दे के पीछे और खुलेआम विपक्षी गठबंधन (राजद) की मदद कर रहे थे।

मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं:

  1. पुत्र का राजद प्रेम: सांसद के बेटे चाणक्य प्रकाश ने जदयू की विचारधारा को छोड़कर राजद का दामन थामा और बेलहर सीट से चुनाव लड़ा।
  2. प्रचार का दावा: जदयू संसदीय दल के नेता दिलेश्वर कामैत के अनुसार, पार्टी के पास ऐसे साक्ष्य हैं जो यह साबित करते हैं कि सांसद ने अपने पुत्र के पक्ष में न केवल रैलियां कीं, बल्कि सांगठनिक रूप से भी राजद की मदद की।
  3. पार्टी की छवि को नुकसान: जदयू का मानना है कि एक सांसद का दूसरे दल के लिए प्रचार करना ‘दलबदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) के तहत सदस्यता खोने का पर्याप्त आधार है।

सांसद का पलटवार: “बेटा मेरा गुलाम नहीं”

​सदस्यता खत्म करने के आवेदन के बाद सांसद गिरिधारी यादव ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने इन आरोपों को साजिश करार देते हुए अपना पक्ष रखा:

  • लोकतांत्रिक स्वतंत्रता: सांसद ने दलील दी कि उनका पुत्र बालिग है और वह अपने राजनीतिक करियर का फैसला स्वयं कर सकता है। उसके राजद से लड़ने का मतलब यह नहीं कि पिता ने अपनी पार्टी छोड़ दी है।
  • आरोपों का खंडन: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे जदयू के प्रति वफादार रहे हैं और उन्होंने किसी भी मंच से अपनी पार्टी के खिलाफ भाषण नहीं दिया है।
  • कानूनी लड़ाई: सांसद ने कहा कि वे लोकसभा अध्यक्ष के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे और इन ‘आधारहीन’ आरोपों का ठोस जवाब देंगे।

2024 का रिकॉर्ड और वर्तमान सियासी समीकरण

​गिरिधारी यादव बांका के निर्विवाद नेता रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जदयू के टिकट पर राजद के दिग्गज जयप्रकाश नारायण यादव को 1,03,808 मतों के भारी अंतर से हराया था। उनकी जीत ने बांका में जदयू की जड़ें मजबूत की थीं। हालांकि, अब उन्हीं की पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने पर आमादा है, जो यह संकेत देता है कि बिहार में अब ‘पार्टी अनुशासन’ सर्वोपरि है, चाहे चेहरा कितना भी बड़ा क्यों न हो।

VOB का नजरिया: क्या यह महज अनुशासन है या कुछ और?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि यह मामला केवल चुनावी आचार संहिता का नहीं, बल्कि जदयू के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन का भी है।

  1. जीरो टॉलरेंस: नीतीश कुमार की पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि परिवारवाद और दल-विरोध के मामले में कोई रियायत नहीं दी जाएगी।
  2. राजद के साथ ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ पर प्रहार: जदयू उन सभी कड़ियों को काट देना चाहती है जिनका झुकाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले राजद की ओर है।
  3. उप-चुनाव की सुगबुगाहट: यदि लोकसभा अध्यक्ष उनकी सदस्यता रद्द करते हैं, तो बांका में उप-चुनाव की नौबत आ सकती है, जिसके लिए स्थानीय समीकरणों का बदलना तय है।

ओम बिरला के फैसले पर टिकी निगाहें

​दिलेश्वर कामैत द्वारा सौंपे गए आवेदन पर अब गेंद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पाले में है। यदि वे जदयू के साक्ष्यों को सही पाते हैं, तो गिरिधारी यादव का संसदीय करियर संकट में पड़ सकता है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ बांका की इस बड़ी सियासी जंग और लोकसभा सचिवालय से आने वाले हर आदेश की पल-पल की अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।

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