बांका व्यवहार न्यायालय में ‘सांसों का संकट’! लिफ्ट में फंसे बुजुर्ग, 5 मिनट तक मची चीख-पुकार; सौंदर्यकरण के नाम पर सुरक्षा से खिलवाड़ पर उठे बड़े सवाल

समाचार के मुख्य बिंदु: बांका कोर्ट परिसर में टला बड़ा हादसा

  • अचानक संकट: बांका व्यवहार न्यायालय की लिफ्ट बीच में ही अटकी; बुजुर्ग महिला और पुरुष सहित कई लोग अंदर फंसे, मची अफरा-तफरी।
  • मंजिल का सफर: ACJM-1 कार्यालय जाने के दौरान हुआ तकनीकी फॉल्ट; लगभग 5 मिनट तक हवा के लिए तड़पते रहे लोग।
  • रेस्क्यू ऑपरेशन: इमरजेंसी सिस्टम की मदद से बड़ी मशक्कत के बाद खोला गया गेट; सुरक्षित निकाले गए सभी लोग।
  • प्रशासनिक सवाल: केवल बाहरी दिखावे और पेंट-पॉलिश पर ध्यान या बुनियादी सुरक्षा पर भी होगी बात?
  • गंभीर चिंता: अगर किसी हृदय रोगी या बीमार बुजुर्ग के साथ अनहोनी होती, तो कौन होता जिम्मेदार?
  • VOB इनसाइट: सरकारी भवनों में लिफ्ट और अग्नि सुरक्षा जैसे संवेदनशील उपकरणों के ‘मेंटेनेंस’ (रखरखाव) में लापरवाही अब आम बात हो गई है।

बांका | 25 मार्च, 2026

​बिहार के बांका जिले के सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण माने जाने वाले ‘व्यवहार न्यायालय’ परिसर से आज एक ऐसी डरावनी खबर सामने आई है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की कलई खोलकर रख दी है। बुधवार को न्यायालय की लिफ्ट में तकनीकी खराबी आने से कई जिंदगियां बीच हवा में लटक गईं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, एक बुजुर्ग महिला और एक बुजुर्ग पुरुष जब अपने कानूनी कार्यों के लिए ACJM-1 कार्यालय की ओर जा रहे थे, तभी अचानक लिफ्ट रुक गई और अंधेरा छा गया।

5 मिनट का ‘मौत से सामना’: लिफ्ट के भीतर मची चीख-पुकार

​प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लिफ्ट में सवार लोग लगभग 4 से 5 मिनट तक भीतर फंसे रहे। बंद और संकरी जगह होने के कारण बुजुर्गों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी और घबराहट में लोग चीखने-चिल्लाने लगे। परिसर में मौजूद वकीलों और अन्य कर्मियों के बीच तुरंत अफरा-तफरी मच गई। गनीमत रही कि इमरजेंसी सिस्टम ने समय पर काम किया और लिफ्ट को मैन्युअल तरीके से खोलकर सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। हालांकि किसी को शारीरिक चोट नहीं आई, लेकिन बुजुर्गों के चेहरे पर मौत का वह खौफ साफ देखा जा सकता था।

सौंदर्यकरण बनाम सुरक्षा: व्यवस्था पर खड़े हुए तीखे सवाल

​बांका कोर्ट परिसर की इस घटना ने केवल एक तकनीकी खराबी को ही उजागर नहीं किया है, बल्कि उन गंभीर खामियों पर भी रोशनी डाली है जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों ने प्रशासन से कुछ कड़े सवाल पूछे हैं:

  1. बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी: क्या प्रशासन का ध्यान केवल भवनों के बाहरी सौंदर्यकरण और रंग-रोगन तक ही सीमित है? लिफ्ट जैसे संवेदनशील उपकरणों की सुरक्षा जांच नियमित रूप से क्यों नहीं की जाती?
  2. जवाबदेही किसकी?: यदि लिफ्ट में फंसे किसी बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ जाती या कोई जानलेवा हादसा हो जाता, तो इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी किस अधिकारी पर होती?
  3. मुद्दों को दबाने की प्रवृत्ति: स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब भी कोई नागरिक ऐसी व्यवस्थागत खामियों पर सवाल उठाता है, तो उसे सुधारने के बजाय सवाल उठाने वाले को ही चुप कराने या परेशान करने की कोशिश की जाती है।
  4. सुरक्षा मानकों का उल्लंघन: क्या बांका कोर्ट की लिफ्ट के पास कोई ऑपरेटर या इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर स्पष्ट रूप से मौजूद था? प्राथमिक जांच में सुरक्षा मानकों की बड़ी अनदेखी सामने आ रही है।

VOB का नजरिया: क्या ‘दिखावा’ ही आधुनिकता है?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि अदालतों और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के साथ समझौता करना एक गंभीर अपराध है।

  • रेगुलर ऑडिट की कमी: सरकारी इमारतों में लगी लिफ्ट का ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ अनिवार्य होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे लोगों के भार और तकनीकी दबाव को झेलने में सक्षम हैं।
  • प्रशासनिक संवेदनशीलता: बांका जिला प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता का भरोसा केवल साफ दीवारों से नहीं, बल्कि सुरक्षित वातावरण से बढ़ता है।
  • चेतावनी: यह घटना एक बड़ी चेतावनी है। अगर अभी भी रखरखाव पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो भविष्य में किसी बड़ी अनहोनी को टाला नहीं जा सकेगा।

सुधार की दरकार

​बांका व्यवहार न्यायालय में हुआ यह हादसा प्रशासन के लिए ‘आई-ओपनर’ (आंखें खोलने वाला) होना चाहिए। केवल इमारतों को आधुनिक बनाना काफी नहीं है, उन मशीनों का संचालन भी सुरक्षित होना चाहिए जिनमें आम नागरिक सफर करते हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इस मामले में संबंधित विभाग द्वारा की जाने वाली जांच और लिफ्ट की नई सुरक्षा गाइडलाइन्स पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।

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