भारत का पहला ‘इच्छा मृत्यु’ केस; 13 साल का कोमा और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, हरीश राणा ने दिल्ली एम्स में ली अंतिम सांस

HIGHLIGHTS: देश के कानूनी और मेडिकल इतिहास का सबसे बड़ा मोड़; गरिमा के साथ मौत के अधिकार पर मुहर

  • बड़ा अपडेट: गाजियाबाद निवासी हरीश राणा का दिल्ली एम्स (AIIMS) में निधन; पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) का देश में यह पहला क्रियान्वित मामला।
  • लंबा संघर्ष: साल 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से लगातार 13 वर्षों तक अचेत (कोमा) अवस्था में थे हरीश।
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 11 मार्च को शीर्ष अदालत ने दी थी ‘इच्छा मृत्यु’ की मंजूरी; कहा था— “हम इस लड़के को और अपार दुःख में नहीं रख सकते।”
  • मेडिकल प्रक्रिया: एम्स के पैलिएटिव केयर में 14 मार्च को भर्ती के बाद धीरे-धीरे हटाया गया लाइफ सपोर्ट; 10 दिनों से बंद था अन्न-जल।
  • VOB इनसाइट: यह मामला भविष्य में लाइलाज बीमारी और कोमा में पड़े मरीजों के ‘डिग्निटी के साथ अंत’ (Right to die with dignity) के लिए नजीर बनेगा।

नई दिल्ली / गाजियाबाद | 24 मार्च, 2026

​भारत के न्यायिक इतिहास में आज एक अध्याय का अंत हो गया। पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर अचेत पड़े 36 वर्षीय हरीश राणा ने आज दिल्ली एम्स में अपनी अंतिम सांस ली। यह केवल एक सामान्य मृत्यु नहीं है, बल्कि भारत में ‘पैसिव यूथेनेसिया’ (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) का पहला मामला है जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विधिवत रूप से लागू किया गया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की रिपोर्ट के अनुसार, हरीश के जीवन रक्षक उपकरणों और पोषण सहयोग (Nutritional Support) को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उन्हें इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति दी गई।

हॉस्टल की चौथी मंजिल से कोमा तक: 13 साल का अंधकार

​हरीश राणा की दर्दनाक दास्तां साल 2013 में शुरू हुई थी। उस वक्त वे चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। एक हादसे में वे अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। इसके बाद हरीश कभी होश में नहीं आए। 13 साल तक वे गाजियाबाद स्थित अपने घर में बिस्तर पर पड़े रहे। लगातार एक ही मुद्रा में लेटे रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे जख्म (Bedsores) हो गए थे और वे केवल मशीनों के सहारे जीवित थे।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “लड़के को अपार दुःख में नहीं रख सकते”

​हरीश के माता-पिता ने अपने बेटे की असहनीय पीड़ा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 11 मार्च 2026 को जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने इस संवेदनशील मामले पर फैसला सुनाते हुए इसे ‘इच्छा मृत्यु’ की श्रेणी में रखा। कोर्ट ने भावुक होते हुए कहा था कि एक ऐसी अवस्था जहाँ सुधार की रत्ती भर उम्मीद न हो, वहाँ मरीज को कृत्रिम रूप से जीवित रखना उसके मानवीय अधिकारों का हनन है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी गरिमा (Dignity) के साथ संपन्न होनी चाहिए।

VOB डेटा चार्ट: हरीश राणा ‘अंतिम यात्रा’ टाइमलाइन

  • हादसा: साल 2013 (चंडीगढ़ हॉस्टल से गिरना)।
  • कोमा की अवधि: 13 साल 04 महीने।
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 11 मार्च, 2026 (इच्छा मृत्यु की मंजूरी)।
  • एम्स में भर्ती: 14 मार्च, 2026 (पैलिएटिव केयर यूनिट)।
  • लिक्विड डाइट बंद: 15 मार्च, 2026।
  • जल आपूर्ति बंद: 17 मार्च, 2026।
  • मृत्यु की तिथि: 24 मार्च, 2026 (एम्स, दिल्ली)।
  • मेडिकल टीम: एम्स के विशेष डॉक्टरों की निगरानी में दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग जारी रहा।

VOB का नजरिया: क्या ‘पैसिव यूथेनेसिया’ भारत के लिए तैयार है?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि हरीश राणा का मामला समाज और कानून के सामने कई बड़े सवाल छोड़ गया है।

  1. कानूनी नजीर: अब तक भारत में पैसिव यूथेनेसिया पर केवल गाइडलाइंस थीं, लेकिन हरीश के मामले ने इसे धरातल पर उतारा है। यह उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद है जिनके अपने वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट (Vegetative State) में हैं।
  2. मेडिकल एथिक्स: एम्स के डॉक्टरों ने जिस तरह दर्द कम करने वाली दवाओं (Palliative Care) का इस्तेमाल किया, वह यह सुनिश्चित करने के लिए था कि मौत की प्रक्रिया पीड़ादायक न हो।
  3. नैतिक दुविधा: समाज का एक वर्ग आज भी इसे ‘हत्या’ के चश्मे से देखता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ‘जीवन के अधिकार’ के साथ ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ को जोड़कर एक नई दिशा दी है।

निष्कर्ष: पीड़ा का अंत, शांति की शुरुआत

​पिछले 10 दिनों से बिना अन्न-जल के, केवल मेडिकल निगरानी में रह रहे हरीश राणा की देह ने आज जवाब दे दिया। उनके परिवार के लिए यह एक अपार दुःख की घड़ी जरूर है, लेकिन उस ‘अपार दुःख’ से मुक्ति का सुकून भी है जिसमें हरीश पिछले 13 साल से कैद थे।

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