HIGHLIGHTS: सुशासन के स्वास्थ्य तंत्र पर दाग; प्रसव पीड़ा से कराहती रही महिला, नर्स ने मोड़ा मुँह
- बड़ी कार्रवाई: चक्की प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी से 24 घंटे के भीतर मांगा गया स्पष्टीकरण (Show-Cause)।
- घटना का दिन: 19 मार्च को प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला को बिना इलाज के छोड़ने का मामला।
- गंभीर आरोप: ड्यूटी पर तैनात एएनएम (ANM) ने तड़पती महिला की नहीं सुनी पुकार; मजबूरी में अस्पताल से बाहर जाना पड़ा।
- अमानवीय चेहरा: सरकारी अस्पताल की चौखट पर इलाज के बजाय मिली ‘दुत्कार’; परिजनों में भारी आक्रोश।
- VOB इनसाइट: ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में ‘इलाज’ से ज्यादा ‘रेफर’ और ‘लापरवाही’ का खेल अब नहीं चलेगा।
चक्की (बक्सर) | 23 मार्च, 2026
बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावों के बीच बक्सर जिले के चक्की से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो मानवता को शर्मसार करती है। यहाँ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में एक गर्भवती महिला घंटों प्रसव पीड़ा से तड़पती रही, लेकिन अस्पताल के कर्मचारियों का दिल नहीं पसीजा। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, इस अमानवीय व्यवहार के लिए विभाग ने कड़ा रुख अपनाया है और पीएचसी प्रभारी से जवाब तलब किया है।
तड़पती रही ‘जननी’, सिस्टम रहा मौन: क्या यही है सुशासन?
मामला 19 मार्च का है, जब एक महिला प्रसव पीड़ा के कारण चक्की पीएचसी पहुँची थी। आरोप है कि वहां मौजूद एएनएम (ANM) ने महिला की गंभीर स्थिति को देखने के बावजूद उसे भर्ती करने या प्राथमिक उपचार देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। महिला दर्द से छटपटाती रही, लेकिन अस्पताल प्रशासन ‘मूकदर्शक’ बना रहा। अंततः, इलाज के अभाव में महिला और उसके परिजनों को रोते-बिलखते अस्पताल परिसर से बाहर जाना पड़ा।
VOB डेटा चार्ट: बक्सर पीएचसी लापरवाही केस की फाइल
- अस्पताल का नाम: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), चक्की, बक्सर।
- घटना की तारीख: 19 मार्च, 2026।
- पीड़ित: प्रसव पीड़ा से तड़पती एक अज्ञात ग्रामीण महिला।
- मुख्य आरोपी: ड्यूटी पर तैनात एएनएम और लापरवाह प्रबंधन।
- प्रशासनिक कदम: प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी से स्पष्टीकरण (शोकॉज) की मांग।
- संभावित कार्रवाई: जवाब संतोषजनक न होने पर निलंबन या वेतन रोकने की अनुशंसा।
VOB का नजरिया: क्या ‘शोकॉज’ से सुधरेंगे हालात?
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि बक्सर की यह घटना स्वास्थ्य विभाग की जड़ तक फैली संवेदनहीनता को दर्शाती है।
- जवाबदेही की कमी: ग्रामीण इलाकों में पीएचसी को ‘भगवान भरोसे’ छोड़ दिया जाता है। अगर समय पर कार्रवाई नहीं हुई, तो गरीबों का सरकारी अस्पतालों से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।
- नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ का व्यवहार: अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण पीएचसी में तैनात स्टाफ मरीजों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। केवल शोकॉज नहीं, बल्कि ऐसे मामलों में ‘क्रिमिनल नेग्लीजेन्स’ के तहत एफआईआर होनी चाहिए।
- निरीक्षण का अभाव: क्या बक्सर के सिविल सर्जन नियमित रूप से इन केंद्रों का औचक निरीक्षण करते हैं? अगर किया होता, तो 19 मार्च की वो काली शाम किसी महिला के लिए इतनी भारी न पड़ती।
निष्कर्ष: कागजी कार्रवाई से आगे बढ़ना होगा
फिलहाल, चक्की पीएचसी प्रभारी को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया गया है। देखना यह है कि क्या प्रशासन उस एएनएम पर भी गाज गिराता है जिसने एक माँ की पीड़ा को अनदेखा किया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इस मामले की पल-पल की अपडेट आप तक पहुँचाता रहेगा ताकि भविष्य में किसी और ‘जननी’ को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।


