HIGHLIGHTS: पटना के सियासी गलियारे में शिवानंद का ‘बयान बम’; रामवृक्ष बेनीपुरी के 1956 के उस प्रसंग की याद, जिसने हिला दिया था सिस्टम
- कड़वा सच: पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी का बड़ा बयान— राजनीति में संवेदनशीलता की उम्मीद करना सबसे बड़ी ‘नासमझी’ है।
- इतिहास की परतें: डॉ. राममनोहर लोहिया के 1956 के नहर रेट आंदोलन और रामवृक्ष बेनीपुरी की उस ऐतिहासिक चिट्ठी का जिक्र।
- कठोर यथार्थ: “राजनीति में कोई गिरता है, तो पीछे वाला उसकी छाती पर पैर रखकर आगे निकल जाता है।”
- VOB इनसाइट: क्या वर्तमान गठबंधन की राजनीति और ‘अपनों’ से मिल रहे धोखों पर शिवानंद ने कसा है यह दार्शनिक तंज?
- साहित्य और सत्ता: बेनीपुरी जी की वह टिप्पणी जो 70 साल बाद आज भी भारतीय राजनीति का ‘ब्लूप्रिंट’ बनी हुई है।
पटना | 23 मार्च, 2026
बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी और ‘किताबों के शौकीन’ नेता शिवानंद तिवारी ने रविवार को एक ऐसा बयान जारी किया है, जो आज के दौर के ‘महत्वाकांक्षी’ राजनेताओं के चेहरे से नकाब उतारने के लिए काफी है। उन्होंने किसी वर्तमान नेता का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इतिहास के झरोखे से 1956 का एक ऐसा प्रसंग निकाल लाए, जो यह बताता है कि राजनीति ‘फूलों की सेज’ नहीं, बल्कि ‘कांटों का वो रास्ता’ है जहाँ संवेदना के लिए कोई जगह नहीं है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की रिपोर्ट के अनुसार, शिवानंद का यह बयान सत्ता के गलियारों में ‘मौन संदेश’ की तरह गूँज रहा है।
1956 का वो आंदोलन: जब लोहिया सड़कों पर थे और बेनीपुरी ने दी थी ‘चेतावनी’
शिवानंद तिवारी ने डॉ. राममनोहर लोहिया के उस दौर को याद किया जब उत्तर प्रदेश में नहर रेट में बढ़ोतरी के खिलाफ सत्याग्रह चल रहा था। पार्टी के बड़े नेता और महासचिव जेल जा रहे थे। इसी बीच ओंकार शरद को महासचिव बनाया गया। उन्होंने जब अपना पहला सर्कुलर प्रसिद्ध साहित्यकार और राजनेता रामवृक्ष बेनीपुरी को भेजा, तो बेनीपुरी जी ने बधाई के साथ जो जवाब दिया, वह आज की राजनीति का सबसे बड़ा सच है।
बेनीपुरी जी ने लिखा था— “राजनीति के मैदान में यदि कोई गिरता है, तो उसके पीछे आने वाला व्यक्ति उसकी छाती पर पैर रखकर आगे बढ़ जाता है।”
VOB डेटा चार्ट: शिवानंद तिवारी की ‘सियासी’ क्लास की 5 बड़ी बातें
- ऐतिहासिक संदर्भ: 1956 का यूपी नहर रेट आंदोलन (डॉ. लोहिया के नेतृत्व में)।
- किरदार: डॉ. लोहिया (आंदोलनकारी), ओंकार शरद (महासचिव) और रामवृक्ष बेनीपुरी (साहित्यकार/चिंतक)।
- मूल संदेश: राजनीति में संवेदनशीलता की अपेक्षा करना एक बड़ी भूल या नासमझी है।
- चरित्र का विश्लेषण: सत्ता की दौड़ में व्यक्तिगत रिश्तों और संवेदनाओं की बलि चढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है।
- वर्तमान प्रासंगिकता: शिवानंद तिवारी ने बेनीपुरी के बहाने यह संकेत दिया है कि आज की राजनीति और भी ‘हृदयहीन’ हो चुकी है।
VOB का नजरिया: शिवानंद के ‘शब्दों’ के पीछे का निशाना कौन?
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि शिवानंद तिवारी जैसे नेता जब इतिहास का हवाला देते हैं, तो उसके पीछे वर्तमान की कोई बड़ी चोट छिपी होती है।
- सत्ता का संघर्ष: जिस तरह से वर्तमान राजनीति में ‘गठबंधन’ टूट रहे हैं और नेता एक-दूसरे के ‘कंधे’ का इस्तेमाल करके ऊपर चढ़ रहे हैं, यह बयान उसी पर एक गहरा कटाक्ष है।
- लोहियावाद बनाम आज की राजनीति: लोहिया जी के आंदोलन में ‘त्याग’ था, लेकिन बेनीपुरी जी ने उसी समय भांप लिया था कि भविष्य में राजनीति केवल ‘शक्ति प्रदर्शन’ और ‘आगे निकलने की होड़’ बनकर रह जाएगी।
- संवेदनशीलता का अकाल: राजनीति में अब ‘नैतिकता’ और ‘भावनाओं’ को कमजोरी माना जाने लगा है। शिवानंद का यह बयान युवाओं के लिए एक चेतावनी है कि वे यहाँ ‘प्रेम’ नहीं, बल्कि ‘प्रतिस्पर्धा’ के लिए तैयार रहें।
निष्कर्ष: बेनीपुरी की ‘स्याही’ और आज की ‘स्याह’ हकीकत
रामवृक्ष बेनीपुरी ने करीब 70 साल पहले जो लिखा था, उसे शिवानंद तिवारी ने आज फिर से दोहराकर यह याद दिलाया है कि राजनीति का चरित्र नहीं बदला है। यहाँ हर कोई दूसरे के गिरने का इंतजार कर रहा है ताकि वह अपनी मंजिल पा सके। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ उम्मीद करता है कि सुशासन की बात करने वाले नेता बेनीपुरी जी की इस टिप्पणी को ‘चेतावनी’ की तरह लेंगे, न कि ‘उपलब्धि’ की तरह।


