HIGHLIGHTS: सुशासन का ‘हाई-टेक’ प्रहार; फाइलों को मिटाने और मोबाइल फॉर्मेट करने का खेल खत्म
- नयी तकनीक: निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने शुरू किया ‘हाई-टेक फॉरेंसिक इमेजर’ मशीन का इस्तेमाल।
- बड़ी रिकवरी: कंप्यूटर, मोबाइल या पेन ड्राइव से डिलीट किया गया डेटा और छिपी हुई फाइलें भी अब आसानी से होंगी बरामद।
- पारदर्शिता: छापेमारी की वीडियोग्राफी की ‘सत्यापित कॉपी’ अब मौके पर ही आरोपियों को मिलेगी।
- लागत: करीब 7 लाख रुपये की लागत से खरीदी गई है यह अत्याधुनिक ‘बिट-बाय-बिट’ कॉपी मशीन।
- कोर्ट में मजबूती: साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की संभावना शून्य; भ्रष्ट अधिकारियों को सजा दिलाना होगा आसान।
पटना | 23 मार्च, 2026
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग अब ‘एनालॉग’ से ‘डिजिटल’ मोड में आ गई है। अक्सर देखा जाता था कि निगरानी ब्यूरो की छापेमारी के दौरान भ्रष्ट अधिकारी अपने मोबाइल को फॉर्मेट कर देते थे या कंप्यूटर से जरूरी फाइलें डिलीट कर देते थे। लेकिन अब ऐसा करना उनकी सबसे बड़ी गलती साबित होगी। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने एक ऐसी ‘फॉरेंसिक इमेजर’ मशीन तैनात की है, जो मरे हुए डेटा में भी जान फूंक देगी। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की रिपोर्ट के अनुसार, अब रिश्वत के सबूत मिटाना नामुमकिन होगा।
क्या है ‘फॉरेंसिक इमेजर’ और यह कैसे काम करती है?
निगरानी ब्यूरो के अधिकारियों के अनुसार, यह मशीन किसी भी डिजिटल डिवाइस (हार्ड डिस्क, मेमोरी कार्ड, मोबाइल) का एक सटीक डिजिटल क्लोन या ‘मिरर इमेज’ तैयार करती है।
- राइट ब्लॉकिंग: यह तकनीक सुनिश्चित करती है कि मूल डेटा के साथ रत्ती भर भी छेड़छाड़ न हो।
- बिट-बाय-बिट कॉपी: यह केवल फाइलों को कॉपी नहीं करती, बल्कि डिवाइस के हर एक ‘सेक्टर’ की नकल बनाती है।
- डिलीटेड डेटा रिकवरी: इस प्रक्रिया में वह डेटा भी वापस आ जाता है जिसे आरोपी ने डिलीट या फॉर्मेट कर दिया हो।
- हैश वेरिफिकेशन: यह प्रमाणित करता है कि जो सबूत कोर्ट में पेश किए जा रहे हैं, वे मूल डिवाइस के साथ 100% मैच करते हैं।
VOB डेटा चार्ट: ‘फॉरेंसिक इमेजर’ की 5 बड़ी शक्तियां
- डिजिटल सबूतों की सुरक्षा: छापे के दौरान कोई भी डिवाइस से डेटा डिलीट नहीं कर पाएगा, मशीन तुरंत ‘मिरर इमेज’ बना लेगी।
- पारदर्शिता और नया कानून: नए कानून के तहत छापेमारी की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य है। अब इस मशीन से उस वीडियो की ‘सत्यापित कॉपी’ तत्काल आरोपी को दी जा सकेगी।
- अदालत में वजन: बिट-बाय-बिट कॉपी होने के कारण इन साक्ष्यों को अदालत में झुठलाना नामुमकिन होगा।
- जांच में तेजी: वित्तीय अनियमितताओं और साइबर अपराध के मामलों में अब महीनों का इंतजार नहीं करना होगा, डेटा तुरंत रिकवर होगा।
- भ्रष्टाचार पर नकेल: सरकारी तंत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी क्योंकि अधिकारियों को पता होगा कि ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ कभी नहीं मिटते।
“अदालत में साक्ष्य होंगे मजबूत”: डीजी जेएस गंगवार
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के डीजी जेएस गंगवार ने इस तकनीक के महत्व पर जोर देते हुए कहा:
”नयी फॉरेंसिक इमेजर मशीन से डिजिटल दस्तावेजों की हूबहू सत्यापित कॉपी निकाली जा सकेगी। यह दस्तावेज कोर्ट में भी पूरी तरह मान्य है, जिससे ट्रायल में काफी सुविधा होगी और आरोपियों को सजा दिलाने में मदद मिलेगी।”
VOB का नजरिया: क्या ‘तकनीक’ बदल देगी बिहार का चेहरा?
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि निगरानी ब्यूरो का यह कदम ‘उन्नत बिहार’ की दिशा में एक मिल का पत्थर है।
- भ्रष्ट मानसिकता पर चोट: अब तक अधिकारी तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर बच निकलते थे। अब ‘डिलीट’ बटन उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं रहा।
- वीडियोग्राफी का महत्व: छापेमारी के दौरान नकदी की गिनती और दस्तावेजों की जब्ती की लाइव वीडियोग्राफी और उसकी तत्काल कॉपी देना, पुलिस की कार्यशैली पर जनता का भरोसा बढ़ाएगा।
- साइबर युग की जरूरत: जैसे-जैसे रिश्वतखोरी डिजिटल (UPI/Cryptocurrency) हो रही है, फॉरेंसिक टूल्स का होना अनिवार्य है।
निष्कर्ष: सुशासन का ‘डिजिटल हंटर’ तैयार
7 लाख रुपये की यह मशीन बिहार के करोड़ों रुपये के गबन को रोकने में सक्षम है। निगरानी ब्यूरो की इस ‘हाई-टेक’ तैयारी ने स्पष्ट कर दिया है कि सुशासन की सरकार में अब भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इस आधुनिक पहल की सराहना करता है।


