बिहार दिवस पर पांच दिवसीय महिला नाट्य उत्सव का भव्य आगाज, ‘पारो’ ने झकझोरा समाज

पटना, 22 मार्च। बिहार दिवस के अवसर पर राजधानी पटना में कला, संस्कृति और रंगमंच का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जब कला एवं संस्कृति विभाग और बिहार संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में पांच दिवसीय महिला नाट्य उत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर कार्यक्रम का उद्घाटन कला एवं संस्कृति मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने किया।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने 114वें बिहार दिवस की सभी प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह दिन न केवल ऐतिहासिक महत्व का है, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को याद करने और उसे आगे बढ़ाने का भी अवसर है। उन्होंने कहा कि इस तरह के सांस्कृतिक आयोजन राज्य की पहचान को मजबूती देते हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि बिहार जिस तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है, उसी गति से कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी प्रगति जरूरी है। सरकार कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए लगातार प्रयासरत है। मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना के माध्यम से वरिष्ठ और जरूरतमंद कलाकारों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करने की दिशा में काम किया जा रहा है। साथ ही, लुप्त होती लोक कलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए भी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं।

मंत्री ने कहा कि किसी भी राज्य की पहचान उसकी लोक संस्कृति से होती है और जब तक लोक परंपराएं जीवित रहती हैं, तब तक उस राज्य की आत्मा भी जीवंत रहती है। उन्होंने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में बिहार आने वाले समय में एक विकसित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य के रूप में उभरेगा।

उत्सव के पहले दिन दर्शकों को एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक प्रस्तुति देखने को मिली। प्रस्तुति संस्था द्वारा प्रसिद्ध साहित्यकार नागार्जुन के चर्चित उपन्यास ‘पारो’ पर आधारित नाटक “पारो” का मंचन किया गया। इस नाटक का नाट्य रूपांतरण विवेक कुमार ने किया, जबकि निर्देशन शारदा सिंह ने संभाला। संगीत संयोजन वरिष्ठ रंग-निर्देशक संजय उपाध्याय द्वारा किया गया, जिसने नाटक को और प्रभावशाली बना दिया।

नाटक “पारो” ने 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध के मिथिला क्षेत्र की सामाजिक कुरीतियों को बेहद मार्मिक ढंग से मंच पर प्रस्तुत किया। बाल विवाह, बहुविवाह और बेमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच पिसती एक मासूम बालिका की कहानी ने दर्शकों को अंदर तक झकझोर दिया। मात्र 13 वर्ष की पारो, जो एक गरीब ब्राह्मण परिवार से आती है, समाज की इन कुरीतियों का शिकार बनती है और अंततः प्रसव पीड़ा के दौरान उसकी मृत्यु हो जाती है।

इस संवेदनशील प्रस्तुति ने न केवल दर्शकों की आंखें नम कर दीं, बल्कि उन्हें समाज में व्याप्त कुरीतियों पर गंभीरता से सोचने के लिए भी मजबूर कर दिया। नाटक के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सामाजिक सुधार और जागरूकता आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी पहले थी।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक कार्य निदेशालय की निदेशक श्रीमती रूबी, संग्रहालय निदेशालय के निदेशक कृष्ण कुमार और बिहार संगीत नाटक अकादमी की सहायक सचिव कीर्ति आलोक सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

पांच दिनों तक चलने वाले इस महिला नाट्य उत्सव में राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों से आई महिला कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के जरिए समाज, संस्कृति और समकालीन मुद्दों पर आधारित नाटकों का मंचन करेंगी। यह उत्सव न केवल महिला कलाकारों को मंच प्रदान करेगा, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का भी माध्यम बनेगा।

  • Related Posts

    ‘मीठा’ होगा बिहार का भविष्य! ईखायुक्त अनिल झा ने गांधी मैदान में परखी गन्ना उद्योग की चमक; हसनपुर चीनी मिल की ‘सब्सिडी’ वाली खेती बनी मिसाल

    HIGHLIGHTS: 114वें ‘बिहार दिवस’ पर…

    Continue reading
    गांधी मैदान में ‘रोबोट’ और AI का जलवा! मंत्री संजय सिंह टाइगर ने किया स्किल डेवलपमेंट स्टॉल का आगाज़; बिहार के युवाओं के लिए खुले ‘आत्मनिर्भर’ रोजगार के द्वार

    HIGHLIGHTS: 114वें ‘बिहार दिवस’ पर…

    Continue reading