HIGHLIGHTS: नवादा के ‘पथर इंग्लिश’ में गम का सैलाब; दादा की प्रतिमा के पास अंतिम विदाई
- हृदयविदारक मंजर: पटना से जब अखिलेश यादव का शव पैतृक गांव पहुँचा, तो अपने कलेजे के टुकड़े को बेजान देख मां विभा देवी रोते-रोते बेहोश हो गईं।
- मासूम का कंधा: अखिलेश के बड़े बेटे रचित ने नम आंखों से अपने पिता को मुखाग्नि दी; इस दृश्य को देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं।
- हादसे की कसक: घर से महज 500 मीटर की दूरी पर थार गाड़ी बरगद के पेड़ से टकराई थी, जिसने पूरे हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया।
- अंतिम संस्कार: पूर्व मंत्री राजवल्लभ यादव के छोटे बेटे का अंतिम संस्कार उनके दादाजी की मूर्ति के सामने पूरे विधि-विधान से संपन्न हुआ।
नवादा | 20 मार्च, 2026
नवादा के पथर इंग्लिश गांव में आज सिसकियों का शोर है। जेडीयू विधायक विभा देवी के जवान बेटे अखिलेश यादव की मौत ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है। जैसे ही बेटे का पार्थिव शरीर घर की दहलीज पर पहुँचा, कोहराम मच गया। विधायक मां अपने बेटे का चेहरा देखकर बार-बार बेहोश हो जा रही थीं; उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था।
अखिलेश के बड़े भाई एकलव्य यादव ने बताया कि थार गाड़ी घर से थोड़ी ही दूर पर अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा गई थी। इलाज के दौरान पटना में उन्होंने दम तोड़ दिया। शुक्रवार सुबह पैतृक गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहाँ नवादा और बिहार के कई दिग्गज नेताओं ने पहुंचकर शोक संवेदना व्यक्त की।
500 मीटर का वो ‘खूनी’ फासला: क्या हुआ था उस शाम?
अखिलेश के बड़े भाई एकलव्य यादव ने भर्राई आवाज में हादसे की पूरी दास्तां बताई:
- सफर की शुरुआत: गुरुवार की देर शाम अखिलेश अपनी महिंद्रा थार लेकर घर से निकले थे।
- भीषण टक्कर: घर से मात्र 500 मीटर दूर ही पहुँचे थे कि उनकी गाड़ी अनियंत्रित होकर एक विशाल बरगद के पेड़ से जा टकराई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि थार के अगले हिस्से के परखच्चे उड़ गए।
- अस्पताल में संघर्ष: आनन-फानन में उन्हें नवादा से पटना के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन विधि के विधान को कुछ और ही मंजूर था; देर रात उन्होंने दम तोड़ दिया।
मां का विलाप: “मेरा लाल वापस ला दो”
जब अखिलेश का पार्थिव शरीर पटना से एम्बुलेंस के जरिए पैतृक आवास पहुँचा, तो वहां खड़ा जनसैलाब रो पड़ा। अपने कलेजे के टुकड़े को बेजान देख विधायक विभा देवी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। वे बार-बार अपने बेटे का नाम पुकारते हुए बेहोश हो जा रही थीं। घर की महिलाएं और समर्थक उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मां का कलेजा इस वज्रपात को सहने को तैयार नहीं था।


