भागलपुर मायागंज में ‘सिस्टम’ का MRI फेल! 10 दिन से जांच ठप, साहबों को ‘अंधेरे’ में रख एजेंसी ने जड़ा ताला; मरीज बेहाल

HIGHLIGHTS: आउटसोर्सिंग एजेंसी की ‘जंगलराज’ वाली मनमानी; मरीजों को ‘अप्रैल’ का अल्टीमेटम

  • बड़ी लापरवाही: मायागंज अस्पताल (JLNMCH) में बीते 10 दिनों से एमआरआई (MRI) जांच पूरी तरह बंद; गरीब मरीज दर-दर भटकने को मजबूर।
  • साहबों की ‘नींद’: अस्पताल अधीक्षक, मैनेजर और विभाग अध्यक्ष को 10 दिन तक पता ही नहीं चला कि इतनी महत्वपूर्ण जांच बंद है।
  • मरीजों का दर्द: रोजाना करीब 24 मरीज बिना जांच के लौट रहे हैं; आदमपुर के प्रशांत को मिला जवाब— “अगले महीने (अप्रैल) आना”।
  • आज होगी ‘पेशी’: अस्पताल अधीक्षक ने एजेंसी संचालक को किया तलब; मनमानी पर मांगा जाएगा कड़ा स्पष्टीकरण।

भागलपुर | 20 मार्च, 2026

​भागलपुर के सबसे बड़े अस्पताल, मायागंज (JLNMCH) की व्यवस्था इस समय ‘कोमा’ में नजर आ रही है। यहाँ की आउटसोर्सिंग एजेंसी ने बिना किसी सूचना के पिछले 10 दिनों से एमआरआई सेंटर पर ताला लगा दिया है। हैरानी की बात यह है कि अस्पताल के बड़े-बड़े ‘साहब’ इस पूरी घटना से बेखबर रहे, जबकि उनके नाक के नीचे हर रोज दर्जनों गंभीर मरीज बिना जांच कराए मायूस होकर लौट रहे थे।

“हमें तो पता ही नहीं!” — अधिकारियों का रटा-रटाया जवाब

​जब ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की टीम ने अस्पताल प्रशासन से इस ‘ब्लैकआउट’ पर सवाल किया, तो जवाब हैरान करने वाले थे:

  • सुनील कुमार गुप्ता (हॉस्पिटल मैनेजर): बोले— “एजेंसी ने हमें बताया ही नहीं कि सेंटर बंद है।”
  • डॉ. सचिन कुमार सिंह (HOD रेडियोलॉजी): जानकारी न होने की बात कही। अब शुक्रवार (आज) को देखेंगे कि आखिर जांच क्यों बंद है।
  • डॉ. हिमांशु परमेश्वर दुबे (अधीक्षक): उन्होंने माना कि यह एजेंसी की सीधी मनमानी है। शुक्रवार को संचालक को तलब कर जवाब-तलब किया जाएगा।

प्रशांत की आपबीती: ‘अगले महीने आइए’

​आदमपुर के रहने वाले प्रशांत जब गुरुवार को अपनी जांच के लिए सेंटर पहुंचे, तो वहां मौजूद कर्मियों ने उन्हें यह कहकर वापस कर दिया कि 10 दिनों से काम बंद है और अब अप्रैल से पहले कोई जांच नहीं होगी। सवाल यह है कि जो मरीज गंभीर चोट या बीमारी से जूझ रहे हैं, क्या उनकी बीमारी ‘अप्रैल’ तक का इंतजार करेगी?

VOB का नजरिया: क्या ‘आउटसोर्सिंग’ के भरोसे चल रहा है गरीब का इलाज?

​मायागंज अस्पताल में एमआरआई जांच बंद होना केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का बड़ा उदाहरण है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों को खुली छूट देना अब सरकारी अस्पतालों के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है।

​10 दिन तक अस्पताल के मैनेजर और अधीक्षक को यह पता न चलना कि एमआरआई जैसा ‘क्रिटिकल’ विभाग बंद है, यह दर्शाता है कि मॉनिटरिंग के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति हो रही है। अगर एजेंसी को ‘तलबाना’ भेजने और ‘स्पष्टीकरण’ मांगने में ही हफ्तों बीत जाएंगे, तो उन 250 मरीजों का क्या होगा जो प्राइवेट सेंटरों पर हजारों रुपये खर्च करने को मजबूर हुए? सरकार को ऐसी एजेंसियों पर भारी जुर्माना लगाने के साथ-साथ अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।

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