HIGHLIGHTS: खाकी के ‘दागियों’ पर हेडक्वार्टर का प्रहार; अब नहीं चलेगी सस्पेंशन वाली ‘सवेतन छुट्टी’
- बड़ा बदलाव: बिहार में भ्रष्ट पुलिसकर्मियों पर अब सिर्फ निलंबन (Suspension) नहीं होगा; मुख्यालय ने ‘पदावनति’ (Demotion) का नया फॉर्मूला लागू किया।
- शर्मिंदगी वाली सजा: डिमोशन के बाद अधिकारी को उसी थाने में ‘सामान्य जिम्मेदारी’ निभानी होगी, जहाँ वह पहले रसूख में तैनात था।
- शिकायतों का अंबार: भोजपुर में ‘हनीट्रैप’ गिरोह से दारोगा की मिलीभगत और नवादा में भू-माफिया का साथ देने पर DGP ने लिया कड़ा फैसला।
- मैनुअल का पॉवर: पुलिस मैनुअल के नियम 824-851 के तहत इंस्पेक्टर से दारोगा और दारोगा से जमादार बनाने का प्रावधान शुरू।
पटना | 20 मार्च, 2026
बिहार पुलिस मुख्यालय अब उन ‘काली भेड़ों’ को बख्शने के मूड में नहीं है जो वर्दी की आड़ में अपराधियों और ठगों से हाथ मिला लेते हैं। अब तक होता यह था कि भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही अधिकारी सस्पेंड हो जाते थे और कुछ महीनों बाद मजे से वेतन-भत्ता लेकर वापस ड्यूटी पर आ जाते थे। लेकिन अब ‘डिमोशन’ की चोट सीधे उनके करियर, रसूख और पेंशन पर पड़ेगी।
सस्पेंशन का ‘लूपहोल’ बंद: अब ‘छुट्टी’ नहीं, ‘सजा’ मिलेगी
पुलिस मुख्यालय की समीक्षा में यह बात सामने आई कि भ्रष्ट कर्मी पैसे और प्रभाव के दम पर निलंबन की अवधि काट लेते हैं और सबूतों के अभाव में फिर से बहाल होकर पिछला सारा पैसा भी ले लेते हैं।
- पदावनति का नियम: अब गंभीर आचरणहीनता पर इंस्पेक्टर को दारोगा और दारोगा को जमादार (ASI) बनाया जाएगा।
- वही थाना, वही गलियाँ: सबसे दिलचस्प बात यह है कि सजा पाने वाले को उसी थाने में रखा जाएगा। यानी जो कल तक ‘साहब’ थे, वो आज अपने ही जूनियर को रिपोर्ट करेंगे।
- सीमा रेखा: नियम के अनुसार, कोई भी कर्मी जिस पद पर बहाल हुआ है, उससे नीचे के पद पर डिमोट नहीं किया जा सकेगा (जैसे- सिपाही से बहाल दारोगा जमादार बन सकता है, पर सिपाही से नीचे नहीं जाएगा)।
भोजपुर और नवादा के ‘कांड’ ने बढ़ाई सख्ती
हाल ही में DGP के जनता दरबार में चौंकाने वाली शिकायतें पहुंची थीं:
- भोजपुर कांड: एक गिरोह लड़कियों के जरिए अधिकारियों को फंसाकर मोटी रकम वसूल रहा था, जिसमें स्थानीय दारोगा की मिलीभगत पाई गई।
- नवादा विवाद: यहाँ के दारोगा पर भूमि माफियाओं के पक्ष में काम करने का गंभीर आरोप लगा।
VOB का नजरिया: क्या ‘शर्मिंदगी’ से सुधरेगी बिहार पुलिस?
मुख्यालय का यह फैसला ‘शॉक थेरेपी’ की तरह है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि निलंबन (Suspension) अब भ्रष्ट अफसरों के लिए ‘पेड हॉलिडे’ बन गया था, लेकिन डिमोशन सीधे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की कमाई पर वार करेगा।
सोचिए, एक इंस्पेक्टर जो कल तक जिले में हनक रखता था, उसे उसी थाने में दारोगा बनकर फाइलें ढोनी पड़ें—यह सजा आर्थिक से ज्यादा मानसिक होगी। हालांकि, इसमें एक जोखिम यह भी है कि उसी थाने में रखने से वह ‘पुराने संपर्कों’ का इस्तेमाल कर जांच को प्रभावित कर सकता है। लेकिन अगर पुलिस मैनुअल के इन कठोर नियमों (824-851) का ईमानदारी से पालन हुआ, तो थानों में ‘अवैध वसूली’ के सिंडिकेट को तोड़ना आसान हो जाएगा।


