
HIGHLIGHTS: बैंकों में ‘विशेषाधिकार’ बनाम ‘वंचित’ की लड़ाई; औद्योगिक शांति खतरे में
- विवाद की जड़: वित्त मंत्रालय (DFS) ने स्केल IV और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए भारी-भरकम PLI (प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन) का निर्देश दिया।
- भारी अंतर: 95% कर्मचारियों को अधिकतम 15 दिन का PLI, जबकि बड़े अफसरों को 365 दिन (1 साल) के मूल वेतन के बराबर बोनस का प्रावधान।
- सुलह को ठेंगा: CLC (मुख्य श्रम आयुक्त) के पास मामला लंबित होने के बावजूद 18 मार्च को एकतरफा निर्देश जारी।
- ग्लोबल फेलियर: माइक्रोसॉफ्ट और एडोब जैसी कंपनियों ने जिस ‘बेल कर्व’ मॉडल को नकारा, उसे सरकारी बैंकों पर थोपने की तैयारी।
नई दिल्ली/पटना | 19 मार्च, 2026
देश के बैंकिंग इतिहास में पिछले छह दशकों से चले आ रहे ‘द्विपक्षीय समझौते’ की परंपरा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (UFBU) ने वित्त मंत्रालय के उस निर्देश के खिलाफ युद्धघोष कर दिया है, जो बैंक कर्मचारियों के भीतर दो वर्ग पैदा कर सकता है। मामला ‘परफॉरमेंस लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) का है, जिसे लेकर अब आर-पार की जंग छिड़ गई है।
📊 छोटे साहब बनाम बड़े साहब: PLI का गणित (प्रस्तावित)
श्रेणी (Category) | वर्तमान/सामान्य PLI | नया प्रस्तावित PLI (Scale IV+) | वित्तीय प्रभाव |
|---|---|---|---|
पात्रता | क्लर्क से लेकर स्केल III तक | स्केल IV से स्केल VIII और SBI DMD | – |
अधिकतम सीमा | 15 दिन (Basic + DA) | 365 दिन (Basic) तक | 15 गुना तक की वृद्धि |
मूल्यांकन पद्धति | सामूहिक प्रदर्शन (Group Effort) | व्यक्तिगत ‘बेल कर्व’ (Bell Curve) | टीम वर्क को नुकसान |
औद्योगिक संबंध | द्विपक्षीय सहमति पर आधारित | सरकार द्वारा एकतरफा थोपा गया | सुलह प्रक्रिया का उल्लंघन |
“9 दिन पहले हुई बैठक का अपमान” — UFBU का कड़ा रुख
यूनियन का कहना है कि 9 मार्च 2026 को ही मुख्य श्रम आयुक्त के सामने इस मुद्दे पर बैठक हुई थी, जिसमें तय हुआ था कि आगे की बात सुलह से होगी। लेकिन ठीक 9 दिन बाद, 18 मार्च को DFS ने निर्देश जारी कर दिया।
- सुलह प्रक्रिया निरर्थक: यूनियन के अनुसार, जब मामला अदालत या वैधानिक मंच (CLC) पर हो, तो सरकार का एकतरफा फैसला औद्योगिक सौहार्द को बिगाड़ने वाला है।
- टीम भावना की हत्या: बैंकिंग एक सामूहिक प्रयास है। अगर 95% कर्मचारी मामूली बोनस पाएंगे और 5% अधिकारी भारी रकम, तो ‘टीम स्पिरिट’ खत्म हो जाएगी।
- वित्तीय बोझ: जहाँ बैंक ‘कॉस्ट कटिंग’ और ‘पूंजी अनुशासन’ की बात कर रहे हैं, वहां एक छोटे वर्ग पर पंद्रह गुना अधिक खर्च करना तर्कहीन है।
VOB का नजरिया: क्या ‘विदेशी मॉडल’ डूबा देगा सरकारी बैंकों का कल्चर?
’बेल कर्व’ और ‘फोर्स्ड रैंकिंग’—ये वो शब्द हैं जिनसे दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां तौबा कर चुकी हैं क्योंकि ये कर्मचारियों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं। यहाँ तक कि एक्सिस और आईसीआईसीआई जैसे निजी बैंकों ने भी इसे छोड़ दिया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSB) की मजबूती उनकी ‘सामूहिक एकता’ में है। अगर सरकार केवल टॉप मैनेजमेंट को खुश करने के लिए निचले और मध्य स्तर के कर्मचारियों की अनदेखी करती है, तो इससे बैंकों के संचालन और साख पर बुरा असर पड़ सकता है। शेयरधारकों के हितों की दुहाई देने वाली सरकार क्या एक छोटे वर्ग पर इतना बड़ा वित्तीय व्यय उचित मानती है?


