HIGHLIGHTS: भक्ति के रंग में रंगा भागलपुर; गंगा घाट तक लगा लंबा जाम
- नारी शक्ति: कलश शोभा यात्रा में करीब 20 से 25 हजार महिलाओं ने हिस्सा लिया; केसरिया रंग में रंगा नजर आया इलाका।
- भक्ति मार्ग: रसलपुर दुर्गा मंदिर से त्रिमूहन चौक स्थित गंगा घाट तक जल भरने पहुंचीं श्रद्धालु महिलाएं।
- बड़ा आयोजन: शिव शक्ति महायज्ञ और शिव पुराण कथा के लिए उमड़ेगी रोजाना 50 हजार से अधिक भक्तों की भीड़।
- VIPS की मौजूदगी: कहलगांव विधायक शुभानंद मुकेश और समाजसेवी रामबालक मंडल ने भी कलश यात्रा में टेका मत्था।
कहलगांव (भागलपुर) | 19 मार्च, 2026
भागलपुर के कहलगांव अनुमंडल अंतर्गत एकचारी रसलपुर की सड़कें आज सुबह जयकारों से गूंज उठीं। मौका था माँ दुर्गा प्रांगण से शुरू होने वाले नौ दिवसीय शिव शक्ति महायज्ञ का। कलश शोभा यात्रा में महिलाओं की संख्या इतनी अधिक थी कि जिधर भी नजर जाती, केवल सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। आयोजकों का दावा है कि इस बार का यज्ञ पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ देगा।
📊 महायज्ञ ‘फाइल’ रिकॉर्ड: एक नजर में
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विवरण |
जानकारी |
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यज्ञ का नाम |
शिव शक्ति महायज्ञ एवं शिव पुराण कथा |
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अवधि |
09 दिवसीय |
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कलश यात्रा मार्ग |
रसलपुर दुर्गा मंदिर ↔ त्रिमूहन चौक गंगा घाट |
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मुख्य उद्देश्य |
इलाके में सुख, शांति और समृद्धि की कामना |
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अपेक्षित भीड़ |
प्रतिदिन 50,000+ श्रद्धालु |
इलाके में ‘शांति’ के लिए ‘शिव शक्ति’ की आराधना
महायज्ञ के भव्य आयोजन को लेकर स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है।
- परंपरा की निरंतरता: पिछले साल की अपार सफलता के बाद इस बार आयोजन को और अधिक भव्य रूप दिया गया है।
- धार्मिक अनुष्ठान: कलश यात्रा के साथ ही वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिव पुराण कथा का शुभारंभ हो गया है, जिसमें देश के जाने-माने कथावाचक शिरकत करेंगे।
- गणमान्य लोगों का साथ: विधायक शुभानंद मुकेश और समाजसेवी रामबालक मंडल ने यात्रा में शामिल होकर भक्तों का उत्साह बढ़ाया और इलाके के विकास व शांति की प्रार्थना की।
VOB का नजरिया: क्या ‘यज्ञ’ से मिलेगी रसलपुर को नई पहचान?
कहलगांव के एकचारी रसलपुर में जिस तरह का जनसैलाब उमड़ा है, वह बताता है कि बिहार की ग्रामीण संस्कृति में आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। 25 हजार महिलाओं का एक साथ कलश लेकर चलना प्रशासन के लिए ट्रैफिक मैनेजमेंट की बड़ी चुनौती थी, जिसे स्थानीय वॉलिंटियर्स और पुलिस ने बखूबी संभाला। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल धार्मिक होते हैं, बल्कि यह स्थानीय भाईचारे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था (मेले के माध्यम से) को भी मजबूती देते हैं। उम्मीद है कि 9 दिनों तक चलने वाला यह अनुष्ठान वास्तव में इलाके में ‘सुख-शांति’ लेकर आएगा।


