HIGHLIGHTS
- शर्मसार राजधानी: ओखला फेज-2 के औद्योगिक क्षेत्र में 8 साल की मासूम के साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात।
- विश्वासघात: बच्ची के पड़ोस में रहने वाले तीन नाबालिगों ने ही खाली गोदाम में ले जाकर की दरिंदगी।
- पुलिस एक्शन: मेडिकल में दुष्कर्म की पुष्टि के बाद तीनों आरोपी बाल सुधारगृह भेजे गए।
- बड़ी कार्रवाई: जिस गोदाम में वारदात हुई, उसके मालिक को भी पुलिस ने हिरासत में लिया।
नई दिल्ली/ओखला | 17 मार्च, 2026
देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर मासूमों के लिए असुरक्षित साबित हुई है। ओखला फेज-2 जैसे व्यस्त औद्योगिक इलाके में एक 8 साल की बच्ची के साथ जो हुआ, उसने समाज की संवेदनशीलता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन पड़ोसियों पर भरोसे की उम्मीद की जाती है, वही इस मासूम के लिए काल बन गए।
अकेलेपन का फायदा और गोदाम में ‘हैवानियत’
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित बच्ची का परिवार ओखला फेज-2 में रहता है। वारदात के वक्त घर में कोई नहीं था:
- माता-पिता की स्थिति: बच्ची के पिता करीब दो माह से अपने गांव गए हुए हैं, जबकि मां पास के ही एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करने गई थी।
- बहला-फुसलाकर ले गए: घर में बच्ची को अकेला पाकर पड़ोस में रहने वाले तीनों नाबालिग आरोपी उसे बहला-फुसलाकर पास के एक खाली पड़े गोदाम में ले गए।
- वारदात: वहां तीनों ने मिलकर बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया।
मां के लौटते ही खुली दरिंदगी की पोल
जब बच्ची की मां काम से घर लौटी, तो बच्ची ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। मां ने बिना देर किए ओखला औद्योगिक थाना पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने रात में ही बच्ची का मेडिकल करवाया, जिसमें दुष्कर्म की पुष्टि हुई है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई शुरू की गई।
कानूनी कार्रवाई: सुधारगृह भेजे गए आरोपी
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने रविवार को तीनों नाबालिग आरोपियों को पकड़ लिया। उन्हें किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें बाल सुधारगृह भेज दिया गया है। साथ ही, पुलिस ने उस गोदाम के मालिक को भी हिरासत में ले लिया है जहाँ यह शर्मनाक घटना घटी।
VOB का नजरिया: क्या सुरक्षित है हमारे बच्चों का ‘पड़ोस’?
ओखला की यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे की विफलता है। 8 साल की बच्ची के साथ दरिंदगी करने वाले खुद ‘नाबालिग’ हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि किशोरों में बढ़ती यह आपराधिक प्रवृत्ति किस दिशा में जा रही है। साथ ही, औद्योगिक क्षेत्रों में खाली पड़े गोदामों का असामाजिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होना भी प्रशासन की ढिलाई को दर्शाता है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ मांग करता है कि ऐसे मामलों में केवल जेल या सुधारगृह काफी नहीं, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार जरूरी है जो बच्चों को ‘हैवान’ बना रहे हैं।


