HIGHLIGHTS
- बड़ी राहत: 24 घंटे के भीतर काम पर लौटने वाले अंचलाधिकारियों (CO) और राजस्व अधिकारियों पर नहीं होगी अनुशासनात्मक कार्रवाई।
- समय का तकाजा: मार्च के ‘राजस्व महा अभियान’ में फंसे हैं 46 लाख आवेदन; 31 मार्च तक निपटारे का है लक्ष्य।
- समायोजन का वादा: हड़ताल की अवधि को सर्विस/छुट्टी में एडजस्ट करेगी सरकार; दबाव की जगह संवाद का रास्ता।
- CM का दौरा: मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ और ‘ई-मापी’ अभियान को सफल बनाने के लिए अफसरों का फील्ड में होना जरूरी।
पटना | 15 मार्च, 2026
बिहार में राजस्व विभाग के अधिकारियों की हड़ताल और सरकार के बीच चल रही ‘तनातनी’ में अब बीच का रास्ता निकलता दिख रहा है। उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने रविवार को एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए हड़ताली अधिकारियों को ‘अभयदान’ दिया है। सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर अधिकारी अगले 24 घंटे में अपनी कलम थाम लेते हैं, तो उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
46 लाख आवेदनों का ‘पहाड़’ और मार्च की डेडलाइन
सरकार की इस ‘उदारता’ के पीछे जनता का बड़ा हित छिपा है। उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि मार्च का महीना विभाग के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है।
- राजस्व महा अभियान: विभाग के पास करीब 46 लाख आवेदन लंबित हैं, जिनका निपटारा 31 मार्च तक करना है।
- ई-मापी अभियान: मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘ई-मापी’ (डिजिटल जमीन मापी) को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों पर है।
- समृद्धि यात्रा: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद जिलों के दौरे (समृद्धि यात्रा) पर हैं, जहाँ जमीन से जुड़े मुद्दों पर वे सीधे जनता से फीडबैक ले रहे हैं। ऐसे में अंचल अधिकारियों की गैरमौजूदगी सरकार के लिए भारी पड़ सकती है।
“दबाव की राजनीति नहीं, काम से मांगें हक”
विजय सिन्हा ने कड़े शब्दों में यह भी कहा कि “दबाव की राजनीति से समस्याओं का समाधान नहीं होता।” उन्होंने भूमि सुधार उप समाहर्ताओं (DCLR) के मुद्दों पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया, जो सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़ा मामला है। उन्होंने अधिकारियों से अपील की कि वे जनता का काम करें और परिणाम देकर अपना हक मांगें। सरकार जायज मांगों के लिए संवेदनशील है, लेकिन प्रशासनिक अनुशासन से समझौता नहीं करेगी।
VOB का नजरिया: क्या यह सरकार की मजबूरी है या मास्टरस्ट्रोक?
बिहार में जमीन का काम रुकने का मतलब है—आम आदमी का परेशान होना। रसीद, दाखिल-खारिज और प्रमाण-पत्रों के लिए लोग अंचलों के चक्कर लगा रहे हैं। उपमुख्यमंत्री का यह ‘ऑफर’ दरअसल एक ‘विजिलेंट डिप्लोमेसी’ है। सरकार जानती है कि अगर मार्च में राजस्व वसूली और आवेदनों का निष्पादन नहीं हुआ, तो पूरा वित्तीय वर्ष प्रभावित होगा। साथ ही, सीएम की ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान अगर जनता ने अंचलों की शिकायत की, तो यह सुशासन की छवि पर दाग होगा। अब गेंद अधिकारियों के पाले में है—वे ‘हठ’ चुनते हैं या ‘राहत’।


